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यहां के लोग 'मगरमच्छ की तरह' क्यों दिखना चाहते हैं
दुनिया के दूसरे सबसे बड़े द्वीप पापुआ न्यू गिनी के 80 फ़ीसदी लोग गांवों में रहते हैं. इनमें से अधिकतर गांव ऐसे इलाक़ों में हैं जो पूरी दुनिया की पहुंच से अब भी दूर हैं.
बीबीसी संवाददाता मार्क स्ट्रेटनने पाया कि यहां अब भी लोग पारंपरिक रीति रिवाज़ों का पालन करते हैं. उन्हीं की ज़ुबानी जानिए वहां की एक अनोखी रीत के बारे में.
शाम के धुंधलके परांबेई गांव में पुरुषों के पूजास्थल की छप्पर की छत साफ़ दिखाई दे रही थी. ये छत भी कुछ उन्हीं निशानों की तरह लगती है जो यहां के पुरुषों की छाती और पीठ पर देखे जा सकते हैं.
हूस तांब्रांन कहे जाने वाले ये पूजास्थल उत्तरी पापुआ न्यू गिनी के सेपिक नदी के किनारे बनाए गए हैं. ये यहां की धार्मिक आस्था का केंद्र हैं और यहां के लोग प्रकृति के प्रतीकों की पूजा करते हैं.
पूजास्थल को सूअर, सांप, केसविरी पक्षी और बाज़ जैसे जानवरों की छवियों और चित्रों से सजाया गया है. लेकिन इनमें जिस जानवर को ये लोग अपने जीवन की शक्ति के रूप में देखते हैं वो है मगरमच्छ.
यहां दीक्षा के लिए जिस व्यवस्था का पालन किया जाता है वो शायद दुनिया की सबसे मुश्किल तरीक़ों में से एक होगी.
सेपिक किनारे रहने वाले लोग दीक्षा प्राप्त करने के लिए अपनी चाकू से पीछ, छाती और कंधों पर काटने के निशान बनाते हैं. इस कटे निशान को ऐसे ही छोड़ दिया जाता है ताकि भरने के बाद ये मगरमच्छ की चमड़ी की तरह दिखे.
परांबेई गांव के प्रमुख आरोन मालिंगी बताते हैं, "इन युवाओं को उनके चाचा पूजाघर में ले कर आते हैं. उनके बदन पर निशान बनाने के लिए एक घंटे का वक़्त लग जाता है."
वो बताते हैं "सालों पहले इस काम के लिए बांस का इस्तेमाल किया जाता था जिसे अच्छे से पैना किया जाता था."
इन युवाओं की पीठ देख कर ही मैं उनके चर्च का अंदाज़ा लगा सकता था.
मालिंगी बताते हैं, "दर्द के कारण कई बच्चे बेहोश हो जाते हैं. उन्हें कम दर्द हो इसके लिए गांव से बुज़ुर्ग उनके लिए बांसुरी बजाते हैं. उनके घावों में पेड़ों से निकाला गया तेल लगाया जाता है और उसके ऊपर नदी की सफ़ेद मिट्टी डाली जाती है जिससे संक्रमण नहीं होता."
मालिंगी समझाते हैं कि इस रिवाज़ से उनके शरीर में मौजूद उनकी मां के ख़ून का शुद्धीकरण किया जाता है जिसके बाद उनके शरीर में नया युवा ख़ून बनता है. ये बड़े होने की प्रक्रिया का एक अहम क़दम माना जाता है.
मालिंगी बताते हैं कि सिर्फ़ बदन पर चाकुओं से निशान बनाना ही काफ़ी नहीं होता. "वो इस पूजास्थल में महीनों तक रहते हैं और युवा से पुरुष होने के लिए ज़रूरी गुर सीखते हैं. वो गांवों के पूर्वजों, मछली पकड़ने की कला, लकड़ी का काम करना औप अपनी पत्नी और परिवार को सहारा देने जैसी बातें सीखते हैं."
मैंने उनसे पूछा कि उनकी पूजा में की मगरमच्छ की अहम भूमिका कैसे है. मालिंगी बताते हैं, "मगरमच्छ को हम शक्ति का स्रोत मानते हैं. हम उनसे डरते हैं, लेकिन हम उनसे शक्ति भी ग्रहण करते हैं."
