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भारत को इतने झटके क्यों दे रहे हैं डोनल्ड ट्रंप
- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, नई दिल्ली
1990 के दशक के बाद से अमरीका और भारत के रिश्तों में गर्मजोशी बढ़ती गई. अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बाद से दोनों देशों के राष्ट्र प्रमुखों ने एक दूसरे को स्वाभाविक साझेदार माना.
भारत को अमरीका के क़रीब आने में लंबा वक़्त लगा क्योंकि भारत और रूस में रणनीतिक साझेदारी ऐतिहासिक रूप से रही है. राष्ट्रपति ट्रंप के कारण एक बार फिर से दोनों देशों के रिश्तों में अविश्वास बढ़ा है.
ट्रंप भारत को एचबी-1 वीज़ा और मेटल्स टैरिफ़ पर पहले ही झटका दे चुके हैं. अमरीका और भारत की दोस्ती को लेकर कहा जाता है कि अमरीका एक ऐसी शक्ति है जिस पर भरोसा करना मुश्किल होता है और भारत इसी वजह से इस दोस्ती को लेकर अनिच्छुक रहता है.
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के भारत को 'जीएसपी स्कीम' (जनरल सिस्टम ऑफ़ प्रिफरेंसेज़) से बाहर करने के फ़ैसले से न केवल भारत के साथ रणनीतिक रिश्ते पर इसका प्रतिकूल असर पड़ रहा है बल्कि इससे चीनी निर्यात को भी बढ़ावा मिल सकता है.
चार मार्च 2019 को राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रिफ्रेंशियल ट्रेड पॉलिसी के जनरल सिस्टम ऑफ़ प्रिफरेंसेज़ से भारत को हटाने के अपने इरादे की सूचना देने के लिए कांग्रेस को चिट्ठी लिखी.
अब तक इस नीति की वजह से भारत से अमरीका जाने वाले 1930 उत्पाद अमरीका में आयात शुल्क देने से बच जाते थे.
इस स्कीम के तहत अमरीका 121 विकासशील देशों और 44 अत्यंत पिछड़े देशों से निर्यात को प्रोत्साहन देने के लिए अपने यहां आयात शुल्क पर विशेष छूट देता है.
इसका उद्देश्य इन देशों में 'आर्थिक विकास और विकास को बढ़ावा' देना है.
हालांकि भारत सरकार ने यह नोट किया कि अमरीका से मिल रही रियायत के कारण देश को शुल्क में छूट से सालाना महज 190 मिलियन डॉलर का फ़ायदा हो रहा है.
लेकिन ट्रंप के इस फ़ैसले से भारत-अमरीका के रिश्ते अन्य कई स्तर पर भी प्रभावित होंगे.
इसके अलावा, भारत को जीएसपी स्कीम से बाहर करने का प्रभाव कुछ अन्य देशों के साथ भी हो रहे अमरीकी व्यापार पर पड़ेगा. ख़ास तौर पर चीन के साथ.
अमरीका-भारत संबंध पर संकट
जीएसपी स्कीम के बाबत विभिन्न देशों की योग्यता को लेकर अप्रैल 2018 में ही अमरीकी व्यापार प्रतिनिधि दफ़्तर ने समीक्षा शुरू कर दी थी. भारत को मिल रहे जीएसपी लाभ को रद्द करने का निर्णय उसी का परिणाम है.
अमरीकी डेयरी और चिकित्सा उपकरणों का बाज़ार इस समीक्षा के महत्वपूर्ण बिंदुओं में से था. अगले 10 महीनों के दौरान दोनों देशों ने आपसी सहमति से व्यापार समझौते पर बातचीत करने का प्रयास किया.
अन्य मुद्दे जैसे कि स्थानीय उत्पाद नियम, मूल्य नियंत्रण, डेटा लोकलाइजेशन को लेकर नियम और ई-कॉमर्स को लेकर एफडीआई नियमों में बदलाव भी इस एजेंडा के हिस्सा बन गए.
हालांकि, नए नीति विवाद ने इस तथ्य को नज़रअंदाज किया कि बीते वर्ष की तुलना में अमरीका-भारत व्यापार में वृद्धि हुई थी.
दिसंबर 2017 और नवंबर 2018 के बीच भारत से अमरीकी निर्यात में 16.7 फ़ीसदी की वृद्धि हुई जबकि इसी दरम्यान भारत के लिए अमरीकी निर्यात में 27 फ़ीसदी की वृद्धि देखी गई.
ऐसे वक़्त में जब दोनों देशों के बीच व्यापार में वृद्धि हुई हुई, जीएसपी को रद्द करना व्यापार पर प्रतिकूल असर डाल सकता है.
