'पीएम मोदी तो ओमान के रास्ते उड़कर आ गए हम कैसे जाएं'?

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भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइज़ेशन या एससीओ की बैठक में हिस्सा लेने के लिए किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में हैं.
रिपोर्टों के मुताबिक़ यहां नरेंद्र मोदी की मुलाक़ात रूस और चीन के नेताओं से होगी.
बिश्केक में भारतीय छात्रों का कहना है जबसे पाकिस्तान ने ऊपर से उड़ान पर पाबंदी लगाई है तबसे उनकी परेशानियां बढ़ गई हैं.
पाकिस्तान के बालाकोट पर भारतीय हवाई हमले के बाद से पाकिस्तान ने अपने हवाई क्षेत्र के ऊपर से उड़ने पर पाबंदी लगा दी है.
रिपोर्टों के मुताबिक नरेंद्र मोदी ओमान, ईरान के रास्ते बिश्केक गए. बीबीसी संवाददाता विनीत खरे ने बिश्केक में पढ़ रहे कुछ भारतीय छात्रों से बात की.
कश्मीर के छात्र मलिक सैफ़ुल्लाह
मेरा नाम मलिक सैफ़ुल्लाह है. मैं श्रीनगर का रहने वाला हूँ. मैं बिश्केक की किर्गिस्तान स्टेट मेडिकल युनिवर्सिटी में बढ़ता हूँ.
यहां क़रीब 1,000 भारतीय छात्र पढ़ते हैं. जब से पाकिस्तान की ओर एयर स्पेस बंद होने की घोषणा हुई है, तब से छात्र बहुत परेशान हैं.
हमें टिकट तो मिल रहा है लेकिन एक तरफ़ जाने की क़ीमत है 500 अमरीकी डॉलर. पिछले साल 500 अमरीकी डॉलर में आने-जाने दोनो तरफ़ का खर्च निकल जाता था.
कुछ बच्चों को तो पिछले साल 400 डॉलर में टिकट मिल गए थे. ट्रैवल एजेंट के पास जाओ तो वो बोलते हैं कल आ जाओ. ऑनलाइन भी टिकट उपलब्ध नहीं हैं. इस कारण बहुत परेशानी है.
यहां ट्रैवेल एजेंट पहले ही टिकट बुक कर लेते हैं. इनको पता होता है कि जून में बच्चे भारत जाते हैं. इस कारण ऑनलाइन टिकट उपलब्ध नहीं रहता. घरवाले बार-बार फ़ोन कर रहे हैं.
मेरी (कश्मीर की) वजह से हिंदुस्तान और पाकिस्तान लड़ रहे हैं और ग़रीबी दोनो जगहों पर है.
एससीओ बहुत अच्छा मौक़ा है. इसमें चीन और रूस जैसे देश हैं जो दोनो देशों (भारत और पाकिस्तान को) को मामले को सुलझाने के लिए मजबूर कर सकते हैं.
कौन लोग परेशान हो रहे हैं- कश्मीर के लोग और भारतीय सेना. यहां (बिश्केक में) भारतीय और पाकिस्तानी बच्चे यहां एक ही थाली में खाते हैं.
हमने सोचा था कि जिस जगह ये सम्मेलन हो रहा है वहां हम एक शांति पूर्ण प्रदर्शन करेंगे और तख्तियां दिखाएंगे.
हम संदेश देने की कोशिश करेंगे कि आप लोग तो मज़े कर रहे हैं लेकिन हम मर रहे हैं. कम से कम हम लोगों का ख्याल करो.
मैं मध्यम वर्गीय परिवार से हूँ. तो हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं कि हम भारत में या किसी दूसरे देश में एमबीबीएस करें.
ये बहुत सस्ता देश है. जिस मेडिकल डिग्री पर भारत में 50 लाख लगेंगे, वो यहां 20 लाख रुपए में मिल जाती है.
भारत के स्तर की पढ़ाई यहां नहीं है लेकिन माहौल पढ़ाई का है. बहुत सारे बच्चों ने बैंक लोन ले रखा है. कुछ मां-बाप अपने बच्चों का पीएफ़ फंड निकाल कर देते हैं.
यहां रहकर ऐसा लगता है कि हम किसी यूरोप के देश में रह रहे हैं. लोगों का व्यवहार बहुत अच्छा है. खाना बहुत सस्ता है. यहां पर अपनी तरफ़ का खाना मिलता है. यहां भारत और पाकिस्तानी होटल और रेस्तरां हैं.

