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अब प्रियंका को अग्निपरीक्षा से गुजरना है: वुसअत का ब्लॉग
- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
हालांकि पाकिस्तान में कायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना के बाद जिस शख्सियत की सबसे ज़्यादा इज्जत है वो जिन्ना साहब की छोटी बहन मोहतरमा फ़ातिमा जिन्ना थीं.
मगर जब उन्होंने 1964 में फौजी डिक्टेटर अयूब ख़ान को चैलेंज करते हुए राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ने का निर्णय लिया तो फ़ातिमा जिन्ना रातों रात देशद्रोही, भारतीय एजेंट और अमरीकी पिट्ठू हो गईं.
जब बेग़म नुसरत भुट्टो अपने पति जुल्फकार अली भुट्टो की फांसी के बाद पीपुल्स पार्टी की चेयरपर्सन बनीं तो जनरल जिया और उनके सिविलियन समर्थकों में से किसी के पर नहीं फड़फड़ाए लेकिन जब पीपुल्स पार्टी ने 1988 के चुनाव में भाग लेने का फ़ैसला किया तो विरोधी नवाज़ शरीफ ने चुनाव जीतने के लिए लाहौर शहर पर छोटे हवाई जहाज़ से ऐसी तस्वीरें गिरवाईं जिनमें बेगम नुसरत भुट्टो अमरीकी राष्ट्रपति जेराल्ड फ़ोर्ड के साथ व्हाइट हाउस की एक पार्टी में नाच रहीं थीं.
मगर ये हरकत भी नवाज़ शरीफ को न जितवा सकी और बेनज़ीर भुट्टो प्रधानमंत्री बन गईं. लेकिन जैसे ही बेनज़ीर प्रधानमंत्री बनीं तो धार्मिक राजनेता मौलाना फ़ज़लुर रहमान को अचानक से याद आया कि औरत तो एक इस्लामिक देश की प्रधानमंत्री बन ही नहीं सकती.
मगर जैसे ही मौलाना साहब को कश्मीर कमेटी और विदेशी संबंधों को जांचने वाली कमेटी की चेयरमैनशिप मिली औरत की हुकूमत भी हलाल हो गई.
बेनज़ीर जब पार्लियामेंट के सेशन में जाती थीं तो विपक्षी बैंचों से प्रधानमंत्री के लिबास और चाल पर फिकरे उछाले जाते थे.
एक बार बीबी हरी सलवार कमीज़ और पीला दुपट्टा पहनकर आईं तो शेख रशीद ने जुमला उछाला - आज तो मोहतरमा तोता लग रही हैं.
एक और मेंबर ने कहा चलती तो मर्दों की तरह हैं औरतों वाली तो कोई बात है ही नहीं.
लेकिन फिर इन्हीं मोहतरमा बेनज़ीर भुट्टो ने साबित किया कि पाकिस्तान में अगर पाकिस्तान में कोई सबसे काबिल और बहादुर नेता है तो वो ख़ुद बेनज़ीर हैं.
जब नेहरू जी के देहांत के कुछ वर्ष बाद इंदिरा गांधी कांग्रेस की नेता बनीं तो उन्हें कोई भी संजीदगी से नहीं लेता था और पीठ पीछे उनकी नाक और दुबलेपन का मज़ाक उड़ाया जाता था.
और फिर सबने देखा कि तमाम कांग्रेसी ताऊ, चाचू या तो घर पर बैठ गए या तीर की तरह सीधे हो गए.
इंदिरा के कट्टर विरोधी भी उन्हें दुर्गा कह रहे थे.
सोनिया गांधी ने जब 2004 के चुनाव जीते तो विदेशी बहू कह-कहकर उनका जीना दूभर कर दिया गया.
सुषमा स्वराज ने तो ये तक कह दिया कि अगर सोनिया जी प्रधानमंत्री बनीं तो इस दुख में मुंडन करा लेंगी.
मगर आज सोनिया जी के बारे में कोई सस्ती बात सुनाई नहीं देती.
अब प्रियंका को भी इसी अग्निपरीक्षा से गुजरना है जिससे राजनीति के खड़े पानी में कूद के लहरें उठाने वाली हर मशहूर महिला को गुज़रना पड़ता है.
नफ्सियाती मरीज़, रावण की बहन, खूबसूरत चेहरा मगर खाली खोपड़ी, कांग्रेस का नया पत्ता वगैरह-वगैरह.
बस ये चुनाव गुज़र जाए तब तक प्रियंका को ख़तरे की घंटी समझने वाले विरोधी भी आहिस्ता-आहिस्ता उन्हें स्वीकार करने लगेंगे और फिर सब किसी नई महिला को निशाने पर रख लेंगे.
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