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श्रीलंका में सियासी संकट: 'प्रधानमंत्री न बदलते तो सड़कों पर होते लोग'
- Author, अज़्ज़ाम अमीन
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी सिंघला
श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरीसेना ने रानिल विक्रमासिंघे को बर्खास्त कर पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री नियुक्त किया है. इस फ़ैसले को लेकर श्रीलंका की राजनीति में खींचतान और आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है.
विक्रमासिंघे और उनके समर्थक राष्ट्रपति के फ़ैसले पर सवाल उठाते हुए दावा कर रहे हैं कि राष्ट्रपति के पास 'प्रधानमंत्री को हटाने का अधिकार नहीं' है. वो 'संसद में बहुमत' होने का दावा भी कर रहे हैं.
वहीं राजपक्षे के समर्थकों का दावा है कि अब वो सत्ता में हैं और ये फ़ैसला देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए किया गया है.
राष्ट्रपति सिरीसेना के समर्थक उनके फ़ैसले को सही ठहराते हुए तर्क दे रहे हैं कि अगर राष्ट्रपति ये कदम नहीं उठाते तो देश में 'संघर्ष की स्थिति बन सकती थी और लोग सड़कों पर आ सकते थे'.
बीबीसी ने तीनों पक्षों से बातचीत की. पढ़िए, किस पक्ष के नेता ने क्या कहा-
सरथ फोंसेका, (बर्खास्त प्रधानमंत्री रानिल विक्रमासिंघे के समर्थक मंत्री)
हमारे पास अब भी संसद में बहुमत है. संविधान के मुताबिक राष्ट्रपति के पास सरकार भंग करने या फिर प्रधानमंत्री को हटाने की कोई शक्ति नहीं है.
महिंदा राजपक्षे की सत्ता में वापसी पर :
ये लोगों की इच्छा के ख़िलाफ उठाया गया कदम है. उन्हें राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नियुक्त किया है. इस फ़ैसले से लोग प्रभावित हुए हैं, लोकतंत्र प्रभावित हुआ है और ये देश के लोकतांत्रिक नियमों के ख़िलाफ़ है.
केहलिया राम्बुकवेला (नवनियुक्त प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे के प्रवक्ता)
विक्रमासिंघे सरकार ने अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर, सांस्कृतिक मामलों में और रक्षा के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पलटी (रोल बैक) मारी है. कुछ ऐसा भी है जिसे बयान नहीं किया जा सकता है.
देश में कई मोर्चों पर संकट की स्थिति है. ख़ासकर रुपया अभूतपूर्व तरीके से नीचे गिर रहा है. वित्तीय और बैंकिंग सेक्टर में भी गिरावट है.
मुझे यकीन है कि उन्होंने ये महसूस किया होगा कि लोगों का इस तरह परेशान होना ठीक नहीं है.
(राष्ट्रपति) किसी ऐसे व्यक्ति को चाहते थे जिसने ख़ुद को साबित किया हो. साल 2005 के संकट के दौर में जिस वक्त देश में पूरी तरह से व्यवधान था, उस वक्त उन्होंने सामान्य स्थिति लाकर ख़ुद को साबित किया.
देश संकट में नहीं है..लेकिन देश बस संकट से बाहर आ ही रहा है.
अनुरा प्रियदर्शना यापा (राष्ट्रपति सिरीसेना की पार्टी के सांसद)
हमारी अर्थव्यवस्था गिर रही है. लोग खुश नहीं हैं. इस स्थिति से आम लोग और व्यापारी खुश नहीं थे. श्रीलंका की अर्थव्यवस्था ख़ासी मुश्किल में है. हमारा रुपया 28 फ़ीसद गिर चुका है. अर्थव्यवस्था और रुपया अब भी गिर रहे हैं.
आप ये भी देख सकते हैं कि प्रधानमंत्री की अगुवाई वाली सरकार स्थिति को सही तरीके से समझ नहीं पा रही थी और आर्थिक स्थिति पर नियंत्रण नहीं कर पा रही थी.
मुझे लगता है कि राष्ट्रपति ने सही फ़ैसला किया है. नहीं तो देश दिवालिया होने की स्थिति में पहुंच जाता.आंतरिक संघर्ष हो सकता था. लोग सड़कों पर आ जाते और विरोध करने लग सकते थे.
दूसरी बात ये है कि पूर्व रक्षा सचिव के ख़िलाफ वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के जरिए हत्या के प्रयास और संभावित तख़्ता पलट को लेकर काफी चर्चाएं थीं, उस लिहाज से जांच बहुत धीमी थी. उन्होंने कोई फ़ैसला नहीं लिया. लोग किसी फ़ैसले की उम्मीद कर रहे थे लेकिन सरकार ने कुछ नहीं किया. बदलाव के पीछे यही कारण हैं. ये कोई तख्ता पलट नहीं है.
राजपक्षे की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे सिरिसेना ने उनसे अलग होकर राष्ट्रपति चुनाव लड़ा था. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राजपक्षे को प्रधानमंत्री बनाने के सिरिसेना के कदम से संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है क्योंकि संविधान में 19वां संशोधन बहुमत के बिना विक्रमासिंघे को प्रधानमंत्री पद से हटाने की अनुमति नहीं देगा.
राजपक्षे और सिरिसेना की कुल 95 सीटें हैं और सामान्य बहुमत से पीछे हैं. विक्रमासिंघे की यूएनपी के पास अपनी खुद की 106 सीटें हैं और बहुमत से केवल सात कम हैं.
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