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चीन के ख़िलाफ़ सड़क पर क्यों हैं हॉन्गकॉन्ग के लाखों लोग
हॉन्गकॉन्ग के लाखों लोग चीन के ख़िलाफ़ सड़क पर प्रदर्शन कर रहे हैं.
प्रत्यर्पण क़ानून में संशोधन के विरोध में रविवार को लाखों लोग सड़कों पर उतरे. यह क़ानून आने वाले हफ़्तों में पारित किया जा सकता है.
प्रस्तावित क़ानून के मुताबिक़ अगर कोई शख़्स अपराध करके हॉन्गकॉन्ग भाग जाता है तो उसे जांच प्रक्रिया में शामिल होने के लिए चीन भेजा जाएगा.
क्या है प्रत्यर्पण क़ानून
हॉन्गकॉन्ग की सरकार फ़रवरी के महीने में मौजूदा प्रत्यर्पण क़ानून में संशोधन का प्रस्ताव लेकर आई थी. ताइवान में एक व्यक्ति अपनी प्रेमिका की कथित तौर पर हत्या कर हॉन्गकॉन्ग वापस आ गया था. इसके बाद ही इस क़ानून में संशोधन का प्रस्ताव लाया गया.
हॉन्गकॉन्ग चीन का एक स्वायत्त द्वीप है और चीन इसे अपने संप्रभु राज्य का हिस्सा मानता है. हॉन्गकॉन्ग का ताइवान के साथ प्रत्यर्पण संधि नहीं है, इस वजह से हत्या के मुक़दमे के लिए उस शख़्स को ताइवान भेजना मुश्किल है.
यह क़ानून चीन को उन क्षेत्रों से संदिग्धों को प्रत्यर्पित करने की अनुमति देगा, जिनके साथ हॉन्गकॉन्ग के समझौते नहीं है.
हॉन्गकॉन्ग में अंग्रेज़ों के समय का कॉमन लॉ सिस्टम है और इसका एक दर्जन से अधिक देशों के साथ प्रत्यर्पण संधि है. इनमें अमरीका, ब्रिटेन और सिंगापुर भी शामिल हैं.
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यह विवादित क्यों है?
साल 1997 में जब हॉन्गकॉन्ग को चीन के हवाले किया गया था तब बीजिंग ने 'एक देश-दो व्यवस्था' की अवधारणा के तहत कम से कम 2047 तक लोगों की स्वतंत्रता और अपनी क़ानूनी व्यवस्था को बनाए रखने की गारंटी दी थी.
साल 2014 में हॉन्गकॉन्ग में 79 दिनों तक चले 'अम्ब्रेला मूवमेंट' के बाद लोकतंत्र का समर्थन करने वालों पर चीनी सरकार कार्रवाई करने लगी थी. इस आंदोलन के दौरान चीन से कोई सहमति नहीं बन पाई थी.
विरोध प्रदर्शनों में शामिल लोगों को जेल में डाल दिया गया था. आज़ादी का समर्थन करने वाली एक पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया और उस पार्टी के संस्थापक से इंटरव्यू करने पर एक विदेशी पत्रकार को वहां से निकाल दिया गया था.
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हॉन्गकॉन्ग में हज़ारों लोग विरोध क्यों कर रहे हैं
हॉन्गकॉन्ग के लोग प्रत्यर्पण क़ानून में संशोधन के प्रस्ताव का जमकर विरोध कर रहे हैं. इनका कहना है कि इसके बाद हॉन्गकॉन्ग के लोगों पर चीन का क़ानून लागू हो जाएगा और लोगों को मनमाने ढंग से हिरासत में ले लिया जाएगा और उन्हें यातनाएं दी जाएंगी.
सरकार अनदेखी क्यों कर रही है?
सरकार का कहना है कि ये संशोधन जल्द से जल्द पारित नहीं होते हैं तो हॉन्गकॉन्ग के लोगों की सुरक्षा ख़तरे में पड़ जाएगी और शहर अपराधियों का अड्डा बन जाएगा.
सरकार का कहना है कि नया क़ानून गंभीर अपराध करने वालों पर लागू होगा, जिसके तहत कम से कम सात साल की सज़ा का है. प्रत्यर्पण की कार्रवाई करने से पहले यह भी देखा जाएगा कि हॉन्गकॉन्ग और चीन दोनों के क़ानूनों में अपराध की व्याख्या है या नहीं.
इसके अलावा अधिकारियों का यह भी कहना है कि बोलने और प्रदर्शन करने की आज़ादी से जुड़े मामलों में प्रत्यर्पण की प्रक्रिया नहीं अपनाई जाएगी.
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सरकार पर भरोसा क्यों नहीं?
पिछले कुछ सालों में हॉन्गकॉन्ग की सरकार के प्रति लोगों का अविश्वास बढ़ा है कि वो बीजिंग के प्रभाव में आकर फैसले ले रही है.
हालांकि सरकार ने ज़ोर देकर कहा है कि वह राजनीतिक अपराधों के ख़िलाफ़ मुक़दमा नहीं चलाएगी. कइयों को डर है कि बीजिंग हॉन्गकॉन्ग के नागरिकों और विदेशियों के ख़िलाफ़ यह क़ानून ग़लत तरीके से इस्तेमाल करेगा.
विरोध में और कौन?
हॉन्गकॉन्ग में अमरीकी चैंबर ऑफ कॉमर्स के अलावा अमरीका ने प्रस्तावित संशोधन पर गहरी चिंता व्यक्त की है और कहा है कि वहां रहने वाले उनके नागरिकों और व्यावसायिक हितों पर इसका ग़लत असर पड़ेगा.
गुरुवार को ह्यूमन राइट वॉच, कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट, रेनबो एक्शन सहित 70 ग़ैर-सरकारी संस्थानों ने प्रस्तावों को वापस लेने की मांग की.
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क्या बीजिंग सुनेगा?
साल 2003 में भी राष्ट्रीय सुरक्षा पर लाए गए क़ानून के विरोध में प्रदर्शन हुए थे. उस समय चीन को पीछे हटना पड़ा था. हालांकि अभी के वक़्त में बीजिंग की पकड़ हॉन्गकॉन्ग पर कहीं अधिक मज़बूत है.
2014 में लोकतंत्र के समर्थन में हुए प्रदर्शन के बाद चीन का दबदबा दुनिया भर में बढ़ा है. इसकी अर्थव्यवस्था तेज़ी से मज़बूत हुई है.
अब आगे क्या?
रविवार को हुए बड़े प्रदर्शन के बाद सरकार ने कहा है कि 12 जून को वो एक बार फिर संशोधन के प्रस्तावों को पेश करेगी.
सरकार ने एक असाधारण क़दम उठाते हुए उस बिल समिति को दरकिनार कर दिया है, जिस पर प्रस्तावों की जांच का जिम्मा होता है.
कई सांसदों को निकाले जाने के बाद यह उम्मीद जताई जा रही है कि बाक़ी के सांसद सरकार की बात का समर्थन करेंगे और अगले एक सप्ताह में यह प्रस्ताव पारित कर दिया जाएगा.
रविवार के प्रदर्शन के आयोजनकर्ताओं ने लोगों से अनुरोध किया है कि वो अपने कामों से छुट्टी लेकर अपना समर्थन दें. राजनीतिक दल भी इस पर आपत्ति जता रहे हैं.
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