वो बताते हैं कि इलाक़े में प्रचलित मिथकों के अनुसार सेपिक किनारे रहने वाले लोगों के पूर्वज मगरमच्छ ही थे और बाद में वो इंसान बन कर नदी से बाहर निकले और ज़मीन पर चलने लगे.
मेरी चार दिन की यात्रा में मैंने पाया कि सेपिक के मध्य इलाक़े में इस रिवाज़ का पालन किया जाता है और लोग ख़ुद को मगरमच्छ से जोड़ कर देखते हैं. इनमें लातमुक भाषा बोलने वाले शामिल हैं जो पापुआ न्यू गिनी के 832 भाषा बोलने वालों में से एक हैं.
उनके गांव अभी भी बाहरी दुनिया से अछूते हैं. ये लोग सागू कहे जाने वाले एक खाद्य पदार्थ पर निर्भर करते हैं और मछली इनके खाने का अहम हिस्सा है. ये लोग गन्ने की खेती भी करते हैं और सूअर पालते हैं. पूजा में बलि देने के लिए और ख़रीद-फ़रोख्त के लिए इनका इस्तेमाल करते हैं.
नदी के पास रहने वाले कुछ समुदाय अब मगरमच्छ के लिए अपने ख़ून की बलि देने के रिवाज़ का पालन नहीं करते.
नाव पर परांबेई से आधे दिन के सफर पर है कामनिम्बित. मुझे बताया गया कि यहां ईसाई चर्च का प्रभाव है और यहां इस रिवाज़ को अब लोग नहीं मानते. 1885 में सेपिक इलाक़े में जर्मनी की कब्ज़ा था जिसके बाद से यहां लोग चर्च का रुख़ करने लगे.
हालांकि यहां इस रिवाज़ को अब नहीं माना जाता, लेकिन आप चर्च के बगल में हूस तांब्रांन देख सकते हैं जो अब एक क्लब की तरह बन गया है जहां युवा अपना वक्त बिताने आते हैं.
वूम्बन गांव में गांव के बड़े बुज़ुर्गों की पीठ पर मुझे मगरमच्छ की चमड़ी वाले निशान दिखे, लेकिन ये रिवाज़ यहां भी ख़त्म हो रहा है.
यहां के प्राथमिक के स्कूल टीचर साइमन केमाकेन कहते हैं, "मिशनरी इसके ख़िलाफ़ थे. हम अपने रिवाज़ को बचाए रखने के लिए कुछ सालों में एक बार इस समारोह का आयोजन करते रहते हैं लेकिन इन दिनों कम स्कूली छात्रों की इसमें दिलचस्पी है."
वो बताते हैं कि ऐसे समारोह के आयोजन में ही काफ़ी खर्च हो जाता है जिस कारण अब परिवार इसे बचना चाहते हैं.
लेकिन परांबेई में कैथलिक चर्च की मौजूदगी के बावजूद आम तौर पर पुरुष इस रिवाज़ का पालन करते हैं. मुझे आश्चर्य है कि क्या यहां चर्च का कोई प्रभाव नहीं पड़ा.
आरोन मालिंगी बताते हैं, "हमारे गांव में लोग पूजापाठ निष्ठा से करते हैं, लेकिन मिशनरी ने यहां भी अपना असर छोड़ा है."
मालिंगी बताते हैं कि मिशनरी ने उनके दादा-पिता को शिकार ना करने कि लिए भी राज़ी कर लिया था.
उन्होंने मुझे बताया कि इसी साल नवंबर में ख़ास इस समारोह का आयोजन किया जाएगा जिसमें कई युवा हिस्सा लेंगे. वो कहते हैं, "ये ज़रूरी है कि हम परांबेई में इस रिवाज़ का पालन करना जारी रखें."
"ये एक तरह से हमें हमारे होने का अहसास दिलाती है. अगर कोई युवा इस रिवाज़ का सफलता से पालन कर लेता है तचो वो जीवन में आने वाली हर मुश्किल का सामना करने के लिए तैयार हो जाता है."
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