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इमरान ख़ान-डोनल्ड ट्रंप मुलाकात: आग और बर्फ़ जैसे ठंडे रिश्तों का साया
- Author, सप्तर्षि दत्ता
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान 21 जुलाई को अमरीका के दौरे पर होंगे. प्रधानमंत्री के रूप में इमरान ख़ान ऐसे वक्त में अमरीका जा रहे हैं जब दोनों देशों के बीच रिश्तों में तनाव बढ़ा हुआ है.
इमरान ख़ान का अमरीका दौरा तीन दिनों का है, लेकिन उनके कार्यक्रम का ब्यौरा साफ़ नहीं है, क्योंकि इस यात्रा के बारे में भ्रम की स्थिति है कि यात्रा आगे बढ़ेगी या नहीं, लेकिन इसके बावजूद ये महत्वपूर्ण होने जा रही है.
इमरान ख़ान अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से मुलाक़ात करेंगे, और उम्मीद है कि दोनों नेता आतंकवाद-रोधी, रक्षा और व्यापार जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करेंगे.
कभी नरम तो कभी गरम रिश्ते..
ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कड़ा रवैया अपना रखा है. अमरीका पाकिस्तान पर आरोप लगाता रहा है कि वो ना सिर्फ़ इस्लामिक आतंकवादियों को समर्थन देता है बल्कि इस मुद्दे पर अमरीका को गुमराह भी करता रहा है. हालांकि पाकिस्तान इन आरोपों का खंडन करता है.
ट्रंप और इमरान ख़ान की अभी तक कोई औपचारिक मुलाकात नहीं हुई है लेकिन दोनों ही नेता एक दूसरे के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी करते रहे हैं.
2018 के जनवरी में डोनल्ड ट्रंप ने ट्वीट किया था, "अमरीका ने पिछले 15 वर्षों में पाकिस्तान को 33 बिलियन डॉलर से अधिक की मदद देकर बेवकूफी की है और उन्होंने हमसे झूठ बोलने और धोखा देने के अलावा कुछ नहीं दिया. उनकी नज़र में हमारे नेता मूर्ख हैं. जिन आतंकवादियों को हम अफ़ग़ानिस्तान में खोजते रहते हैं वो उन्हें सुरक्षित पनाहगाह मुहैया करा देते हैं."
इसके बाद अमरीका की बयानबाज़ी और बढ़ गई. अमरीका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली सुरक्षा मदद में 2 बिलियन डॉलर की कटौती की. इस कटौती में सैन्य मदद के 300 मिलियन डॉलर भी शामिल थे.
नवंबर 2018 में अमरीकी राष्ट्रपति ने यह कहते हुए ट्वीट किया, "हम अब पाकिस्तान को अरबों डॉलर नहीं देते हैं क्योंकि वो हमारे पैसे ले तो लेते हैं लेकिन हमारे लिए करेंगे कुछ भी नहीं. सबसे बड़ा उदाहरण बिन लादेन का है, अफ़ग़ानिस्तान दूसरा है. वो उन देशों में से हैं जो बदले में कुछ भी दिए बिना अमरीका से सिर्फ़ लेने में यकीन करते हैं. ये अब ख़त्म हो गया है!"
जवाब में इमरान ख़ान ने कहा, " अमरीका को पाकिस्तान के ख़िलाफ़ साफ़ रिकॉर्ड रखने की ज़रूरत है. 1. 9/11 में कोई भी पाकिस्तानी शामिल नहीं था, इसके बाद भी पाकिस्तान ने आतंकवाद के ख़िलाफ़ अमरीकी युद्ध में शामिल होने का फैसला किया. 2. इस युद्ध में पाकिस्तान के 75,000 लोग निशाना बने और पाकिस्तान की 123 बिलियन डॉलर से अधिक की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई. अमरीकी "मदद" तो सिर्फ़ 20 बिलियन की ही थी "
पुरानी दोस्ती के नाम पर
पाकिस्तान और अमरीका के इन नाज़ुक संबंधों को देखते हुए, पाकिस्तान की पहली प्राथमिकता दोनों देशों के संबंधों को फिर से पटरी पर लाना है और इस्लामाबाद को भी ऐसी ही उम्मीद है.
