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हॉन्गकॉन्ग: चीन के इतने ताक़तवर राष्ट्रपति शी जिनपिंग को क्यों झुकना पड़ा
- Author, टीम बीबीसी हिंदी
- पदनाम, नई दिल्ली
हॉन्गकॉन्ग को चीन के प्रत्यर्पण क़ानून के ख़िलाफ़ लड़ाई में बड़ी जीत हासिल हुई है.
चीन के अधिकारियों के साथ घंटों लंबी चली बैठक के बाद हॉन्गकॉन्ग की चीफ़ एग्ज़िक्यूटिव कैरी लैम ने ऐलान किया कि सरकार ने इस क़ानून को अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया है. चीन ने भी उनके इस ऐलान का समर्थन किया.
इस क़ानून के मुताबिक़ हॉन्गकॉन्ग के लोगों को मुक़दमे के लिए चीन भेजा जा सकता था. हॉन्गकॉन्ग वासियों को डर था कि इससे राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया जा सकता है. साथ ही ये हॉन्गकॉन्ग को मिली स्वायत्तता का भी हनन है.
लैम का ये ऐलान पिछले कुछ सालों में चीन के पीछे हटने का शायद पहला मौक़ा है. साल 2012 में शी जिनपिंग के हाथों में चीन की कमान आने के बाद राजनीतिक स्तर पर पहली बार चीन अपने क़दम रोकता हुआ नज़र आ रहा है.
चीन का ये क़ानून हॉन्गकॉन्ग की स्वायत्तता में उसके दख़ल की जारी तमाम कोशिशों का एक हिस्सा है. साल 1997 में जब ब्रिटेन ने चीन को हॉन्गकॉन्ग सौंपा था तो इस शहर की स्वतंत्रता बनाए रखने को लेकर कुछ शर्तें रखी गई थीं.
लिहाज़ा हॉन्गकॉन्ग के पास अपने अलग चुनाव, अपनी करेंसी, प्रवासियों से जुड़े नियम और अपनी न्यायिक प्रणाली है. लेकिन बीते 20 साल में बीजिंग और हॉन्गकॉन्ग के चीन समर्थित एसेंबली ने ना सिर्फ़ शहर की इस आज़ादी को ख़त्म करने की कोशिश की है बल्कि कई स्तर पर सफल भी हुए हैं.
माना जा रहा है आने वाले दिनों में इस प्रदर्शन के और आगे बढ़ने की स्थिति को देखते हुए और ख़ास कर रविवार को होने वाले प्रदर्शन को देखते हुए चीन ने लैम के बयान का समर्थन करना उचित समझा.
क्यों पीछे हटा चीन?
चीन इस वक़्त कई फ़्रंट पर लड़ाईयां लड़ रहा है. अमरीका के साथ जारी ट्रेड वॉर, देश की धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था और तेज़ी से बढ़ती मुद्रा स्फ़ीति दर चीन के सामने चुनौती पेश कर रहा है.
इन सब के बीच चीन नहीं चाहता की वह प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पेपर स्प्रे, आंसू गैस छोड़ने जैसी कार्रवाई दोहराता रहे.
9 जून को हॉन्गकॉन्ग की सड़कों पर लोग बेहद शांति पूर्ण तरीक़े से निकले, ये इतना शांत प्रदर्शन था कि सड़कों के किनारे दुकानों के मालिकों ने दुकान पर लगे लोहे के शटर तक नहीं गिराए लेकिन एकाएक 12 जून को हिंसा का मंज़र सामने आया.
जब प्रदर्शनकारियों के कुछ पत्थर फेंके जाने का जवाब सुरक्षा कर्मियों ने भारी आंसू गैस और स्प्रे के इस्तेमाल से दिया. लेकिन बीजिंग की ओर झुकाव रखने वाली लैम ने इस कार्रवाई को ''ज़रूरी और ज़िम्मेदार'' क़दम बताया.
माना जा रहा है कि प्रदर्शन करने वालों पर ये कार्रवाई करने पर सिर्फ़ स्थानीय व्यवसायी ही नहीं बीजिंग भी लैम के खिलाफ़ हो गया. इनका कहना था कि ये क़दम मुद्दे को भटका रहा है.
चीन का अपने फ़ैसले पर रोक लगाना हॉन्गकॉन्ग के लिए एक फौरी राहत तो हो सकती है लेकिन उसकी आज़ादी पर उसका हक़ अब भी पूरा नहीं है. इस शहर को स्वायत्तता तो दी गई है और चुनाव भी कराने का अधिकार है लेकिन पूर्ण लोकतंत्र यहां लोगों को नसीब नहीं है.
