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नज़रिया: शिंज़ो आबे से क्या लेकर आ रहे हैं नरेंद्र मोदी
- Author, प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
जापान और भारत के सम्मेलनों की बात करें तो इनमें रक्षा, तकनीक हस्तांतरण, हथियारों और उपकरणों की खरीद, संयुक्त सैन्य अभ्यास के साथ-साथ आर्टिफ़ीशियल इंटेलिजेंस, रोबॉटिक्स के शोध और अनमेन्ड एरियल विहीकल्स के विकास जैसे मुद्दों पर चर्चा होती है.
मई 2017 में लॉन्च किए गए एफ़्रो-एशियन ग्रोथ कॉरिडोर की तरह इन्फ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी के लिए 'रणनीतिक' और 'वैश्विक ' साझेदारी पर दोनों देशों का फ़ोकस बढ़ा है.
दोनों की जियो-पॉलिटिकल रणनीति में काफ़ी समानता है. मोदी की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसीट आबे की टफ्री एंड ओपन इंडो पैसिफ़िक पॉलिसी' के साथ घुलती-मिलती नज़र आती है. दोनों ही क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए 'कानून के सम्मान' और 'समुद्री यातायात' की स्वतंत्रता के लिए पहली शर्त मानते हैं.
चीन के प्रति दोनों का बदला रुख़
शुरू में भारत-जापान की दोस्ती को दक्षिण चीन सागर में चीन द्वारा बनाए गए कृत्रिम द्वीपों और 'वन बेल्ट वन रोड' इनिशिएटिव के कारण उपजी दोस्ती माना जा रहा था. मगर इस साल मोदी और आबे दोनों ने शी जिनपिंग से मिलने में दिलचस्पी दिखाई.
हाल ही में जापान के प्रधानमंत्री सात साल बाद चीन पहुंचे. इससे संकेत मिले वह प्रतियोगिता के बजाय सहयोग की ओर रुख़ कर रहा है. यह ठीक उस तरह की मुलाक़ात थी, जैसे अप्रैल में मोदी और शी के बीच अनौपचारिक सम्मेलन में हुई थी. इस सम्मेलन को चीन-भारत के रिश्तों के लिए नई पहल की तरह देखा गया था.
आज मोदी और आबे, दोनों को शी के 'टू-प्लस वन' फॉर्मूले के प्रति सकारात्मक देखा जा रहा है, जिसके तहत चीन चाहता है कि वह जापान और भारत के साथ अलग-अलग सहयोग कर, अन्य देशों में संयुक्त उपक्रम शुरू करे. भारत और जापान भी इसी तरह के संयुक्त क़दम उठाने की इच्छा रखते हैं.
भले ही ट्रंप की सख़्त नीतियों के कारण शी जिनपिंग इस दिशा में बढ़ रहे हों मगर इससे भारत और जापान को चीन को लेकर अपनी चिंताओं से परे एक नई सहभागिता के बारे में सोचने का अवसर मिला है.
इससे भारत और जापान के सम्मेलनों की दिशा का भी पता चलता है कि वे दोनों क्यों रक्षा, सुरक्षा और कनेक्टिविटी को लेकर अमरीका और चीन को परे रखकर अवसर तलाश रहे हैं.
संयुक्त सैन्य अभ्यास
इस सम्मेलन में उनकी थल और वायु सेनाओं के बीच होने जा रहे पहले संयुक्त अभ्यासों को अंतिम रूप देने की कोशिश की जाएगी. अगले सप्ताह जापान की ग्राउंड सेल्फ़ डिफ़ेंस फ़ोर्स 1 से 14 नवंबर तक मिज़ोरम स्थित भारतीय सेना के काउंटर इनसर्जेंसी एंड जंगल वॉरफ़ेयर स्कूल में ट्रेनिंग लेने आएगी.
भारत के उत्तर-पूर्व का जापान के साथ विशेष जुड़ाव है. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान कोहिमा और इंफाल में लड़ते हुए जापान के 70 हज़ार से ज़्यादा सैनिक मारे गए थे.
इन्फ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी
इसमें कोई शक नहीं है कि जापान भारत के नॉर्थ ईस्ट रोड नेटवर्क कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट में अहम साझेदार है. इस प्रोजेक्ट के तहत भारत के उत्तर पूर्व क्षेत्र को मुख्य भारत और पड़ोसी देशों से भी जोड़ेगा.
