‘तीन दुश्मनों’ के साथ कैसे दोस्ती निभा रहा है चीन

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- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, दिल्ली
ईरान, इसराइल और सऊदी अरब, तीनों मध्य-पूर्व के सबसे शक्तिशाली देश हैं. लेकिन तीनों ही देश एक-दूसरे के कट्टर विरोधी भी हैं.
जानकार इन देशों के आपसी रिश्तों का वर्णन या तो 'बैरी' के तौर पर करते हैं या फिर कहते हैं कि 'तीनों में कोई रिश्ता नहीं' है.
लेकिन आश्चर्य की बात ये हैं कि चीन के संबंध तीनों ही देशों के साथ अच्छे हैं. ये आख़िर कैसे संभव है?
रिश्तों की जटिलता
ईरान, सऊदी अरब और इसराइल, तीनों को ही एक दूसरे पर गहरा संदेह है और इसी वजह से इनके रिश्तों में कड़वाहट है.
इनमें से ईरान और सऊदी अरब, शिया और सुन्नी मुसलमानों के सबसे महत्वपूर्ण देश माने जाते हैं. और वो अपने सहयोगियों के साथ सीरिया, यमन और फ़लस्तीन में छद्म युद्ध लड़ रहे हैं.
दोनों देश इसराइल के कड़े आलोचक हैं और दोनों में से किसी के भी इसराइल के साथ आधिकारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं.
वहीं ईरान के परमाणु कार्यक्रम को इसराइल और सऊदी अरब, दोनों ही अपने लिए ख़तरा मानते हैं.

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इसराइल और सऊदी अरब, अमरीका के सबसे क़रीबी सहयोगी माने जाते हैं. वहीं मौजूदा हालात में ईरान को अमरीका का दुश्मन कहा जा रहा है.
लेकिन इन सबके बीच, चीन एक ऐसा देश है जिसके इन तीनों देशों से संबंध हैं. तीनों देशों की क्षेत्रीय शत्रुता का चीन पर कोई असर नहीं है.
जानकारों को लगता है कि मध्य-पूर्व में चीन की दूरदर्शी नीति ने काम किया है. हाल के वर्षों में इन देशों के नेताओं ने एक-दूसरे देश का दौरा किया.
ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने इसी साल जून में चीन का दौरा किया.


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चीन और ईरान की बातचीत
साल 1979 में इस्लामी क्रांति के बाद, अंतरराष्ट्रीय अलगाव की अवधि में चीन के साथ ईरान के संबंध मज़बूत हुए.
इराक़-ईरान युद्ध के दौरान, चीन ईरान का प्रमुख आपूर्तिकर्ता था. और परमाणु कार्यक्रम की वजह से जब अमरीका समेत यूरोपियन यूनियन ने ईरान पर प्रतिबंध लगाये, तब भी ईरान और चीन के संबंधों पर कोई असर नहीं हुआ.
चीन ने इससे भी फ़ायदा उठाया. उन्होंने ईरान के तेल का आयात किया.
ईरान, मध्य-पूर्व, एशिया और यूरोप के बीचोबीच स्थित है. वो चीन की एक विशाल परियोजना 'वन बेल्ट, वन रोड' का अहम हिस्सा भी है.
ये एक नया आर्थिक और औद्योगिक गलियारा होगा जिसमें सड़क, रेल और बंदरगाहों का जाल बुनने के लिए चीन क़रीब 60 लाख करोड़ रुपये से अधिक रकम उपलब्ध करायेगा.
अमरीका, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए 6 शक्तिशाली देशों के समझौते से पीछे हट रहा है. जबकि चीन ने ईरान को अपनी सबसे बड़ी परियोजना का अहम हिस्सा बनाया है.
इससे दोनों देशों के बीच संबंध और मज़बूत होने की उम्मीद है.

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इसराइल में चीन का निवेश
चीन के साथ इसराइल के पुराने क़रीबी राजनयिक संबंध रहे हैं. लेकिन इस बीच इसराइल ने चीन के साथ तेज़ी से मज़बूत आर्थिक संबंध विकसित कर लिये हैं.
पिछले साल, इसराइल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू ने अपनी चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच दो अरब डॉलर के एक समझौते पर हस्ताक्षर किये थे.
चीन के लोगों के लिए इसराइल घूमने-फिरने के लिए सबसे लोकप्रिय ठिकानों में से एक है. वहीं चीन ने इसराइल के प्रौद्योगिकी क्षेत्र में लगभग 16 अरब डॉलर का निवेश किया है.
लेकिन राजनीतिक क्षेत्र की अगर बात करें, तो संयुक्त राष्ट्र में जब भी मौक़ा मिला, चीन ने इसराइल के ख़िलाफ़ ही मतदान किया.


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चीन और सऊदी अरब के संबंध
पिछले साल मार्च में, जब सऊदी अरब के किंग सलमान और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाक़ात हुई तो इसे सबसे बड़े तेल निर्यातक के साथ दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक की मुलाक़ात कहा गया.
मध्य-पूर्व में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए चीन सऊदी अरब में आधारभूत संरचना बनाने की परियोजनाओं में निवेश करने में रुचि रखता है.
चीन पहले से ही सऊदी अरब का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. लेकिन उनके पास राजनीतिक क्षेत्र में गठबंधन नहीं है.
यमन की सऊदी अरब के समर्थन वाली सरकार हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ चीन की लड़ाई का समर्थन कर रही है.
लेकिन सीरियाई गृह-युद्ध में, चीन सऊदी अरब के दुश्मन सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद के साथ खड़ा है.

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चीन इन तीनों देशों के बीच एक संतुलन बनाये रखता है? लेकिन वो ऐसा कैसे कर पाता है.
अमरीका की नामी विश्लेषक एमिली हैथॉर्न का कहना है कि जो देश एक-दूसरे से लड़ रहे हैं, वे कुछ कारणों से चीन के संबंधों को एक-दूसरे के साथ बनाये रख सकते हैं.
वो कहती हैं, "चीन हमेशा धर्म या राजनीतिक विचारधारा में शामिल नहीं होना चाहता. लेकिन वो स्थिर आर्थिक संबंध बनाये रखना चाहता है. चीन ऐसे किसी भी क्षेत्र में कोई पक्ष नहीं ले सकता जहाँ ध्रुवीकरण बहुत तीव्र है."

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चीन के लक्ष्य
चीन के व्यापारिक सहयोगी चीन के साथ व्यापार करने और निवेश करने में ख़ुश हैं.
एमिली हैथॉर्न बताती हैं, "चीन के सहयोगी ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि चीन अमरीका से ठीक विपरीत, उनके लिए कोई मानक तय नहीं कर रहा है."
इसके अलावा चीन अन्य देशों के साथ अपने मानवाधिकारों के समर्थन में शामिल नहीं है.
एमिली कहती हैं कि मध्य-पूर्व में चीन के तीन लक्ष्य हैं. ऊर्जा की सुरक्षा, उच्च तकनीक के क्षेत्र में व्यापार के अवसर और 'वन बेल्ट, वन रोड' में निवेश.
ईरान, इसराइल और सऊदी अरब के साथ चीन के संबंध इन्हीं लक्ष्यों का मिश्रण है.
एमिली ये भी कहती हैं कि चीन अब तक तो सफल रहा है लेकिन भविष्य में चीन का बढ़ता प्रभाव समस्याएं पैदा कर सकता है.
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