हॉन्गकॉन्ग के नागरिक असेंबली में बैठे 50 फ़ीसदी सदस्यों के लिए वोट कर सकते हैं. लेकिन बाक़ी के सदस्यों का फ़ैसला इस क्षेत्र के बिज़नेस सेक्टर का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग ही करते हैं जो ज़ाहिर तौर पर बीजिंग के साथ ख़ास व्यापारी रिश्ते रखते हैं.
यहां चुनाव समिति में 1200 सदस्य हैं और ज़्यादातर का झुकाव बीजिंग की नीतियों की ओर होता है. ऐसे में हॉन्गकॉन्ग का चीफ़ एग्ज़िक्यूटिव वहीं बनता है जिसे बीजिंग का समर्थन प्राप्त हो और वो भी उसकी नीतियों से सहमत हो.
कैरी लैम भी ऐसे ही एक्ज़ीक्यूटिव में से एक हैं. पिछले साल दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ''आप कह सकते हैं कि ये जूता पोंछने जैसी बातें हैं लेकिन मुझे राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक करिश्माई शख्स़ियत लगते हैं, वो जो कहते हैं और करते हैं वो बेहद प्रशंसनीय होता है.''
प्रत्यर्पण बिल की हार हॉन्गकॉन्ग को लेकर बीजिंग की दुविधा को दिखाता है. बीजिंग यहां पूर्ण नियंत्रण को बनाए रखना चाहता है और इसलिए अर्ध-स्वायतत्ता वाले इस क्षेत्र में पूर्ण लोकतंत्र की अनुमति नहीं देना चाहता है.
लोकतंत्र के अभाव के कारण यहां की सरकार एक राजनीतिक संकट में आ जाती है और ये भी भूल जाती है कि वह जनता के लिए है ना कि बीजिंग के साथ अपनी वफ़ादारी वाले रिश्ते के लिए.
यही कारण रहा कि इस बिल को एग्ज़िक्यूटिव बैठक में चीनी नए साल की छुट्टियों से तीन दिन पहले लाया गया इस पर बहस भी नहीं की गई. इस काउंसिल में ज़्यादातर वही नेता थे जो बीजिंग का समर्थन करते हैं.
बिल के मुताबिक चीन की सुरक्षा एजेंसियां हॉन्गकॉन्ग में किसी की प्रॉपर्टी ज़ब्त कर सकती थी, ना सिर्फ़ हॉन्गकॉन्ग बल्कि विदेशी जो हॉन्गकॉन्ग में रह रहे हैं उन पर भी ये क़ानून लागू किए जाने का प्रावधान था. इन नियमों के कारण स्थानीय व्यापारी भी इसके खिलाफ़ थे लेकिन खुलकर सामने नहीं पा रहे थे.
इस पूरे प्रकरण से साफ़ पता चलता है कि हॉन्गकॉन्ग की चीफ़ एक्जीक्यूटिव बीजिंग के प्रति जवाबदेह हैं न कि जनता के प्रति, फिर भी बीज़िंग ये कहता रहता है कि वह ''हॉन्गकॉन्ग को उच्चस्तरीय स्वायत्तता देने के लिए प्रतिबद्ध है. ''
लेकिन सवाल ये है कि अगर चीफ़ एग्जिक्यूटिव का चयन हॉन्गकॉन्ग की जनता ने किया होता तो क्या उसे इस तरह अपने मूल अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता?
हॉन्गकॉन्ग में ऐसा पहली बार नहीं है जब लोग अपने हक़ के लिए सड़कों पर उतरें हों. कई बार नागरिक महीनों अपनी मांगों के लिए लड़ चुके हैं. साल 2014 में हुआ अंब्रेला मूवमेंटजनता ने अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ा था. 79 दिन तक चले इस प्रदर्शन में जनता वोट देने और अपना नेता चुनने की मांग लेकर सड़कों पर डटी रही, हालांकि उसे इस लड़ाई में सफलता नहीं मिली.
इस आंदोलन के नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया है लेकिन इस गिरफ्तारी को अब तक चीफ़ एग्ज़िक्यूटिव राजनीतिक बदले की भावना से लिया गया क़दम नहीं मानती हैं.
हॉन्ग कॉन्ग के लोग कोई बड़ी क्रांति नहीं करना चाहते, वे बस अपने छोटे-छोटे मूल अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं, शायद यही कारण है कि अब यहां के नागरिकों को अपनी लड़ाई लड़ने के लिए किसी नेता के चेहरे की ज़रूरत भी नहीं है.
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