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सुल्तान क़ाबूसः इसराइल, ओमान और ईरान के 'लव ट्राइएंगल का हीरो'
- Author, कीवान हुसैनी
- पदनाम, बीबीसी फ़ारसी सेवा
ओमान की अपनी एक विशेष विदेश नीति है.
यही वजह है कि मध्य पूर्व के एक किनारे पर मौजूद ये छोटा सा देश एक बार फिर इस क्षेत्र के अनेक विवादों में से एक विवाद के केंद्र में आ गया है.
इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की मेज़बानी का ज़िम्मा उठा कर ओमान मध्य पूर्व के अख़बारों की सुर्खि़यों में आ सकता है.
शायद ओमान का ये क़दम मध्य पूर्व के देशों की ओर से इसराइल को मान्यता देने और तेलअवीव क्षेत्र के अन्य अरब देशों से संबंध सुधारने की भूमिका तैयार कर सकता है.
इसराइली प्रधानमंत्री के अप्रत्याशित मस्कट दौरे के एक दिन बाद ईरान की नीति के विपरीत जाकर ओमान ने कहा कि शायद अब वो समय आ गया है कि इसराइल को भी क्षेत्र के अन्य देशों की तरह स्वीकृति मिले.
इस बयान के सिर्फ़ 24 घंटे पहले अलग-अलग मीडिया आउटलेट्स ने एक वीडियो प्रसारित किया था जिसमें ओमान के राजा सुल्तान क़ाबूस को इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू और उनकी पत्नी के साथ ओमान के राजमहल में देखा गया, जबकि ओमान के संबंध ईरान के साथ भी हमेशा से सौहार्दपूर्ण और मधुर रहे हैं.
ओमान की विदेश नीति
नेतन्याहू के मस्कट दौरे के मात्र चार दिन पहले ओमान के विदेश मंत्री के राजनीतिक सहायक मोहम्मद बिन औज़ अल-हस्सान ने तेहरान का दौरा किया था और ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ से मुलाक़ात भी की थी.
एक ही समय में इसराइली प्रधानमंत्री का स्वागत और मेज़बानी और ईरान के साथ दोस्ताना रिश्ते, हक़ीक़त में ये सुल्तान क़ाबूस की ख़ास विदेश नीति का नतीजा है.
ओमान ने 70 के दशक से अब तक अपने देश के लिए एक अनोखी रणनीति अपनाई है. इसका उदाहरण मध्य पूर्व में कम ही मिलता है जैसे:-
• ओमान क्षेत्रीय विवाद में अमूमन तटस्थ रहा है.
• ओमान एक अरब देश है और खाड़ी सहयोग परिषद का सदस्य भी है लेकिन उसने क्षेत्र में 'मित्र देशों को धोखा देने वाले' अरब समूह के साथ ख़ुद को कभी नहीं रखा.
• दूसरे देशों के अंदरुनी मामलों में कभी हस्तक्षेप नहीं किया है जबकि हाल के सालों में ऐसी घटनाएं मध्य पूर्व में बहुत बढ़ी हैं, जैसे यमन और सीरिया की स्थिति.
• और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि ओमान ने हमेशा दोनों पक्षों का साथ दिया है ताकि एक मध्यस्थ का सम्मान हासिल कर सके.
ओमान ही क्यों?
इन्हीं विशेषताओं ने इस तटस्थ देश को एक बड़े राजनीतिक खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया है.
यही कारण है कि पिछले कुछ दिनों में जिस रफ़्तार से ओमान के राजनयिक दूसरे देशों का दौरा कर रहे हैं और दूसरे देशों के नेता और अफ़सर मस्कट आ-जा रहे हैं, उससे ओमान के बारे राजनीतिक अटकलबाज़ियां बढ़ गई हैं.
आज जबकि इसराइल और फ़लस्तीन के बीच अमन बहाली को लेकर बढ़ती नाउम्मीदगी के साये में अगर ओमान इस ऐतिहासिक विवाद में अपना किरदार निभाने का सम्मान प्राप्त कर रहा है तो ये अचानक एक रात में लिए गए फ़ैसले का नतीजा नहीं है.
बल्कि ओमान को इस प्रकार के रोल निभाने के क़ाबिल बनाने में वहां के सुल्तान क़ाबूस की नीतियों का योगदान है.
सुल्तान क़ाबूस ने सत्तर के दशक में सत्ता में आने के साथ अपनी बनाई नीतियों पर चलने का फ़ैसला किया.