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बिहार के छात्र निर्मल कुमार
मेरा नाम निर्मल कुमार है. मैं बिहार के पूर्वी चंपारण का रहने वाला हूँ.
मैंने 19 जून का एयर अस्ताना से टिकट कटवाया था लेकिन वो फ्लाइट कैंसल हो गई. अब टिकट मिल नहीं रहा है. अब घर कैसे जाएं, यही समस्या है. छुट्टी के बाद एमबीबीएस का मेरा तीसरा साल शुरू होगा.
घर वाले बोल रहे हैं कि चले आओ जैसे भी आना हो. चेहरा देखना है बेटे का और यहां टिकट मिल नहीं रहा है.
दो दिन से उसी कारण टेंशन में हैं. अगर टिकट नहीं मिलेगा तो हमें यहीं रुकना होगा. दो दिन पहले ही परीक्षा ख़त्म हुई है.
पहले परीक्षा की टेंशन थी. परीक्षा ख़त्म हुई तो फ़्लाइट कैंसल हो गई. अब टिकट के लिए दौड़ रहे हैं. छुट्टी सितंबर के पहले हफ़्ते तक है. यहां हमारा टाइम बर्बाद हो रहा है.
छुट्टी के वख़्त यहां बिजली, गैस, पानी की भी समस्या हो जाती है. जब यहां भारतीय छात्रों की संख्या कम हो जाती है तो स्थानीय लोग भी समस्या खड़ी करते हैं.
यहां क़रीब 1,000 भारतीय छात्र हैं. जब भारतीय छात्रों की संख्या कम हो जाती है तो बाहर जाने पर मोबाइल, वॉलेट छीने जाने का ख़तरा बढ़ जाता है.
भाषा को लेकर पहले ही समस्या है. यहां लोग रूसी भाषा बोलते हैं. हमने भी थोड़ी बहुत रूसी भाषा सीखी है.
मैं नीट परीक्षा क्वालिफ़ाई नहीं कर पाया. भैया मोतीहारी में पढ़ते थे. वहीं मोतीहारी का एक बच्चा यहां पढ़ता था. मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया दफ़्तर में पता किया तो पता चला कि ये कॉलेज एमसीआई से संबद्ध है.

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उत्तर प्रदेश के छात्र हफ़ीज़ुर्रहमान
मेरा नाम हफ़ीज़ुर्रहमान है. मैं उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर का रहने वाला हूँ. मैं यहां बिश्केक में एमबीबीएस द्वीतीय साल का छात्र हूँ.
पहले साल में यहां ट्यूशन फ़ीस, रहने खाने में साल का क़रीब पांच लाख पड़ता है. दूसरे साल ये खर्च तीन, सवा तीन लाख में निपट जाता है.
भारत में खर्च कहीं ज़्यादा होता है. लोकल खाना तो उतना समझ में नहीं आता है इसलिए खाना ख़ुद ही बनाते हैं.
चावल, दाल, सब्ज़ी मिल जाती है तो घर में खाना बनाते हैं. मेरे पिता की खेती है और वो छोटा-मोटा व्यापार चलाते हैं. साल का खर्च अगर तीन लाख रुपए है तो वो थोड़ा-थोड़ा, जैसे 25 हज़ार, 30 हज़ार करके पैसा यहां भेजते रहते हैं.
यहां कॉलेज में पैसा एक साथ जमा करने की ज़रूरत नहीं होती. सेमेस्टरवाइज़ भी पैसा जमा कर सकते हैं. यहां हम बात कर लेते हैं कि पैसे की थोड़ी तंगी है. ऐसे थोड़ा-थोड़ा करके हो जाता है.
सालों की कोशिशों के बाद मेरा नीट में नहीं हुआ. फिर लगा कि वक़्त और पैसा दोनो बर्बाद हो रहे हैं.
भारत में प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में 20-25 लाख की तो डोनेशन लगती है. खोजते-खोजते यहां का पता लगा. यहां पढ़ाई सस्ती थी और भारत से नज़दीक भी था.
पहले 28-30 हज़ार में भारत आने-जाने का खर्च निकल जाता था. लेकिन इस बार पाकिस्तान के एयर स्पेस के बंद होने से बार-बार टिकट कैंसिल हो रहा है, किराए बढ़ गए हैं.
पहले जहां भारत जाने में साढ़े तीन घंटे लगते थे, अब करीब सात घंटे लगते हैं. लोगों की छुट्टियां बर्बाद हो रही है. जो ग़रीब है वो तो इतना पैसा दे नहीं सकता वो जाने में भी असमर्थ है. मैंने टिकट बुक नहीं किया था क्योंकि मेरा भारत जाने का प्लान नहीं था.
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