उधर भारत ने जीएसपी स्कीम से हटाए जाने के जवाब में इस उम्मीद में स्टील और एल्यूमिनियम पर लगने वाले आयात शुल्क में वृद्धि को स्थगित रखा कि भविष्य में अमरीका के साथ कोई अनुकूल समझौता तक पहुंचा जा सकता है.
भारत के कॉमर्स सेक्रेटरी ने इस पर कहा भी कि भारत 'जीएसपी स्कीम' से बाहर करने के फ़ैसले को इस बातचीत से दूर रखेगा, जो भविष्य में भी बदल सकता है और इस तेज़ी से बढ़ते व्यापार संबंधों को ख़तरा पैदा कर सकता है.
अमरीका और भारत ने अपने व्यापर संबंधों को भी आगे बढ़ाने के लिए क़दम उठाए हैं. भारत ने सितंबर 2018 में सैन्य संचार से संबंधित समझौते कम्युनिकेशंस कम्पैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट (कॉमकासा) पर हस्ताक्षर किए तो अमरीका ने खुले और मुक्त भारत-प्रशांत क्षेत्र रणनीति में भारत के किरदार को एक निश्चित रूपरेखा दी.
दोनों देशों के बीच रक्षा संबंध लगातार आगे बढ़ रहे हैं लिहाजा इन्हें इस बात को लेकर भी सचेत रहना होगा कि कहीं व्यापार विवाद का यह मुद्दा अन्य रिश्तों पर असर न डाले.
चीनी उत्पाद के लिए लाभ की स्थिति
भारत को 'जीएसपी स्कीम' से बाहर करने के फ़ैसले से चीन के लिए अमरीका के साथ अपने व्यापार को विस्तार देने के नए अवसर पैदा होंगे. चीन दोनों देशों (भारत और अमरीका) से आयात की तुलना में उन्हें निर्यात ज़्यादा करता है.
जीएसपी स्कीम के लिए भारत की योग्यता की समीक्षा पर यूनाइटेड स्टेट ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (यूएसटीआर) के फ़ैसले के जवाब में भारत के कई व्यापारिक समुदायों ने यह चेतावनी दी है कि भारत को इससे अलग करने से चीन को सीधा लाभ मिलेगा.
उदाहरण के लिए, फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने तर्क दिया कि 'जीएसपी स्कीम के लाभ से भारत हटेगा तो अमरीका जा रहे निर्यात में भारत का स्थान चीन ले लेगा.'
कई उत्पाद जैसे कि थोक औद्योगिक बैग्स, जूते और प्लास्टिक, जीएसपी स्कीम के बगैर चीनी सामानों की तुलना में कम प्रतिस्पर्धी बन सकते हैं.
इंडियन फ्लेक्सिबल इंटरमीडिएट बल्क कंटेनर्स (एफआईबीसी) असोसिएशन के महासचिव उमेश आनंदानी ने लिखा, "भारत और चीन अमरीका में इन एफ़आईबीसी बैग के दो सबसे बड़े निर्यातक हैं और वहां के बाज़ार पर इन दोनों देशों का लगभग बराबर का हिस्सा है."
जीएसपी लाभ के बगैर, ये औद्योगिक बैग्स चीन की तुलना में कम प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे और इसकी वजह से चीन को अमरीकी बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने में मदद मिलेगी.
इसी प्रकार, अमरीकन अपैरल ऐंड फुटवियर असोसिएशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष नैट हरमन ने तर्क दिया कि "जीएसपी तक, अमरीका के आयातित ट्रैवल उत्पादों में से 85 प्रतिशत हिस्से पर अकेले चीन का नियंत्रण है. अब यदि भारत, इंडोनेशिया और थाइलैंड से जीएसपी के तहत मिल रहे लाभों को वापस ले लिया गया तो अमरीकी कंपनियों के पास कोई और विकल्प नहीं रह जाएगा. उन्हें चीनी कंपनियों से ही अपने सामानों की सोर्सिंग करनी पड़ेगी."
यह तर्क इस बात की ओर इशारा करता है कि भारत के लिए जीएसपी के लाभ को रद्द करने का यह फ़ैसला चीनी सामानों के लिए कितना फ़ायदेमंद है.
जीएसपी लाभार्थी देश की सूची से भारत को हटाने की ट्रंप की पहल के बाद भी दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते एक नए स्तर पर पहुंचे हुए हैं.
दोनों देशों ने हाल के वर्षों में अपने संबंधों को मजबूत करने की दिशा में क़दम उठाए हैं, लेकिन इस व्यापक व्यापारिक रिश्ते में भारत पर इसका असर पड़ सकता है.
उधर भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते में दूरी से अमरीका का व्यापार घाटा और बढ़ सकता है और साथ ही इससे वैश्विक व्यापार को लेकर ट्रंप प्रशासन की चिंताएं बढ़ेंगी.
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