जापान इंटरनैशनल कोऑपरेशन एजेंसी (JICA) ने अप्रैल 2017 में इस अभियान को शुरू किया था. इसके लिए उसने 61 करोड़ डॉलर की प्रतिबद्धता जताई थी और अभी दोनों पक्षों ने इस क्षेत्र में तीन ऐसी सड़कों की पहचान की है जिन्हें जापानी कंपनियां तैयार करेंगी.
भारत के लगभग हर हिस्से में जापानी कंपनियां काम कर रही हैं और इनकी संख्या 1039 है. जापान वाहनों, दूरसंचार, ऊर्जा उपकरणों और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के लिए भारत में एक विश्वसनीय ब्रैंड है.
हथियार व तकनीक हस्तांतरण
दिसंबर में जापान की एयर फ़ोर्स भारत और अमरीका के बीच साल 2004 से हो रहे 'कोप इंडिया' वायु सेना अभ्यास में हिस्सा लेगी. जापान की नौसेना पहले ही भारत और अमरीका के बीच 90 के दशक की शुरुआत से हो रहे मालाबार संयुक्त नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा ले चुकी है.
विशिष्ट समझौतों की बात करें तो यह सम्मेलन 'मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस अग्रीमेंट' पर मुहर लगा सकता है. इससे यह होगा कि अगर जापान का पी-1 मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट हिंद महासागर में चीन की पनडुब्बी के संकेत पकड़ता है तो उसे यह जानकारी भारतीय नौसेना के साथ साझा करनी होगी.
दोनों के बीच फ़ाउंडेशनल लॉजिस्टिक्स सपॉर्ट अग्रीमेंट पर भी समझौता हो सकता है. ऐसा ही समझौता भारत और अमरीका के बीच अगस्त 2016 में हुआ था. इन समझौतों की तैयारी शायद इस साल अगस्त में भारत की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के जापान दौरे के कारण ही हो गई थी.
दोनों रक्षा मंत्रालयों के बीच हुए रक्षा उपकरण और तकनीक के हस्तांतरण पर 2016 में हुए समझौते के तहत अनमेन्ड एरियल विहीकल्स और रोबॉटिक्स के क्षेत्र में संयुक्त परियोजनाओं को अंतिम रूप दे दिया है. ये समझौते भारत के डीआरडीओ और जापान की एक्विज़िशन, टेक्नॉलजी एंड लॉजिस्टिकल एजेंसी (ATLA) के बीच हुए थे.
इसके अलावा जापान की बेहद शांत सोरयू श्रेणी की पनडुब्बी को खरीदने के लिए भारत मोलभाव कर रहा है. इसे बनाने वाली मित्सुबिशी हेवी इंडस्ट्रीज़ और कावासाकी हेवी इंडस्ट्रीज़ ने भारतीय नौसेना के प्रॉजेक्ट 75 (1) में रुचि दिखाई है, जिसके तहत छह डीज़ल-विद्युत पनडुब्बियां तैयार की जानी है.
तकनीक के हस्तांतरण और क़ीमतों जैसे पेचीदा विषयों पर भी भारत की ओर से मोलभाव किए जाने की उम्मीद है. इन मसलों के कारण ही US-2 एंफ़ीबियस प्लेन्स और सोरयू क्लास अटैक सबमरीन के लिए मोलभाव की प्रक्रिया धीमी हुई पड़ी है.
परस्पर सहयोग
इस बीच जापान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया और स्मार्ट इंडिया अभियानों में अग्रणी सहायक बनकर उभरा है.
एक और अहम क्षेत्र में दोनों नेता सहयोग की संभावनाए तलाशेंगे. प्रधानमंत्री मोदी के हाल ही में लॉन्च किए गए आयुष्मान भारत अभियान, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा स्वास्थ्य संबंधी अभियान बताया जा रहा है जिसके तहत 55 करोड़ लोग लाभान्वित होंगे, और शिंज़ो आबे द्वारा मई 2016 में लॉन्च किए गए एशियन हेल्थ एंड वेल-बीइंग इनिशिएटिव के बीच सहयोग की संभावनाए तलाशी जाएंगी.
यह बात ध्यान देने लायक है कि जापान को एक समय ऐसे देशों का झंडाबरदार माना जाता था जिनके पास टेक्नॉलजी तो थी मगर वे उसे भारत के साथ साझा नहीं करना चाहते थे. लेकिन अब अत्याधुनिक तकनीक मुहैया करवाने के मामले में भारत के लिए जापान एक बड़ी उम्मीद बनकर उभरा है.
(लेखक नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ इंटरनैशनल स्टीडीज़ में प्रोफ़ेसर हैं )
ये लेखक के निजी विचार हैं
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