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श्रीलंका में सिलसिलेवार धमाकों के पीछे फैमिली नेटवर्क
- Author, अनबरासन इथिराजन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, श्रीलंका
बीते महीने श्रीलंका में हुए आत्मघाती हमलों में 250 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी. श्रीलंकाई लोगों को यह जानकर बहुत बड़ा झटका लगा था कि उन हमलों के पीछे स्थानीय मुसलमानों का हाथ हो सकता है. साथ ही यह सवाल भी उठता है कि आखिर एक छोटे से समूह के इतने बड़े विनाशकारी कदम का पता क्यों नहीं लगाया जा सका.
इससे जुड़े सुराग जनवरी के मध्य में तब मिले थे जब श्रीलंकाई पुलिस को देश के पश्चिमी तट पर पुट्टलम ज़िले में स्थित विलपट्टु नेशनल पार्क के पास एक नारियल के बगीचे से 100 किलो विस्फोटक, 100 डेटोनेटर बरामद हुए थे.
तब पुलिस संदिग्ध इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा बुद्ध की मूर्तियों पर हमले की जांच में जुटी थी. पुलिस ने तब नवगठित 'कट्टरपंथी मुस्लिम समूह' के चार लोगों को गिरफ़्तार किया था.
इसके तीन महीने बाद, संदिग्ध इस्लामिक कट्टरपंथियों ने कोलंबो, नेगोंबो और पूर्वी शहर बट्टिकलोवा में 40 विदेशियों समेत 250 लोगों की निर्मम हत्या करने के लिए खुद को चर्चों और होटलों में उड़ा लिया था.
लेकिन नारियल के बगीचे में मिले विस्फ़ोटक एक मात्र ऐसी घटना नहीं थी. ये उन दिनों हुई ऐसी कई घटनाओं में से एक थी जिससे ख़तरे की घंटी बजनी चाहिए थी, खासकर तब जब ये रिपोर्ट दी गई थी कि कई श्रीलंकाई जो सीरिया में इस्लामिक स्टेट समूह में शामिल हुए थे वो घर वापस लौट आए हैं.
लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
हम जानते हैं कि ईस्टर रविवार का नरसंहार पड़ोसी देश भारत और अमरीका की ख़ुफिया सेवाओं की संभावित हमलों को लेकर दी गई बार-बार चेतावनी के बावजूद हुआ.
अब इन धमाकों के बाद ही पुलिस पुट्टलम में जनवरी में हुई गिरफ़्तारी और बड़े पैमाने पर हताहतों के मास्टरमाइंड के बीच संबंध जोड़ना शुरू किया है..
फैमिली सर्कल
श्रीलंका सरकार में शीर्ष स्तर पर राजनीतिक अंतर्द्वंद्व और गुटबाजी चल रही है और यह एक बड़ा कारण है कि दी गई चेतावनियों की अनदेखी की गई, लेकिन 2009 में गृह युद्ध की समाप्ति के बाद से आत्मसंतोष ने भी इसमें एक किरदार अदा किया.
तमिल अल्पसंख्यक अलगाववादियों और सरकार के बीच युद्ध की समाप्ति के बाद से मुस्लिम विरोधी छिटपुट दंगों ने गुस्सा और और असंतोष पैदा किया था, लेकिन सामने ऐसा कुछ भी नहीं था जो इतने बड़े स्तर पर समन्वित हमलों की ओर इशारा करते.
श्रीलंका में ईस्टर संडे को हुए इन हमलों पर अपनी नज़र रखने वाले आतंकरोधी टीम के सदस्य कहते हैं, "इस्लामिक कट्टरपंथियों ने इन विस्फ़ोटों से न केवल सभी को हैरान किया बल्कि उन्होंने इस पूरे ऑपरेशन को गुप्त रखा."
इसके लिए विस्तृत योजना, सुरक्षित घर, प्लानर्स और हैंडलर्स का एक व्यापक नेटवर्क, बम बनाने में विशेषज्ञता और पैसों की ज़रूरत होती- यह सब रडार पर आने से कैसे बच सका?
