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क्या भारत-जापान कर पाएंगे अफ़्रीका में चीन से मुक़ाबला?
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता दिल्ली
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काल में जापान और भारत एक-दूसरे के काफ़ी क़रीब आए हैं. संकेत इस बात के हैं कि आगे आने वाले समय में दोनों की दोस्ती में और भी घनिष्ठता आ सकती है, ख़ास तौर से अगर इन दोनों देशों की अफ़्रीका में संयुक्त तौर पर निवेश की योजना सफल हो.
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने दो दिनों के दौरे के आखरी दिन यानी 29 अक्टूबर को टोक्यो में एक सेमिनार में बोलते हुए कहा कि दोनों देश अफ़्रीका और दुनिया के अन्य हिस्सों में ठोस विकास के प्रयास में संयुक्त तौर पर निवेश करना चाहते हैं.
वैसे ये कोई नया एलान नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने इस योजना की घोषणा 2016 में पहली बार की थी.
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ में प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं, "मई 2017 में लॉन्च किए गए एफ़्रो-एशियन ग्रोथ कॉरिडोर की तरह इन्फ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी के लिए 'रणनीतिक' और 'वैश्विक ' साझेदारी पर दोनों देशों का फ़ोकस बढ़ा है."
अफ़्रीका में निवेश
समझा ये जा रहा है कि चीन अफ्रीका में इस तेज़ी से निवेश कर रहा कि वहां इसका मुक़ाबला करना आसान नहीं होगा. भारत और जापान व्यक्तिगत रूप से अफ़्रीका में चीन से मुक़ाबला कर रहे हैं. लेकिन चीन के असर को रोकने में नाकाम रहे हैं.
चीन ने अफ़्रीका में अब तक 70 अरब डॉलर का निवेश कर रखा है जबकि भारत ने पिछले 20 सालों में 56 अरब डॉलर का और जापान ने 32 अरब डॉलर का निवेश किया है. लेकिन चीन इन दोनों देशों से कहीं आगे है.
जापान के व्यापारी कहते हैं कि चीन काफ़ी सालों से अफ़्रीका में निवेश कर रहा और इसमें हाल के सालों में बढ़ोतरी हुई है. उनके अनुसार चीन बुनियादी ढांचों में निवेश कर रहा है जिसका नतीजा फ़ौरन सामने दिखाई देता है.
लेकिन जापान के केयो विश्वविद्यालय में भारतीय मूल के प्रोफ़ेसर मुकेश विलियम्स कहते हैं कि अफ्रीका में प्राकृतिक संसाधन इतना है कि सभी देश निवेश कर सकते हैं. "अफ्रीका प्राकृतिक संसाधन से भरा पड़ा है जहाँ सभी देशों के निवेश के लिए अवसर हैं."
एक अंदाज़े के मुताबिक़ अफ्रीका में ढाई खरब डॉलर के निवेश की सम्भावना है. अमरीका, यूरोप, भारत और चीन ने वहां अब तक 200 अरब डॉलर का निवेश किया है.
भारत-जापान कितने होंगे कामयाब
तो चीन के अफ़्रीका में बढ़ते निवेश और असर को देखते हुए भारत-जापान की संयुक्त निवेश योजना कामयाब होगी? प्रोफेसर मुकेश कहते हैं, "शॉर्ट टर्म में चीन का मुक़ाबला करना मुश्किल होगा, लेकिन लंबे समय में भारत-जापान की कोशिशों को सफलता मिलेगी."
उनका तर्क ये है कि चीन का अधिकतर निवेश बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में है, जैसे कि बंदरगाह या हवाई अड्डा बनाना. चीन के निवेश से लाखों अफ़्रीकियों को रोज़गार भी मिला है.
लेकिन प्रोफेसर शर्मा कहते हैं, "भारत-जापान के संयुक्त निवेश का फ़ोकस होगा अफ़्रीका के लोगों में जीवन की गुणवत्ता बढ़ाना, उनकी ज़िन्दगी को बेहतर करना और इसका असर 8-10 सालों में नज़र आएगा."
इसीलिए भारत और जापान शिक्षा, कौशल के विकास, स्वास्थ्य, चिकित्सा और आईटी क्षेत्रों में निवेश करने की योजना बना रहे हैं. जापान ने अब तक अफ़्रीका में 32 अरब डॉलर का निवेश किया है जिसमें अधिकतर निवेश स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्रों में हुआ है.
भारत-जापान मॉडल और चीनी निवेश के मॉडल में फ़र्क़ ये भी है कि अफ़्रीक़ा में चीन की सरकार निवेश करती है जबकि भारत और जापान निजी कम्पनयों को निवेश करने में आगे रखते हैं.
भारत और जापान के रिश्ते मज़बूत तो हुए हैं लेकिन प्रधानमंत्री मोदी का जापान का ताज़ा दौरा एक ऐसे समय में हुआ है जब जापान के प्रधानमंत्री एक सप्ताह पहले ही अपने चीन के दौरे से लौटे हैं. ऐसे संकेत मिले हैं कि पारंपरिक प्रतिद्वंद्वि चीन और जापान क़रीब आ रहे हैं.
ऐसे में जापान अफ़्रीक़ा में चीन को चुनौती देना चाहेगा? प्रोफेसर मुकेश के अनुसार जापान और चीन अफ़्रीक़ा में निवेश को एक मुक़ाबले की तरह नहीं देख रहे हैं. उनके अनुसार इतिहासिक दुश्मनी इतनी जल्दी दोस्ती में नहीं बदलती.
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