You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
समझौता एक्सप्रेस: मेरी आंखों के सामने दो बेटियां और तीन बेटे ज़िंदा जल गए
- Author, शुमाइला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, फ़ैसलाबाद (पाकिस्तान)
पाकिस्तान के मध्य पंजाब का शहर फ़ैसलाबाद औद्योगिक नगरी के तौर पर जाना जाता है. इसी शहर में न्यू मुराद कॉलोनी की गंदी सड़क पर राना शौकत एक छोटी सी दुकान चलाते हैं.
दुकान दो मंज़िला मकान में है और शौकत इसी घर में अपनी पत्नी और दो बेटियों के साथ रहते हैं.
राना शौकत अपनी दुकान का शटर गिराते हुए कहते हैं, ''मुझे इस दुकान में कोई दिलचस्पी नहीं है. यह बस ख़ुद को व्यस्त रखने के लिए है.''
क़रीब 12 साल पहले राना शौकत दिल्ली में अपने एक परिवार की शादी में शरीक होने आए थे और इसके बाद वो समझौता एक्सप्रेस से लौट रहे थे. शौकत अपनी पत्नी और छह बच्चों के साथ थे.
सब कुछ ठीक रहता तो वो अगली सुबह अटारी पहुंच जाते. हालांकि, आधी रात को जब ट्रेन पानीपत के दीवाना इलाक़े से गुज़र रही थी तभी उनके कोच में धमाका हुआ.
पाँच बच्चे ज़िंदा जल गए
राना शौकत अपनी पत्नी के साथ ट्रेन से कूद गए लेकिन पांच बच्चे ट्रेन में रह गए. पाँचों बच्चे इनकी आंखों के सामने ज़िंदा जल गए.
राना शौकत उस भयावह पल को याद करते हुए बताते हैं, ''मैं उस दिन कुछ असहज था. टिकट चेकर को कोच में दो आदमी मिले थे और वो बिना पासपोर्ट के थे.'' इतना कहने के बाद शौकत थम जाते हैं और वाक़ये को याद करने की कोशिश करते हैं.
शौकत कहते हैं, ''मैं बुरी तरह से थक गया था क्योंकि बच्चों को बैठाने और सामान रखने में काफ़ी मेहनत करनी पड़ी थी. मैं अपनी सीट पर लेट गया था. हालांकि नींद नहीं आ रही थी.''
शौकत ने आधी रात को एक अजीब सी आवाज़ सुनी. वो कहते हैं, ''मैं कुछ देर के लिए सहम गया लेकिन ट्रेन में वो आवाज़ शोर में तब्दील हो गई थी.''
शौकत को लगा कि कुछ टूटकर गिरा, लेकिन उन्होंने उठकर देखा नहीं. शौकत कंबल में पूरी तरह लिपटे हुए थे और आंखें बंद कर सोने की कोशिश कर रहे थे.
दरवाज़ा खोलते ही आग लग गई
वो कहते हैं, ''कुछ मिनट बाद सांस लेने में दिक़्क़त होने लगी तो मैंने कंबल फेंका. मैं उठकर देखना चाहता था पर कुछ दिखा नहीं. तब तक ट्रेन की लाइट चली गई थी.''
शैौकत कहते हैं, ''मैं किसी तरह अपनी बर्थ से उठा. पूरी तरह अंधेरा था. मैं ट्रेन के दरवाज़े तक जाने की कोशिश कर रहा था ताकि उसे खोलूं और सांस ले सकूं.''
शौकत ने जैसे ही दरवाज़ा खोला कि कोच में ऑक्सिजन आई और आग की लपटें चारों तरफ़ फैल गईं. शौकत ने आग से जान बचाने के लिए ट्रेन से छलांग लगा दी. इसके बाद उनकी पत्नी रुख़साना बच्ची अक़्सा के साथ कूद गईं.
शौकत कहते हैं, ''हम लोग मदद के लिए रोते हुए चीख रहे थे कि मेरे बच्चों को बचा लो. जब तक मदद आई तब तक मेरे बच्चे जलकर राख हो गए थे.''
इतना कहते हुए शौकत के गालों पर आंसू लुढ़कने लगते हैं और पास में बैठी उनकी पत्नी रुख़साना भी रोने लगती हैं.
शौकत कहते हैं, ''मेरा चेहरा और हाथ जल गए थे. चलती ट्रेन से कूदने के कारण घुटनों में चोट लग गई थी. मैं पूरी तरह से सन्न था. कोच किसी आग के गोले की तरह दिख रहा था और मैं बेबस होकर सब कुछ देख रहा था.''
इतना कहते हुए शौकत और उनकी पत्नी फिर से रोने लगते हैं.
शौकत और उनकी पत्नी को सफ़दरजंग अस्पताल में लाया गया था, जहां एक हफ़्ते तक इलाज चला था. शौकत और उनकी पत्नी ने बच्चों के शव के बिना भारत से लौटने से इनकार कर दिया था. कुछ दिनों बाद इन्हें शव मिले थे.
रुख़साना जब पूरे मामले को बताती हैं तो मानो यह उनकी आंखों के सामने अभी ही घटित हुआ है.
रुख़साना कहती हैं, ''शव के रूप में हमें हड्डियां मिली थीं. हमने कपड़ों के कतरन और जो चीज़ें हमारे बच्चों ने पहनी थीं, उनसे शवों को पहचाना था. मैं पूरी तरह टूट गई थी. मेरी पूरी दुनिया मेरी आंखों के सामने ख़त्म हो गई. हमलोग भी ज़िंदा लाश ही बचे थे.''
शौकत और रुख़साना की बड़ी बेटी आयशा 16 साल की थी. रुख़साना ने कहा, ''मैंने राहत-बचावकर्मियों से कहा था कि मेरी बेटी के साथ पूरी मर्यादा का पालन हो. मैंने कहा था कि उसके शव को निकालने से पहले ढंका जाए.''
इतना कहते हुए रुख़साना फिर से फफक कर रोने लगती हैं. वो अपने आंसुओं को पोंछते हुए कहती हैं, ''मैंने तीन बेटे और दो बेटियों को खोया है. जब मैं लोगों के घरों में बेटों और बेटियों की शादियां देखती हूं तो अंदर से बहुत ग़ुस्सा आता है. मेरे सभी बच्चे अब तक बड़े हो गए होते.''
पांच ताबूत के साथ लौटे पाकिस्तान
शौकत और उनकी पत्नी पांच ताबूत के साथ पाकिस्तान लौटे थे. फ़ैसलाबाद के स्थानीय क़ब्रिस्तान में इन्हें दफ़्न किया गया था.
शौकत और उनकी पत्नी इनकी क़ब्रों पर जाना नहीं भूलते हैं. अक़्सा इस हादसे में बच गई थी, जो अब 15 साल की हो गई है. कुछ साल बाद रुख़साना ने एक और बच्ची को जन्म दिया था.
दूसरी बेटी खदीजा अपने माता-पिता के उस दर्द से बिल्कुल अनजान है. इन दोनों बेटियों की मौजूदगी शौकत और रुख़साना की ज़िदगी में उम्मीद के किरण हैं. हालांकि इसके बावजूद शौकत और रुख़साना उस ज़ख़्म से उबर नहीं पाए हैं.
शौकत कहते हैं कि उन्हें भारत और पाकिस्तान की सरकार से वित्तीय मदद मिली थी लेकिन भारत सरकार ने इस मामले की जांच में चश्मदीद के तौर पर मुक़दमे में शामिल करने के लिए कभी संपर्क नहीं किया.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)