इनमें से कुछ सवालों के जवाब मिले हैं लेकिन सुरक्षा एजेंसियों, सरकारी अधिकारियों और स्थानीय मुस्लिम नेताओं से जुड़े सूत्रों ने एक खाका खींचा है कि कैसे कई वर्षों से कट्टरपंथी और इस्लामिक स्टेट से सहानुभूति रखने वालों ने सुरक्षा बलों की नाक के नीचे ये समूह खड़ा किया.
जांचकर्ता कहते हैं कि कुछ परिवारों के लोग कट्टरपंथी बन गए और ऐसी गुटों का संचालन करने लगे.
जांच की संवेदनशीलता को देखते हुए अपनी पहचान को गोपनीय रखने का अनुरोध करते हुए आतंकरोधी एजेंट का कहना है, "इस प्रकार वो अपने इरादे और अपनी गतिविधियों को खुद तक ही सीमित रखते रहे."
प्रत्येक इकाई एक बड़े नेटवर्क का निर्माण करते हुए अन्य कट्टरपंथी पारिवारिक समूहों के साथ संपर्क करती. माना जाता है कि ये सूचना को वफ़ादारी के साथ नेटवर्क के भीतर तक ही सीमित रखते थे.
सोशल मीडिया नेटवर्क और मैसेजिंग ऐप के ज़रिए सूचनाओं और योजनाओं को अमल में लाने में आसानी होती थी.
उन्होंने कहा, "जांचकर्ता अब यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि ये लोग किस तरह आपसी संवाद और आपस में तालमेल बिठाते थे."
पूर्व जांचकर्ता ने कहा, "कट्टरपंथियों का अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए परिवारों का उपयोग करना एक नई चीज़ निकल कर सामने आई है. हमने देखा है कि कैसे इंडोनेशिया में (चर्च और पुलिस इमारत पर) हुए आत्मघाती हमलों में कुछ परिवार शामिल थे."
माना जाता है कि कट्टरपंथ से जुड़े 70 लोगों को अब तक गिरफ़्तार किया गया है. लेकिन इसे लेकर कोई भी आश्वस्त नहीं है कि यह नेटवर्क ध्वस्त हो गया है.
अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीते हफ़्ते बताया, "इन हमलों में शामिल मुख्य लोग और जिन लोगों ने बम बनाया था, वे अभी भी फरार हैं... इसलिए फिर से ऐसे हमलों की चेतावनी दी जा रही है."
वो कहते हैं, "आतंकवाद के पारंपरिक सिद्धांत के अनुसार, एक आत्मघाती हमलावर को कम-से-कम पांच हैंडलरों की ज़रूरत होती है. अगर इसे मान कर चलें तो भी नौ आत्मघाती हमलों में शामिल 45 ऐसे हैंडलर अब भी पकड़ से बाहर हैं. इसे लेकर ही हम चिंतित हैं."
जबकि यह उसके ठीक उलट है जैसा प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे कहते हैं. हाल ही में उनका कहा था कि सीरियल विस्फ़ोटों से जुड़े सभी संदिग्ध या तो पकड़ लिये गए हैं या मार दिये गए हैं.
श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंहली और तमिलों के बाद मुसलमानों की आबादी है जिसे इन विस्फ़ोटों ने सुर्खियों में ला दिया है. देश की 2.2 करोड़ की आबादी में मुसलमानों की संख्या क़रीब 10 फ़ीसदी है.
गृहयुद्ध के दौरान, मुसलमानों को तमिल टाइगर के विद्रोहियों के हाथों नुकसान उठाना पड़ा था. 1990 में विद्रोहियों ने क़रीब 75 हज़ार मुसलमानों को श्रीलंका के उत्तरी इलाकों से भगा दिया था. उसी वर्ष पूरब में मस्जिद पर हुए हमले में क़रीब 150 लोग मारे गए थे.
