अंडमान निकोबार: सेंटिनेल जनजाति से मिलने वाले टीएन पंडित

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मानवाधिकार समूह सर्वाइवल इंटरनेशनल का कहना है कि भारतीय अधिकारियों को अमरीकी मिशनरी जॉन एलिन शाओ के शव को वापस लाने की कोशिशों पर रोक लगा देनी चाहिए.
समूह का कहना है कि ऐसी कोशिश सेंटिनेल जनजाति के लोगों और अधिकारियों दोंनों के लिए ख़तरनाक़ साबित हो सकता है.
हाल में अमरीकी मिशनरी जॉन एलिन शाओ की मौत के बाद अंडमान निकोबार के सेंटिनल द्वीप पर रहने वाला ये समुदाय काफ़ी चर्चा में आया था.
17 नवंबर को 27 साल के शाओ को नॉर्थ सेंटिनेल ले जाने वाले मछुआरे ने बताया था कि उन्होंने उस जनजाति के लोगों को शाओ के मृत शरीर को समुद्रतट तक लाकर दफ़नाते हुए देखा है.
ये मछुआरा बाद में अधिकारियों को उस जगह पर भी ले कर गया जहां उनका दावा था कि शव को दफनाया गया था.
इस घटना के बारे में 80 वर्षीय भारतीय मानवविज्ञानी टीएन पंडित का कहना है, "उस अमरीकी युवा व्यक्ति की मौत के लिए मुझे बहुत दुःख है. लेकिन उसने एक गलती की. ख़ुद को बचाने के लिए उसके पास मौक़ा था, लेकिन वो वहां बना रहा और अपना जीवन खो बैठा."
मानवविज्ञानी टीएन पंडित उन चंद लोगों में से हैं जो भारत के अंडमान द्वीप पर रह रहे सेंटिनेलिस जनजाति से मिले हैं.
1991 में सरकारी अभियान का हिस्सा रहे पंडित ने भी इस तरह की स्थिति का सामना किया है. बीबीसी से फ़ोन पर बात करते हुए पंडित ने उनके साथ यादगार मुठभेड़ को याद किया.

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टीएन पंडित बताते हैं, "मैं उन्हें नारियल देकर अपनी टीम के साथ दूर हो रहा था और किनारे के पास जा रहे थे. एक सेंटिनेल लड़का ने अजीब सा चेहरा बनाया, अपन चाकू लिया और मेरी ओर इशारा किया कि वो मेरा सिर काट देगा. मैंने तुरंत नाव को बुलाया और वापसी कर ली."
"लड़के का इशारे से साफ़ था कि उन्होंने मेरा स्वागत नहीं किया है."

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डरावने चेहरे
1973 में अपनी पहली यात्रा को याद करते हुए टीएन पंडित ने बीबीसी को बताया, "हम बर्तन, मटके, नारियल, हथौड़े और चाकू जैसे लोहे के औजार गिफ्ट के रूप में अपने साथ लेकर गए थे. हम अपने साथ तीन ओंग जनजाति (अन्य स्थानीय जनजाति) के पुरुष भी लेकर गए थे ताकि सेंटिनेल के व्यवहार और उनकी बातों को समझने में हमें मदद मिले."
इस संबंध में 1999 में उन्होंने एक लेख भी लिखा था, जिसमें उन्होंने अपने साथ हुए इस वाक़ये को याद किया था. बीती बातों को याद करते हुए पंडित कहते हैं, "लेकिन सेंटिनेलिज़ गुस्से में अपने गंभीर चेहरों के साथ और लंबे धनुष और तीर के साथ सशस्त्र होकर हमारे सामने आये. वो अपनी ज़मीन को बचाने के लिए घुसपैठियों से लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार थे. कई बार वो हमारी तरफ़ पीठ कर बैठ जाते."
"बंधा हुआ जिंदा सूअर भी उपहार के रूप में अनुचित था. उन्होंने उसे भाले से मारा और रेत में दफना दिया."
उनके बार में बहुत ही कम जानकारी मौजूद है इसलिए सेंटिनेल के बारे में कई मिथक भी हैं.
उसी लेख को याद करते हुए वे कहते हैं, "द्वीपों और पोर्ट ब्लेयर (निकटतम बड़े बंदरगाह) में एक लोकप्रिय धारणा थी कि उत्तरी सेंटिनेल द्वीप पठान का अपराधी है, जो ब्रिटिश के जेल से फरार हुए थे."

