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इन पीली-ईंटों का रास्ता कहां जाता है?
अगर आप घाना की पीली ईंट की सड़क पर जा रहे हैं तो ये आपको लैंड ऑफ़ ओज़ की एमरलैंड सिटी में नहीं बल्कि ला में पहुंचा देगा जो राजधानी अकरा में एक ज़िला है.
यह वो जगह है जहां की धूल भरी गलियों में आर्टिस्ट सर्ज अटुकवेई क्लॉटी पीली प्लास्टिक की विशाल टैपिस्ट्री बनाते हैं.
क्लॉटी ने बीबीसी को बताया कि उनका काम संपत्ति के अधिकारों के बारे में है. अफ़्रीका के कई ग़रीब समुदायों में रहने वाले अपनी ज़मीन के स्वामित्व को साबित नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास उसके क़ाग़ज़ात नहीं हैं.
प्रत्येक चौकोर टुकड़े को एक खास प्रकार के जेरीकन से काटा जाता है और फिर प्लास्टिक की कालीन बनाने के लिए एक साथ सिलवाया जाता है.
इन्हें घाना में 'कुफूल गैलन' कहा जाता है, जिसे पूर्व राष्ट्रपति जॉन कुफूर के नाम पर रखा गया है.
2000 के दशक की शुरुआत में, जब कुफूर सत्ता में थे, वहां पानी की कमी थी और पूरे देश में पानी भरने के लिए पीले रंग के कंटेनरों को जहां तहां देखा जा सकता था क्योंकि लोग पानी इकट्ठा करने के लिए लंबे सफ़र पर इसका इस्तेमाल करते थे..
इनमें से कुछ का इस्तेमाल आज भी किया जाता है, लेकिन कई लोगों ने इस्तेमाल बंद कर दिया है और क्लॉटी उन्हें अपने आर्ट के लिए इकट्ठा करते हैं. इसे वो 'अफ्रोगेलोनिज़्म' कहते हैं.
क्लॉटी का अनुमान है कि उन्होंने जब 2005 में इनका इस्तेमाल करना शुरू किया, तब से अब तक करीब 30,000 कुफूर गैलन का इस्तेमाल कर चुके हैं.
इनमें से लगभग 3,000 कुफूर गैलन 2016 में शुरू हुई पीली-ईंट की सड़क परियोजना में लग चुकी हैं.
वो एक असिस्टेंट के साथ काम करते हैं, लेकिन स्थानीय लोग भी कुफूर गैलन काटने और उसके टुकड़ों की सिलाई करने का काम करते हैं.
वो इस कलाकृति को बना कर बहुत उत्साहित हैं जिसे पूरी दुनिया में भेजने के बजाए अपने ही घर में दिखाया जा सकता है. साथ ही उन्हें इस बात की भी खुशी है कि यह विदेशी सैलानियों को आकर्षित करता है.
वो अपने काम का पहले स्केच बनाते हैं, लेकिन इसका सटीक रूप तभी उभरता है जब इसमें अलग अलग लोग शामिल होते हैं.
अपने इस प्रोजेक्ट के लिए वो लोगों से मिलकर कुफूर गैलन इकट्ठा करने में मदद लेते हैं.
क्लॉटी अपने दोस्तों के साथ कूड़े के ढेर में जाते हैं और उस तरह के कपड़े पहनते हैं जिससे यह पता चल सके कि कैसे ये कुफूर गैलन महिलाओं से जुड़े हैं.
लोग कुफूर गैलन इकट्ठा करके क्लॉटी के वर्कशॉप में पहुंचाते हैं, फिर उन्हें किलो के भाव (करीब तीन डॉलर) से उसकी कीमत मिल जाती है.
क्लॉटी उम्मीद जताते हैं कि वो 2020 में इस प्रोजेक्ट को पूरा कर लेंगे.
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