चीन के वीगरों पर चुप क्यों हैं मुसलमानों के हिमायती देश

- Author, संदीप कुमार सोनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
''चीन एक ऐसी जगह बनता जा रहा है जहां हर जगह आप पर नज़र रखी जाती है, जहां ग़लत सोचने भर से आप सलाख़ों के पीछे पहुंच सकते हैं. ये एक ऐसी जगह है जहां विदेशी पत्रकारों को पसंद नहीं किया जाता.''
ये अनुभव है बीबीसी के एक पत्रकार का, जिन्होंने इसी साल चीन के शिनजियांग प्रांत जाकर ज़मीनी हालात का जायज़ा लिया था.

'ज़िंदा लोग मुर्दा बनकर निकले'
''मुझे डर इस बात का है कि लोगों को बड़े पैमाने पर मारा गया है. लाखों लोगों का कहीं अता-पता नहीं है. ये वो जगह है जहां लोगों के पास कोई अधिकार नहीं हैं. आपको कोई अदालत कोई वकील नहीं मिलेगा. बीमार के लिए कोई दवा नहीं, यही वजह है कि ज़िंदा लोग कैंप्स से मुर्दा बनकर निकल रहे हैं.''
वीगर ह्यूमन राइट्स प्रोजेक्ट के नूरी टकेल ने ये दावा बीबीसी के हार्ड टॉक कार्यक्रम में किया था.

'इससे बेहतर तो गोली मार दो'
''मेरी मां और पत्नी को कैंप्स में ले गए. उन्हें लकड़ी की सख़्त कुर्सी पर बिठाया जाता है. मेरी बदनसीब मां को हर दिन ये सज़ा भुगतनी होती है. मेरी पत्नी का गुनाह बस इतना है कि वो वीगर है. इसकी वजह से उसे अलग कैंप में रखा गया है जहां ज़मीन पर सोना पड़ता है. मुझे नहीं मालूम वो आज ज़िंदा हैं भी या नहीं. मुझसे ये बर्दाश्त नहीं होता कि मेरी मां और पत्नी को चीन की सरकार तड़पा-तड़पाकर मारे. इससे तो बेहतर है उन्हें गोली मार दो, बुलेट के लिए पैसे मैं दे दूंगा.''
ये आपबीती है अब्दुर्रहमान हसन की जो उन हज़ारों वीगर मुसलमानों में से एक हैं जिन्होंने तुर्की जाकर अपनी जान बचाई है.

'मैंने एक लीवर और दो किडनी निकाली'
''ये साल 1995 की बात है. मुझे बुलाया गया और एक टीम बनाने के लिए कहा गया. फिर वो हमें वहां ले गए जहां लोगों को सज़ा के तौर पर गोली मारी गई थी. वहां मैंने एक लिवर और दो किडनी निकाली. लेकिन उस क़ैदी की मौत नहीं हुई थी, क्योंकि क़ैदी के सीने पर दाहिनी ओर जानबूझकर गोली इस तरह मारी गई थी कि वो फौरन मरे नहीं. उस समय मुझे इसमें कुछ ग़लत नहीं लगा क्योंकि मैं उस समाज में पैदा हुआ था जहां लोगों के दिमाग में बहुत सी चीज़ें ठूंस दी गई थीं और मैं भी ये मानता था कि देश के दुश्मन को ख़त्म कर देना हमारा कर्तव्य है.''
बीबीसी से बातचीत में ये दावा किया है अनवर तोहती ने जो एक निर्वासित वीगर हैं और लंदन में रहते हैं.

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ये तमाम अनुभव और दावे चीन के शिनजियांग प्रांत के बारे में हैं जहां एक करोड़ से ज़्यादा वीगर मुसलमान रहते हैं.
चीन पर ये आरोप लगे हैं कि उसने अल्पसंख्यक मुसलमानों को बड़ी संख्या में हिरासत या बंदीगृहों में रखा है.
इसी साल अगस्त में संयुक्त राष्ट्र की एक समिति को बताया गया कि 'क़रीब दस लाख लोग हिरासत में ज़िंदगी बिता रहे हैं.' ह्यूमन राइट्स वॉच भी इन रिपोर्टों की पुष्टि की है.
लेकिन जिनेवा में हुई संयुक्त राष्ट्र की एक बैठक में चीन ने दस लाख लोगों को हिरासत में रखे जाने की बात को 'सरासर झूठ' बताया है.
'अलगाववादी इस्लामी गुटों से ख़तरा'