सुल्तान की सत्ता
सुल्तान क़ाबूस के सत्ता में आने से पहले ओमान एक अलग-थलग देश था.
हालांकि उसे आज़ाद हुए दो दशक बीत चुके थे लेकिन विश्व के दूसरे देशों से ओमान का कोई संबंध, कोई सरोकार नहीं था.
लेकिन जब अपने पिता के विरुद्ध हुए एक रक्तहीन क्रांति के बाद सुल्तान क़ाबूस ने सत्ता संभाली तो उन्होंने अपने देश को इस अकेलेपन से बाहर निकालने की कोशिशें शुरू कर दीं.
ओमान का ईरान के शाह से संबंध और उसकी विदेश नीति उस वक़्त सामने आई जब ओमान ने अपने ज़फ़ार प्रांत में सशस्त्र कम्युनिस्ट विद्रोह को दबाने के लिए ईरान से मदद मांगी.
ओमान और दूसरे अरब देशों में सबसे बड़ी भिन्नता ये है कि यहां के अधिकांश लोग इस्लाम के 'एबादिया' संप्रदाय के हैं. ओमानी लोग न तो शिया हैं और न ही सुन्नी.
ये केवल आज का मुद्दा नहीं है बल्कि इतिहास में भी ओमान की बाक़ी अरब देशों से अलग पहचान रही है.
इसके अलावा सुल्तान क़ाबूस का ख़ानदान बहुत पुराना है और 18वीं सदी के मध्य से ओमान पर इसी ख़ानदान की हुकूमत है.
ईरान-ओमान के रिश्ते
आम जनता इस परिवार को उस 'ओमानी साम्राज्य' के गौरव का रक्षक मानती है जो कभी मोज़ाम्बिक़ से लेकर हरमुज़ जलडमरूमध्य तक फैला हुआ था और जिस पर ओमान आज भी अपना दावा करता है.
ईरान से अच्छे संबंध के साथ-साथ ओमान ने कभी भी अपनी अरब पहचान को नहीं भुलाया है और हमेशा अपने नए अरब पड़ोसी भाइयों से दोस्ताना रिश्ते रखे हैं. इन देशों के साथ मिलकर ओमान ने 'खाड़ी सहयोग परिषद' की स्थापना भी की है.
ईरानी क्रांति के बाद पिछले चार दशकों से ईरान और अरब देशों का संबंध विवादों से घिरा रहा है, जैसे ईरान-इराक युद्ध, ईरान और सऊदी अरब में 'क्रांति के निर्यात' पर विवाद, और हज के मौक़े पर झड़प और खाड़ी के कुछ द्वीपों को लेकर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात में विवाद, लेकिन इनमें से किसी भी मुद्दे पर ओमान और ईरान के संबंध कभी ख़राब नहीं हुए.
बल्कि ईरान ने ओमान और अमरीका के बीच 1980 के महत्वपूर्ण सैन्य समझौते को भी बहाना बनाकर संबंध नही बिगाड़ा.
ओमान और इसराइल
ओमान का एक तरफ़ ईरान से विशेष संबंध है तो दूसरी तरफ़ उसकी विदेश नीति तटस्थता, स्वतंत्रतापूर्वक निर्णय लेने के सिद्धांत पर आधारित है.
इस कारण अन्य अरब देशों से उन की नीति भिन्न है.
और ओमान की यही विशेषता उस समय और स्पष्ट हो गई जब यमन के युद्ध के मुद्दे पर या क़तर से संबंध तोड़ने के मुद्दे पर या जमाल ख़ाशोज्जी की मौत के मुद्दे पर अरब देश अलग-अलग गुट बन कर सामने आए तो रियाद और अबू धाबी में किसी ने भी ये आशा नहीं दिखाई कि ओमान उनके साथ आएगा.
ओमान ने इसराइल के मामले में हमेशा एक अलग नीति अपनाई है.
वो ओमान ही था जिसने साल 1977 में मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात और इसराइल के साथ शांति समझौते का समर्थन किया था.
मिस्र-इसराइल शांति समझौते के बाद ओमान उन तीन अरब देशों में से था जिसने मिस्र के साथ संबंध नहीं तोड़ा था.
खाड़ी के अरब देश
सुल्तान क़ाबूस उन अरब नेताओं में से हैं जो फ़लस्तीन और इसराइल के बीच हमेशा सीधी बातचीत की हिमायत करते हैं.
इसी प्रकार नब्बे के दशक में जब फ़ारस की खाड़ी के अरब देश इसराइल के विरुद्ध कठोर नीति अपनाए हुए थे तो सुल्तान क़ाबूस ने इसराइल के वामपंथी प्रधानमंत्री इसहाक़ रॉबिन का मस्कट में स्वागत किया था.