बाद में, सैकड़ों की संख्या में मुसलमान श्रीलंकाई सुरक्षा बलों में शामिल हो गए. ख़ुफ़िया एजेंसियों में ऐसे ही लोगों की मांग रही है क्योंकि उनमें से अधिकांश मुसलमान धाराप्रवाह सिंहला और तमिल भाषा बोलते हैं. लेकिन जब श्रीलंकाई सरकार तमिल विद्रोहियों से लड़ रही थी, तब एक बहुत ही रुढ़िवादी इस्लामिक आंदोलन पूरब के मुस्लिम बहुत इलाकों में धीरे-धीरे अपने पांव जमाने लगा था.
पूर्वी शहर कट्टनकुड़ी के मस्जिद संघ के एक अधिकारी मज़ूक अहमद लेब्बे कहते हैं, "यह सब शुरू हुआ था तीन दशक पहले. तब वहाबी इस्लाम ने युवाओं को अपनी तरफ आकर्षित करना शुरू किया था, उन्हें विदेशों से वित्तीय सहायता मिलती थी."
इस शहर की आबादी 47 हज़ार है, जो लगभग पूरी तरह से मुस्लिम हैं. शहर के मध्य में स्थित यहां की कुछ दुकानें मुस्लिम महिलाओं के पहने जाने वाले पूरी लंबाई के काले लिबास 'अबाया' को बेचते हैं.
शहर रंगीन गुंबदों और मीनारों से अटा पड़ा है.
कट्टनकुड़ी में क़रीब 60 मस्जिदें हैं और कई निर्माणाधीन भी हैं. मुस्लिम समुदाय के नेताओं का कहना है कि जहां ज़्यादातर मस्जिदें उदारवादी और मुख्य धारा की शिक्षा का पालन करते हैं वहीं कुछ इस्लाम के अति रुढ़िवादी संस्करण का प्रचार करते हैं.
कट्टरपंथ की तरफ आकर्षित होने वालों में एक कट्टरपंथी उलेमा मोहम्मद ज़हरान हाशिम भी थे, सरकार का कहना है कि वो संडे ईस्टर के दिन हुए हमले में शांग री ला होटल के आत्मघाती हमलावर थे.
हाशिम के पिता ने उन्हें उनकी शिक्षा के लिए एक धार्मिक स्कूल में भेजा था. लेकिन उन्होंने जल्द ही यह कहना शुरू कर दिया था कि शिक्षक सच्चे इस्लाम का पालन नहीं कर रहे. उन्हें मदरसे से निकाल दिया गया लेकिन उन्होंने अपने दम पर धार्मिक पढ़ाई जारी रखी. बाद में वो उलेमा बने और साथ ही स्थानीय मस्जिदों की स्थापित प्रथाओं को उन्होंने चुनौती दी.
मज़ूक अहमद लेब्बे कहते हैं, "हम उनके विचारों से असहमत थे. इसलिए हमने उन्हें हमारी किसी भी मस्जिद में उपदेश देने की अनुमति नहीं दी. इसके बाद उन्होंने अपने समूह का गठन कर लिया."
हाशिम ने शुरू में 'दारुल अतहर' नामक एक रुढ़िवादी समूह की स्थापना की और बाद में 2014 के क़रीब उन्होंने कट्टरपंथी नेशनल तौहीद जमात (एनटीजे) का गठन किया. यही वो समूह है जिस पर सरकार ने श्रीलंका में हुए सीरियल ब्लास्ट का आरोप लगाया है.
इसके सदस्यों को पहले बुद्ध प्रतिमाओं को तोड़ने और अन्य मुस्लिम समूहों के साथ टकराव के लिए जाना जाता था. लेकिन संडे ईस्टर के दिन हुए हमले में इनके शामिल होने की बात पर यहां कई लोग हैरान हैं.
अपने शुरुआती वर्षों में, एनटीजे को विदेश से चंदा मिलता था, खास कर भारत, मलेशिया और मध्य पूर्व से. इन पैसों से इस समूह ने कट्टनकुड़ी के समुद्र तटों के क़रीब मस्जिदें बनवाईं. सरकार ने इन हमलों के बाद एनटीजे पर प्रतिबंध लगाने के साथ ही इन मस्जिदों को भी सील कर दिया है.