पाकिस्तान के स्थानीय अखबारों के मुताबिक़ पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मोहम्मद फ़ैसल ने अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ के बयान को दोहराते हुए कहा, "यह यात्रा पाकिस्तान और अमरीका के बीच रहे लंबे रिश्तों को नए सिरे से मज़बूत करने में मदद करेगी."
लेकिन पाकिस्तान में कुछ टिप्पणीकार इससे कहीं ज़्यादा की उम्मीद कर रहे हैं.
अंग्रेज़ी अख़बार 'द नेशन' के एक लेख में सिराज एम शावा लिखते हैं कि इमरान ख़ान की चीन और खाड़ी के देशों के हाल के दौरों ने पाकिस्तान को आर्थिक सहायता जुटाने में काफी मदद की है.
शावा लिखते हैं, "इस बात पर अब कोई संदेह नहीं किया जा सकता कि इमरान ख़ान के पास अपनी बातों को रखने का कौशल है और इसमें उन्हें महारत हासिल है, और उन्हें 22 जुलाई को अमरीकी राष्ट्रपति के साथ होने वाली बैठक में पाकिस्तान के हितों का मामला मज़बूती से उठाना चाहिए."
राह आसान नहीं
लेकिन कुछ अन्य लोगों का मानना है कि यह आसान नहीं होगा.
वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक यूएस इंस्टीट्यूट ऑफ पीस के उपाध्यक्ष मोइद यूसुफ ने 'हम न्यूज़ टीवी' से कहा, "दोनों देश अभी एक-दूसरे की बातचीत की शैली को अपना नहीं पाए हैं, जिसके चलते "बेसिक डिस्कनेक्ट" हो गया है."
उम्मीद की किरण
कुछ टिप्पणीकारों का मानना है कि इमरान ख़ान की यह यात्रा उस समय हो रही है जब अमरीका अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध को ख़त्म करने में पाकिस्तान की मदद चाहता है, और देश में अपनी सैन्य मौजूदगी को वापस लेने की मांग कर रहा है. अमरीका को पाकिस्तान के समर्थन की ये ज़रूरत कूटनीति के स्तर पर पाकिस्तान के पक्ष में होगी.
अमरीका के विदेश मंत्रालय ने जुलाई में अफ़ग़ानिस्तान में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए चार देशों की वार्ता का हवाला देते हुए कहा, "चीन, रूस और अमरीका ने बातचीत में शामिल होने के लिए पाकिस्तान का स्वागत किया और भरोसा जताया कि अफ़ग़ानिस्तान में शांति बहाली के लिए पाकिस्तान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है."
संयुक्त चीफ ऑफ स्टाफ़ के लिए ट्रंप की पसंद जनरल मार्क मिले भी पाकिस्तान पर नरम दिखाई देते हैं.
अंग्रेज़ी अख़बार डॉन ने उनके हवाले से लिखा, "हालांकि हमने सुरक्षा मदद को निलंबित कर दिया है और बड़े रक्षा मामलों की बातचीत को स्थगित कर दिया है, लेकिन हमें साझा हितों के आधार पर मजबूत सैन्य संबंध बनाए रखने की ज़रूरत है."
इस महीने की शुरूआत में इमरान ख़ान को एक और कूटनीतिक जीत मिली, जब बलूचिस्तान में पाकिस्तान सरकार के ख़िलाफ़ लड़ने वाले एक संगठन बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) को अमरीका ने "आतंकवादी संगठन" घोषित कर दिया था.
पाकिस्तान लंबे समय से भारत पर बलूचिस्तान में विद्रोहियों का समर्थन करने का आरोप लगाता रहा है, हांलाकि भारत इस दावे का खंडन करता है.
पाकिस्तान के विश्लेषक खावर गुम्मन ने दुनिया टीवी से कहा कि दोनों नेताओं में से किसी का भी करियर राजनेता का नहीं रहा हैं, ट्रंप एक व्यवसायी और टीवी सेलिब्रिटी रहे हैं, जबकि इमरान ख़ान - हालांकि लंबे समय से राजनीति में हैं और पाकिस्तान के सबसे प्रसिद्ध खिलाड़ी रहे हैं, इसलिए यह देखना बाक़ी है कि इस बातचीत से क्या कुछ हासिल किया जा सकता है
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