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1970 के दशक में पंडित और उनके सहयोगियों ने उन्हें समझने और उनसे संपर्क स्थापित करने के लिए एक अभियान चलाया. जिसकी सफलता उन्हें 1991 में मिली.
"हम हैरान थे कि उन्होने हमें अनुमति क्यों दी."
हमसे मिलने का ये उनका फ़ैसला था और मीटिंग उनकी शर्तों पर हुई. हम नाव से बाहर निकले और गर्दन तक के पानी में खड़े होकर उन्हें नारियल और अन्य उपहार दिए. लेकिन हमें उनके आइलैंड में क़दम रखने की अनुमति नहीं थी."

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पंडित बताते हैं कि हमले के लिए वे बेकार में चिंतित नहीं थे लेकिन जब वो उनके क़रीब थे तो हमेशा सतर्क रहते थे.
"हमारी बातचीत के दौरान उन्होंने कई बार हमें डराया लेकिन हमारी बातचीत हमें मारने या जख़्मी करने तक कभी नहीं पहुंची. जब भी वो उत्तेजित होते हम वापस चले जाते."
"सेंटिनेलिस न लंबे हैं और न छोटे. वे धनुष और तीर लेकर चलते. वे आपस में बात करते लेकिन हम उनकी भाषा समझ नहीं पाते. सुनने में वो बिल्कुल अन्य स्थानीय जनजाति की बोली की तरह लगती थी."
"हमने सांकेतिक भाषा में बात करने की कोशिश की. लेकिन वो नारियल इकट्ठा करने में व्यस्त थे."
इस समुदाय को धनुष और तीर से मछली मारने के लिए जाना जाता है. जंगली सूअर, ज़मीन में उगने वाले फल-सब्जियां और शहद उन्हें जीवित रखने में मदद करते हैं. वे समुद्री यात्रा करने के लिए नहीं जाने जाते. सरकार ने बिना कपड़ों वाले समुदाय पर अध्ययन करने के लिए उपहार छोड़ने वाले अभियानों को बंद कर दिया है.

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कड़ी सुरक्षा
वे अपने क्षेत्र की सुरक्षा करने के लिए घुसपैठियों पर हमला करने के लिए जाने जाते हैं.
2006 में नॉर्थ सेंटिनेल आइलैंड के क़रीब जाने पर इस समुदाय ने दो मछुआरों को मार दिया था. जब भारतीय अधिकारियों ने 2004 के बॉक्सिंग डे सुनामी के बाद एरियल सर्वे किया तो एक सेंटिनेल व्यक्ति ने बाण की मदद से हेलीकॉप्टर को गिराने की कोशिश की थी.
विचित्र इतिहास
अंडमान द्वीप चार 'अफ्रीकन' जनजातियों का घर है- अंडमानी, ओंग, जारवा और सेंटिनेलिस. निकोबार द्वीप दो 'मंगोलियन' जनजातियों का घर है- शोम्पेन और निकोबारिस.

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ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों ने द्वीप पर एक दंड कॉलोनी की स्थापना की, जो 1857 के लोकप्रिय युद्ध में हिस्सा लेने वाले बागियों का घर माना जाता है, जिसे इतिहासकारों ने भारतीय स्वतंत्रता के पहले युद्ध के रूप में वर्णित किया.
राज और ग्रेट अंडमानीज़ के सैनिकों के बीच पहली लड़ाई 1859 में हुई, जिसका परिणाम पहले से निर्धारित था. औपनिवेशिक युग में जारवास में रहने वाले अन्य समुदाय में भी दण्ड संबंधित अभियान देखे गए हैं.
लड़ाई और बिमारियों के बढ़ने से सभी मूल समूह की आबादी में कमी आई है. लेकिन सेंटिनेलिस अलग द्वीप में रहने के कारण औपनिवेशिक मुश्किलों से बच गए.
अहिंसात्मक
लेकिन हिंसा के लिए उनकी छवि बनी हुई है. पंडित के अनुसार, लेकिन ये सही नहीं है.
"सेंटिनेलिस शांतिप्रिय लोग हैं. उन्हें हमला करना पसंद नहीं. परेशानियों के कारण वे आसपास के क्षेत्र में भी नहीं जाते. ये एक दुर्लभ घटना है."

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भारतीय नौसेना और तट के रक्षक इस क्षेत्र की नियमित रूप से गश्त करते हैं. ऐसा बहुत ही कम होता है कि बिना इजाज़त के यहां कोई घुसपैठिया या कोई और इस द्वीप के करीब पहुंच सके. जैसे अमरीकी पर्यटक की घटना का होना, दुर्लभ मामला है.
पंडित दोबारा, द्वीप पर उपहार देने वाले अभियान और सेंटिनेलिस के साथ मित्रतापूर्वक संपर्क करने का समर्थन करते हैं.
"हमें उनके साथ सीमित संचार करने की कोशिश करनी चाहिए. लेकिन हमें उन्हें परेशान नहीं करना चाहिए. हमें उनके अकेले रहने की इच्छा का सम्मान करना चाहिए."
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