उपदेशक के रूप में हाशिम को वहाबी परंपरा से प्रेरणा मिली, इसे मानने वाले इस्लाम के कठोर रूप का पालन करते हैं.
लेकिन कट्टनकुड़ी में मुस्लिम कहते हैं कि उन्होंने इससे आगे बढ़ते हुए एक बेहद ही चमरपंथी विचारधारा को अपनाया. एनटीजे ने शहर के सूफी मुसलमानों के छोटे समुदायों के ख़िलाफ़ अभियान चलाया.
2017 में हाशिम और एनटीजे के सदस्य एक समारोह के दौरान अपनी हाथों में तलवारें लहराते हुए सूफी मुसलमानों से भिड़ गये थे.
हाशिम के भाई समेत एनटीजे के दस सदस्यों को गिरफ़्तार किया गया था. लेकिन हाशिम और उनके भाई रिलवान गिरफ़्तारी से बचते हुए कहीं छिप गये थे. बहुत आलोचनाओं के बाद एनटीजे ने कहा कि उन्हें निष्कासित कर दिया गया है, लेकिन कुछ मुस्लिम नेताओं का कहना है कि हाशिम इस समूह में हमेशा ही प्रभावशाली बने रहे.
छिपने के दौरान, उन्होंने सोशल मीडिया पर हेट स्पीच वीडियो जारी करना शुरू किया, जिसमें 'नास्तिकों' पर हमले किये गये. ऐसा आभास होता है कि हाशिम ने अपने समूह के अधिकांश लोगों को अपने चरमपंथी तरीके से सोचने के लिए तैयार करते हुए उन्हें हिंसा का रास्ता अपनाने के लिए मना लिया था.
मज़ूक अहमद लेब्बे कहते हैं, "यह एक सामान्य मुस्लिम परिवार था. हाशिम के पिता एक ग़रीब पृष्ठभूमि से आए थे और यहां के समुदाय के बीच जाने जाते थे. हाशिम एक अच्छे उलेमा और कुरान जानने वाले थे. किसी ने भी यह सोचा नहीं था कि हाशिम और उनका परिवार ऐसी हरकत कर सकता है."
हाशिम के रिश्तेदार और एनटीजे के एक पूर्व सदस्य कहते हैं, "मैं ईस्टर संडे के हमलों से एक हफ़्ते पहले ज़हरान के पिता और उनके एक भाई से मिला था. लेकिन तब उन्होंने सामान्य व्यवहार किया. हमारे लिए यह अब भी एक रहस्य है कि वो कैसे इस हद तक कट्टरपंथी हो गए."
समझा जाता है कि ज़हरान हाशिम के माता-पिता, दो भाई और उनका परिवार इन हमलों के कुछ दिन बाद ही 26 अप्रैल को कट्टनकुड़ी के दक्षिण में स्थित सैंथामारुथु शहर में मारा गया था.
तीन लोगों ने विस्फ़ोटक से खुद को उड़ा लिया, कई बच्चों समेत कुल 15 लोग मारे गए.
उस हमले के बाद मलबे में पुलिस को मंदिरों में प्रार्थना के दौरान बौद्ध महिलाओं के पहने जाने वाले सफ़ेद कपड़े मिले थे. संदेह है कि चरमपंथियों ने मई में मनाए जाने वाले बौद्ध त्योहार वेसाक के दौरान भेष बदल कर मंदिरों में प्रवेश कर हमलों को अंजाम देने की और भी योजनाएं बनाई थीं.
मौके पर मौजूद एक अधिकारी ने बताया, "हमें दुकान के ख़रीदे गए नौ सेटों में से पांच का ही पता चल सका है. चार सेट अब भी गायब हैं." उस हमले में हाशिम की पत्नी और बेटी घायल अवस्था में बच गईं.