हालांकि ओमान और इसराइल के रिश्ते आधिकारिक रूप से कूटनीतिक स्तर तक नही पहुंचे.
लेकिन ओमान ने बाक़ी अरब देशों की तरह इसराइल के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा का कभी सहारा नहीं लिया बल्कि बिलकुल ही अलग रास्ते पर चलना पसंद किया.
और बात यहां तक पहुंची कि फलस्तीन के ख़िलाफ़ सख़्त नीति अपनाने वाले इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू आज मस्कट का सफ़र कर रहे हैं.
नेतन्याहू ने उसी हफ़्ते मस्कट का दौरा किया, जिस सप्ताह फ़लस्तीन स्वशासन के प्रमुख महमूद अब्बास ने ओमान का दौरा किया था.
अमरीका से बढ़कर...
ये संयोग (महमूद अब्बास और नेतन्याहू के एक ही हफ़्ते में ओमान जाना) ओमान के विदेश मंत्री के बहरीन में एक सुरक्षा सम्मेलन के दौरान इस वक्तव्य के बाद की घटना है जिसमें उन्होंने कहा था कि इसराइल और फ़लस्तीन के बीच ओमान संबंध स्थापित कराने का इच्छा रखता है.
यही वजह है कि अब ये अटकलबाज़ी की जा रही है कि शायद इस बार ओमान मध्य पूर्व के एक ऐतिहासिक विवाद में मध्यस्थ की भूमिका निभाएगा.
लेकिन ओमान के विदेश मंत्री यूसुफ़ बिन अलवी ने इससे इनकार करते हुए कहा कि उनका देश इसराइल और फ़लस्तीन के बीच कोई मध्यस्थता करने जा रहा है.
अमरीका ने कभी इसराइल और फ़लस्तीन के बीच अमन का रास्ता सुझाया था लेकिन यूसुफ़ बिन अलवी ने इसराइल-फ़लस्तीन शांति समझौते और क्षेत्र के देशों द्वारा तेलअवीव की मान्यता के मुद्दे से भी आगे जाकर बात की जो अपने आप में खाड़ी सहयोग परिषद के किसी सदस्य देश का एक महत्वपूर्ण वक्तव्य है.
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात
हालांकि ऐसा भी नहीं है कि ओमान की विदेश नीति खाड़ी देशों में बह रही धारा के विरुद्ध कही जाएगी.
इसराइल के क़रीब जाने की सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की कोशिशें भी दुनिया ने पिछले दिनों देखी हैं.
सऊदी शहज़ादे मोहम्मद बिन सलमान अपने अमरीकी दौरे के दौरान यहूदियों और इसराइल समर्थक गुटों से मिलते रहे हैं.
और उनका ये बयान भी अख़बारों की सुर्खियां बना कि इसराइल की धरती पर इसराइल के हक़ को सऊदी अरब वैध मानता है.
न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार नेतन्याहू की मस्कट यात्रा इसराइल और ओमान के बीच एक महीने की ख़ुफ़िया बातचीत का नतीजा है.
इसी यात्रा के बाद नेतन्याहू ने कहा कि अरब देश इसराइल के साथ अपने संबंध को और बढ़ाने के लिए इच्छुक हैं.
ओमान की भूमिका
ओमान ने अब तक कई बार गंभीर विवादों में रचनात्मक भूमिका निभाई है.
जैसे ब्रिटेन के नौसैनिकों की रिहाई, ईरान में अमरीकी बंदियों का मामला, बल्कि यहां तक कि ईरान-अमरीका वार्ता के लिए ख़ुफ़िया संवाद वाहक का काम, ऐसे कुछ उदाहरण हैं जहां ओमान का रचनात्मक किरदार रहा है.
गोपनीय राजनयिक स्रोतों के ज़रिए ओमान की इस तरह की सकारात्मक भूमिका को लेकर चीज़ें सामने आती रही हैं.
लेकिन इस बार ओमान का मध्यस्थता का प्रयास का मामला परिणाम से पहले ही ज़ाहिर हो गया.
लेकिन अगर ओमान इसी तरह का काम तेहरान और वॉशिंगटन के बीच संबंध सुधारने के दिशा में कर सके तो इसराइल और खाड़ी के अरब देशों के संबंध को भी प्रभावित कर सकता है.
और स्वयं ओमान के लिए ये एक बहुत बड़ी कूटनीतिक सफलता होगी.
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