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पाकिस्तान: मर्दों के चुनावी मैदान में उतरने वाली हिंदू औरत
- Author, शुमाइला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नगरपारकर, पाकिस्तान से
घनश्याम की आंखें कमज़ोर हैं.
पूजा शुरू करने से पहले माचिस जलाने में उन्हें कुछ मुश्किल तो हुई लेकिन एक दो मर्तबा कोशिश के बाद अगरबत्ती जलने लगी जिसके धुएं के पीछे उनका धुंधलाया हुआ चेहरा नज़र आने लगा.
घनश्याम भारतीय सीमा के पास बसे पाकिस्तान के नगरपारकर इलाक़े के मंदिर में जाते हैं.
ये मंदिर 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद हिंदू परिवारों के यहां से चले जाने के बाद से वीरान पड़ा है.
हालांकि पाकिस्तान के दूसरे इलाकों आज भी कई हिंदू रहते हैं. सबसे ज़्यादा हिंदू दक्षिणी सिंध प्रांत में रहते हैं.
पूजा पूरी करने के बाद घनश्याम ने हमसे कहा, "मेरे पिता बताते थे कि ये 12 हज़ार वर्ग फुट जगह थी. अब ज़मींदार कहता है कि ये उसकी ज़मीन है और सिर्फ़ ये मंदिर हमारा है. मेरे भाई ने उससे बात की तो वो नाराज़ हो गया और उसने कहा कि अदालत जाओ."
घनश्याम कहते हैं, "हम बहुत ग़रीब हैं. हम अदालत का ख़र्च नहीं उठा सकते."
सूफी की दरगाह
यहां से 100 किलोमीटर के फासले पर मिट्ठी शहर में सुनीता परमार अपनी चुनावी मुहिम चला रही हैं.
उनका ताल्लुक थरपारकर में आबाद दलित हिंदू बिरादरी से है.
एक मोटरसाइकिल रिक्शे (एक तरह की जुगाड़ गाड़ी) पर सुनीता की सास भी उनके साथ हैं.
वो चुनावी मुहिम शुरू करने से पहले एक सूफी की दरगाह पर रुकती हैं.
साड़ी पहने जब वे दरगाह में दाखिल हुईं तो उन्होंने अपने आंचल से घूंघट कर लिया. उनके साथ कुछ और लोग भी थे.
सिंध में मुसलमान और ग़ैर मुस्लिमों दोनों में सूफी दरगाहों पर जाने का रिवाज़ है.
सुनीता ने दरगाह में दाखिल होकर अपनी कामयाबी के लिए दुआ की.
हिंदुओं की आबादी
दरगाह में मौजूद क़रीब 50 समर्थकों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि वो इस जागीरदाराना व्यवस्था को चुनौती देंगी, जो ग़रीबों के साथ भेदभाव करता है और महिलाओं को उनका हक़ नहीं देता.
उन्होंने कहा, "मैंने स्थानीय ज़मींदारों को चुनौती देने का फ़ैसला किया है ताकि उनसे छुटकारा मिल सके."
सुनीता का दावा है कि उनकी बिरादरी की औरतों ने उन्हें आगे बढ़ाया है ताकि वो उनके लिए आवाज़ उठाएं और उनके हक़ के लिए लड़ सकें.
लेकिन सुनीता के चुनाव जीतने के आसार बहुत कम हैं.
हालांकि थरपारकर की आबादी में हिंदुओं की अच्छी ख़ासी संख्या है लेकिन राजनीति में उनकी भागीदारी बिल्कुल नगण्य है.
पूरे पाकिस्तान की बात करें तो यहां हिंदुओं की आबादी 3324392 है, जो कुल आबादी का 1.6 फीसदी है.
किसी बड़े राजनीतिक दल के समर्थन के बिना किसी हिंदू उम्मीदवार का आम सीट से चुनाव जीतने का सपना कभी पूरा नहीं हो सकता.
पाकिस्तान में हिंदू मतदाताओं की संख्या करीब 17 लाख है. यहां हिंदू धर्म अल्पसंख्यक समुदाय है.
अल्पसंख्यकों के लिए पाकिस्तान में दस सीटें आरक्षित हैं. लेकिन हिंदू सामान्य सीट पर भी चुनाव लड़ सकते हैं.
राजनीतिक दलों का साथ
पाकिस्तान के दलित आंदोलन के नेता डॉक्टर सोनू खिंगरानी का कहना है कि थरपारकर के कुल मतदाताओं में 23 फीसदी दलित हैं लेकिन उनकी किसी तरह की नुमाइंदगी वहाँ नहीं है.
डॉक्टर खिंगरानी ने बताया कि 20 दलितों ने टिकट के लिए अर्जी लगाई थी लेकिन बड़े राजनीतिक दलों में किसी ने उनका साथ नहीं दिया.
उन्होंने बताया कि पहले उनकी बिरादरी के कुछ लोग संसद तक पहुंचे थे लेकिन बड़े राजनीतिक नेताओं से संबंधों के कारण. इसीलिए वो बिरादरी की समस्याओं के बारे में कुछ नहीं कर सके.
दलितों समेत कई हिंदू पाकिस्तान में मंत्रियों के पद पर रहे हैं, जोगेंद्र नाथ मंडल देश के पहले हिंदू कानून मंत्री थे.
इसके अलावा कई दलित हिंदू संसद के सदस्य रह चुके हैं और उनमें से कुछ सामान्य सीटों से जीतकर वहां पहुंचे हैं.
लेकिन हिंदू बिरादरी की एक ऊंची जाति से ताल्लुक रखने वाले डॉक्टर महेश कुमार को पाकिस्तान पीपल्स पार्टी ने असेंबली में नॉमिनेट किया है.
पाकिस्तान पीपल्स पार्टी ने हाल ही में सिंध की रहने वाली एक दलित महिला कृष्णा कुमारी को भी सासंद बनाया है.
स्वतंत्र उम्मीदवार
मिट्ठी के मिलानी हाउस में जश्न जैसा माहौल है.
महेश कुमार मलानी अपने समर्थकों से हाथ मिलाते हुए कहते हैं, "हिंदू और मुसलमान वोटरों में कोई मतभेद नहीं है."
महेश कुमार लंबे अरसे से पीपीपी से जुड़े हैं और असेंबली के सदस्य रह चुके हैं.
उन्होंने कहा, "मुझे यकीन है कि पीपीपी के समर्थकों को मेरे मजहब से कोई फर्क नहीं पड़ता. वो पार्टी को वोट देंगे. हम जीत के लिए पूरी कोशिश कर रहे हैं."
बहुत से दलित स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर भी चुनाव लड़ रहे हैं.
हो सकता है कि वो जीत हासिल न कर सकें लेकिन अपनी मौजूदगी ज़रूर दर्ज करा रहे हैं.
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