24 अप्रैल को, हाशिम की बहन मदानिया ने बीबीसी से कहा कि वो अपने भाई के उठाये कदम की कड़ी निंदा करती हैं और साथ ही उन्होंने बताया कि दो साल से उन दोनों के बीच कोई संपर्क नहीं था. उन्होंने बताया कि विस्फ़ोटों के कुछ समय पहले से ही उन्हें अपने परिवार के इन सदस्यों को बारे में न कुछ सुना और न ही देखा, वो उन कुछ सदस्यों में हैं जो इस नेटवर्क का हिस्सा नहीं थीं.
एक हफ़्ते बाद, पुलिस ने यह कहते हुए मदानिया को गिरफ़्तार कर लिया कि उनके घर पर छापे के दौरान 20 लाख श्रीलंकाई रुपये पाये गए हैं.
उन्होंने आरोप लगाया कि धमाकों से कुछ दिन पहले ही उन्होंने कोलंबों में अपने भाई से ये रुपये लिए थे. मदानिया गिरफ़्तार हैं, लिहाजा उनकी प्रतिक्रिया नहीं आई है.
कट्टरता
कुछ लोगों का मानना है कि फ़रवरी 2018 में कैंडी ज़िले में हुए मुस्लिम विरोधी दंगों ने कई लोगों को चरमपंथ की ओर धकेल दिया होगा.
उसमें कम से कम दो लोग मारे गये और एक मस्जिद में आग लगा दी गई थी. हिंसा में सैकड़ों घर क्षतिग्रस्त कर दिये गए थे, तब वहां आपात स्थिति की घोषणा कर दी गई थी.
स्थानीय मुसलमानों ने मुझे बताया कि उन्हें इस घटना के बाद लगा कि सरकार ने उनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाये.
लेकिन उन दंगों से कई वर्ष पहले ही बहुत कम संख्या में मुस्लिम युवा कट्टरपंथी बने थे. अधिकारियों का कहना है कि 2014 में सीरिया और इराक में चरमपंथी समूह के ख़िलाफ़त की घोषणा किये जाने के बाद दर्जनों लोग आईएस की ओर आकर्षित हुए थे.
आईएस में शामिल होने वाले पहले श्रीलंकाई
मध्य श्रीलंका के एक स्कूल प्रिंसिपल, मोहम्मद मुहसिन निलम, सीरिया में आईएस में शामिल होने वाले पहले श्रीलंकाई थे. 2015 में रक्का में उनकी मौत हो गई.
आतंकरोधी एजेंट ने बताया, "ऐसा माना जाता है कि ईस्टर संडे को हुए हमले के लिए ज़िम्मेदार आत्मघाती हमलावरों को कट्टरपंथी बनाने में उनकी प्रमुख भूमिका थी."
यह स्पष्ट नहीं है कि क्या ईस्टर संडे का कोई हमलावार वास्तव में कभी सीरिया गया भी था या नहीं. जांचकर्ता कहते हैं अब्दुल लतीफ मोहम्मद जमील 2014 में तुर्की गये थे लेकिन फिर वो लौट आए.
चाय के धंधे से जुड़े एक धनी परिवार से ताल्लुक रखने वाले जमील ने सीरिया जाने से पहले ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई की थी. 21 अप्रैल को उनका निशाना कोलंबो का लग्जरी ताज होटल था लेकिन शायद उनका बम नहीं फटा और उन्हें परिसर से बाहर जाते देखा गया. बाद में उन्होंने देहिवाला उपनगर के एक मोटल में खुद को उड़ा लिया, जिसमें दो मेहमानों की मौत हो गई थी.
जांचकर्ताओं को संदेह है कि 37 वर्षीय चार बच्चों के पिता जमील ही स्थानीय कट्टरपंथियों और विदेश में स्थित आईएस या अन्य इस्लामिक समूह के बीच की कड़ी थे.
कई साल पहले, उनका परिवार उनके कट्टर विचारों को लेकर चिंतित था और उस दौरान उन्होंने एक सुरक्षा अधिकारी की मदद भी ली थी.