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ब्रिटेन अमरीका और यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएं भी वीगर मुसलमानों की दशा पर चिंता जताती रही हैं. लेकिन चीन उन्हें ये कहकर ख़ारिज कर देता है कि उसे अलगाववादी इस्लामी गुटों से ख़तरा है.
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में चीन मामलों के जानकार प्रोफेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं, ''पिछले एक दशक में पूरे अंतरराष्ट्रीय माहौल में बदलाव आया है. दुनियाभर में एक ख़ास समुदाय को चरमपंथ के साथ जोड़कर देखा जा रहा है जो अपने आप में ग़लत है. लेकिन ये सच है कि बाकी दुनिया की तरह चीन में भी यही धारणा है.''
वो कहते हैं, ''वीगर मुसलमानों के प्रति चीन की सरकार की जो नीति है, उसमें इस सोच की झलक हो सकती है. ख़बरें तो यही कहती हैं कि चीन ने लगभग दस लाख मुसलमानों को यातनागृहों में रखा है, जिन्हें चीन की सरकार री-एजुकेशन कैंप मानती है.''

शिनचियांग के वीगर मुसलमान ख़ुद को सांस्कृतिक रूप से मध्य एशियाई देशों के क़रीब मानते हैं. उनकी भाषा भी तुर्की से मिलती-जुलती है.
प्रोफेसर स्वर्ण सिंह मानते हैं कि वीगर मुसलमान अपनी पहचान को संकट में पाते हैं, ''उन्हें लगता है कि हमारी भाषा-संस्कृति को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है. उनके रीति-रिवाज़ों को दबाया जा रहा है. ईस्ट तुर्कमेनिस्तान इंडिपेंडेंस मूवमेंट एक अलग मुद्दा है जो चीन को नाग़वार गुजरता है. लेकिन वहां रहने वालों को चीन की सरकार अल्पसंख्यक नज़रिए से देखती है. शिनजियांग सीमावर्ती प्रांत है जो सेंट्रल एशिया देशों से जुड़ा रहा है.''
वीगर मुसलमानों की अनदेखी!

ब्रिटेन और अमरीका जैसी ताक़तें वीगर मुसलमानों के मामले में चीन के ख़िलाफ़ अपनी बात बड़ी सतर्कता से रखती हैं. ये बातें अक्सर आलोचना करने से आगे नहीं बढ़ती. क्या वजह है कि पश्चिम की ताक़तें इस मामले में चीन के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं करतीं?
प्रोफेसर स्वर्ण सिंह चीन की सत्ता के स्वरूप और निवेश करने की उसकी ताक़त को इसकी बड़ी वजह मानते हैं, ''पिछले तीन दशकों में चीन जिस तरह एक बड़ी शक्ति बनकर उभरा है, उसकी वजह से सारी दुनिया का व्यवहार चीन के प्रति बदल गया है. एक पार्टी का शासन चीन को अलग तरह से ताक़त देता है. निवेश करने की चीन की क्षमता भी ज़बरदस्त है. इन तमाम वजहों से कोई चीन के भीतर इस मामले में दख़ल नहीं देना चाहेगा.''

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कश्मीर में भी रह चुके हैं वीगर मुसलमान
बीसवीं सदी की शुरुआत में वीगर मुसलमान कश्मीर और लद्दाख के इलाकों में बसे, लेकिन बाद में पलायन कर गए. कश्मीर में आज भी कुछ गलियां ऐसी हैं जहां के नाम बताते हैं कि वीगर मुसलमान कभी यहां भी रहा करते थे.
आज दुनिया में क़रीब 24 ऐसे देश हैं जहां वीगर मुसलमान रहते हैं जो चीन से बाहर होने की वजह से ख़ुद को अपेक्षाकृत अधिक महफ़ूज़ महसूस करते हैं.

क्या भारत और मुस्लिम आबादी वाले अन्य देश वीगर मुसलमानों के लिए कभी अपनी चिंता जताते हैं.
इस सवाल पर प्रोफेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं, ''भारत को इसके बारे में ज़रूर बात करना चाहिए, क्योंकि भारत इंडोनेशिया के बाद ऐसा दूसरा देश है जहां मुस्लिम आबादी सबसे अधिक है.''
वो कहते हैं, ''पर दूसरे देश जो इस्लाम के नाम पर हमेशा आगे बढ़-चढ़कर बात करते हैं, वो चाहे पाकिस्तान, सऊदी अरब या ईरान हों, ये सभी वीगर मुसलमानों के मुद्दों पर पूरी तरह से चुप्पी साधे रहते हैं. ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कंट्रीज़ की तरफ़ से जब कोई इस बात नहीं उठाता, तो बाक़ी देशों से क्या उम्मीद की जाए.''
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