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नज़रिया: श्रीलंका की उठापटक में क्या होगी भारत और चीन की भूमिका
श्रीलंका में राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरीसेना ने महिंदा राजपक्षे को देश का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया है.
श्रीलंका में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार आर.के. राधाकृष्णन ने कहा कि चारों तरफ़ समदंर से घिरे इस देश में हुए इस राजनीतिक बदलाव के पीछे न तो भारत है और न ही चीन.
हालांकि राधाकृष्णन कहते हैं कि श्रीलंका में भारत और पाकिस्तान दोनों के ही बहुत सारे हित हैं और वे यहां के मौजूदा राजनीतिक हालात पर प्रभाव डालने की कोशिश करेंगे.
राजपक्षे लहर की सवारी
जब यह पूछा गया कि मैत्रिपाला ने यह क़दम क्यों उठाया तो राधाकृष्णन ने कहा कि मैत्रिपाला ने लोगों से बहुत सारे वादे किए थे मगर उन्हें पूरा नहीं कर पाए. उन्होंने देश में चीन की मौजूदगी घटाने का वादा किया था मगर ऐसा करने में वह नाकाम रहे.
इसलिए मैत्रिपाला श्रीलंका में महिंदा राजपक्षे के समर्थन में चल रही लहर की सवारी करना चाहते हैं ताकि फिर से राष्ट्रपति बन सकें. अगर महिंदा राजपक्षे एक मज़बूत प्रधानमंत्री बन जाते हैं, तब भी मैत्रिपाला राष्ट्रपति बनना चाहेंगे, भले ही उनका पद रवायती भर हो.
भारत के हित
राधाकृष्णन कहते हैं, "हाल ही में महिंदा राजपक्षे ने भारत का दौरा किया था और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाक़ात की थी. मुझे नहीं पता कि उनके बीच क्या बात हुई. राजपक्षे ने मोदी को बताया होगा कि उनके भविष्य में वापसी के कई मौक़े हैं. 25 अगस्त को जब मैं उनके भाई के अंतिम संस्कार के दौरान राजपक्षे से मिला था, तब उन्होंने मुझे यह बात बताई थी."
उस दौरान राष्ट्रपति मैत्रिपाला, नौकरशाह और देश के कई वीआईपी भी वहां आए थे. वह ऐसे नज़र आ रहे थे मानो वही राष्ट्रपति हों.
संविधान के 19वें संशोधन के अनुसार राष्ट्रपति किसी प्रधानमंत्री को तब तक नहीं हटा सकते, जब तक कि वह खुद इस्तीफ़ा न दे या सांसद का पद न गंवा दे.
रानिल अपना बहुमत साबित करने के लिए संसद का आयोजन करने की मांग कर रहे ते मगर राष्ट्रपति इसे टालते गए. इस बात की संभावना है कि राष्ट्रपति तभी संसद का सत्र बुलाएंगे जब राजपक्षे अपना बहुमत साबित कर पाएंगे.
राजपक्षे के पास जनाधार भी है और पैसे की ताक़त भी, ऐसे में लगता है कि वह सफल हो जाएंगे. रानिल कोर्ट जाएंगे मगर कोर्ट भी राजनीति से मुक्त नहीं हैं.
सुप्रीम कोर्ट के जजों को राष्ट्रपति नियुक्त करते हैं. उस देश में क़ानूनी संस्थाएं राजनीति को लेकर तटस्थ होंगी, इसकी संभावनाएं कम ही हैं.
इस बात में कोई शक नहीं है कि राजपक्षे भारत से दिक्कतें रही हैं. उन्होंने अपनी हार के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया था.
मगर अब भारत ऐसी स्थिति में नहीं आना चाहेगा कि वह उन्हें चीन को बाहर निकालने के लिए दबाव बनाए. वह कहेंगे, "चीन को लेकर बात मत कीजिए, इस पर बात कीजिए कि आप क्या चाहते हैं."
तमिलों का सवाल
श्रीलंका में ताज़ा घटनाक्रम के संदर्भ में तमिलों की राजनीतिक अपेक्षाओं पर बात करते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि यह तमिलों के लिए झटका है. वह बताते हैं कि तमिल नेशनल अलायंस राष्ट्रीय संसद में विपक्ष में है.
अगर राजपक्षे इस संकट से बच निकलते हैं तो रानिल की युनाइटेड नैशनल पार्टी विपक्ष में चली जाएगी और टीएनए अपना विपक्ष का दर्जा खो देगी.
वह बताते हैं, "संविधान का फिस से जो प्रारूप बनाया जा रहा है, उसमें तमिल प्रांत को पुलिस या भू अधिकार जैसे विशेष अधिकार देने पर ध्यान नहीं दिया जा, जिनकी तमिल मांग कर रहे हैं. मगर यह संशोधन हाल फिलहाल नहीं होगा. इसे फिर से पुनर्विचार और रिव्यू के लिए भेजा जा सकता है."
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