अधिकारी ने कहा, "वह पूरी तरह कट्टरपंथी था और चरमपंथी विचारधारा का समर्थन करता था. मैंने उससे तर्क करने की कोशिश की. जब मैंने उससे पूछा कि वो इसमें कैसे आए तो उन्होंने कहा कि लंदन में एक कट्टरपंथी ब्रिटिश उपदेशक अंजम चौधरी के प्रवचनों में भाग लेता था. उन्होंने कहा कि उसी दौरान दोनों की मुलाकात हुई थी."
अंजम चौधरी को ब्रिटेन के सबसे प्रभावशाली और ख़तरनाक कट्टरपंथी प्रचारकों में से एक माना जाता है. उन्हें इस्लामिक स्टेट समूह के पक्ष में समर्थन मांगने के लिए 2016 में दोषी ठहराते हुए जेल में डाल दिया गया था लेकिन 2018 में उन्हें रिहा कर दिया गया था.
जमील के दोस्तों ने कहा कि इराक पर अमरीकी हमले ने उनके कट्टर विचारों और आकार देने में एक प्रमुख भूमिका निभाई थी. जांचकर्ताओं का मानना है कि 2009 में ऑस्ट्रेलिया जाने के बाद वो और अधिक कट्टरपंथी बन गये. चार साल बाद जब वो श्रीलंका लौटे तो उन्हें निगरानी में रखा गया था, हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह निगरानी कितने समय तक चली थी.
मसाला व्यापारी
यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि हाशिम और पूर्व के एक मौलवी कोलंबो के एक धनी मसाला व्यापारी के दो बेटों, इंसाफ अहमद और इल्हाम इब्राहिम, के साथ संपर्क में कैसे आए. ये दोनों भाई भी ईस्टर संडे के हमले में शामिल थे.
मुस्लिम समुदाय के एक सामाजिक व्यक्ति ने मुझे बताया कि हाशिम ने मध्य श्रीलंका के कुरुनगाला क़स्बे की एक महिला से शादी की थी. ज़हरान हाशिम के साथ शांग री ला पर हमला करने वाले इल्हाम इब्राहिम अपने परिवार के माटेला स्थित मसाला फ़ार्म का संचालन करते थे. ये कुरुनगाला से पचास किलोमीटर दूर है. शक है कि इल्हाम और हाशिम इसी इलाक़े में संपर्क में आए.
पहले धमाके के कुछ घंटे बाद ही पुलिस ने कोलंबो को डेमाटागोड़ा इलाक़े में इल्हाम इब्राहिम के विला पर छापा मारा था. पुलिस के मुताबिक उनकी पत्नी फ़ातिमा इब्राहिम ने आत्मघाती धमाका कर दिया जिसमें उनके तीन बच्चे और तीन पुलिस अधिकारी भी मारे गए.
अधिकारी और सुरक्षा विशेषज्ञ स्पष्ट तौर पर मानते हैं कि नौ आत्मघाती धमाके करने के लिए भारी पैसे के अलावा सावाधानीपूर्वक पूरी तैयारी की गई थी.
धमाके के एक सप्ताह बाद दो अन्य संदिग्धों मोहम्मद अब्दुल हक़ और मोहम्मद शहीद अब्दुल हक़ को बीच शहर मावानेल्ला से गिरफ़्तार किया गया. उन पर इब्राहिम भाइयों के साथ संपर्क रखने का शक़ है.
पूर्व ख़ुफिया अधिकारी ने बताया, "जांचकर्ताओं को हक़ भाइयों का एक सुरक्षित ठिकाना मिला है जो पुत्तलम ज़िले में एक समुद्री ताल के किनारे है. जांचकर्ताओं को ऐसे सबूत मिले हैं जो इशारा करते हैं कि इस संपत्ति को ख़रीदने का पैसा इब्राहिम बंधुओं ने दिया था."
इब्राहिम बंधुओं के पिता मोहम्मद इब्राहिम अभी भी हिरासत में हैं. कोलंबो के व्यापारियों के बीच उनकी अच्छी पहचान है. राजनीतिक जगत में उनके ग़हरे संबंध हैं और वो एक बार चुनाव भी हार चुके हैं. उन पर कोई आरोप तय नहीं किया गया है और हिरासत में लिए जाने के बाद से उनके बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है.
जांचकर्ताओं का मानना है कि जमील ने ही इब्राहिम बंधुओं को प्रभावित किया था. दोनों परिवार की अच्छी जान पहचान थी.
राजनीतिक गुट
श्रीलंका के लोग अभी इन हमलों के दर्द और सदमे से पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं. इन हमलों के बाद सरकार के रवैये और इन पर हुई राजनीति से भी वो इतने ही व्यथित हैं.
राष्ट्रपति मैत्रीपाला सीरीसेना और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमासिंघे अलग-अलग राजनीतिक दलों से हैं और एक दूसरे के विरोधी हैं. एक दूसरे का प्रभाव कम करने या नीचा दिखाने के उनके प्रयासों ने सरकार के शुरुआती दिनों में ही फासला बढ़ा दिया था और संवाद टूट सा गया था.
देश के सैन्य बल राष्ट्रपति के निर्देश में ही काम करते हैं. हमलों के तुरंत बाद ही, प्रधानमंत्री ने बयान दे दिया था कि भारत से मिली ख़ुफ़िया जानकारियों को उनसे साझा नहीं किया गया था. राष्ट्रपति ने भी ये कहा था कि शीर्ष ख़ुफ़िया अधिकारियों ने उनसे भी जानकारी को साझा नहीं किया था.
मानवाधिकार अधिवक्ता भवानी फोंसेका कहती हैं कि दोनों नेताओं के बीच कड़वाहट ने देश पर भी नकारात्मक असर डाला है. "इससे सुरक्षा कैसे प्रभावित हुई इस बारे में और भी बहुत कुछ है. और ये बहुत परेशान करने वाली बात है."
सरकार के विभिन्न तंत्रों के बीच संवाद की कमी तब और स्पष्ट हो गई जब दो मंत्रियों ने एक दूसरे पर मारे गए लोगों की संख्या ग़लत बताने के आरोप लगाए. हमले में मारे गए लोगों की संख्या को हमले के पांच दिन बाद कम किया गया. मृतकों की अधिकारिक संख्या में सौ से अधिक की कमी की गई.
एक समय तो, श्रीलंका के अधिकारियों को एक अमरीकी महिला को ग़लत तरीके से संदिग्ध बताने पर माफ़ी तक मांगनी पड़ी.
बीबीसी से बात करने वाले अधिकतर सरकारी अधिकारियों ने माना है कि स्लीपर सेल अभी भी सक्रिय हो सकते हैं.
लेकिन इससे ये सवाल भी उठता है कि इस्लामिक स्टेट श्रीलंका जैसे देश को, जहां मुसलमान अल्पसंख्यक हैं, क्यों निशाना बना रहा है.
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया कि इस्लामिक स्टेट का सीरिया और इराक़ से तो सफ़ाया हो गया है लेकिन वो अब श्रीलंका को अपनी ख़िलाफ़त (इस्लामी साम्राज्य) के हिस्से के तौर पर देख रहा है.
इसी बीच राष्ट्रपति सिरिसेना ने बीबीसी से कहा, "उन्होंने ऐसे देश को निशाना बनाया है जहां हाल ही में शांति स्थापित हुई है. ऐसा उन्होंने ये संदेश देने के लिए किया है कि आईएस अभी ज़िंदा है."
श्रीलंका एक युद्ध प्रभावित देश है जहां की जनता ने दशकों तक हिंसा के दंश को झेला है. लेकिन इस बार जिस बल से उन्हें मुक़ाबला करना है वो अदृश्य है और वो अपनी प्रेरणा और संभवतः सहयोगी भी अंतरराष्ट्रीय टेरर नेटवर्क से ले रहा है.
ये संघर्ष लंबा चल सकता है और बहुत से लोगों को डर है कि जब तक देश की राजनीति बंटी रहेगी, देश पर ख़तरा बना रहेगा.
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