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हम सब पर कैसे और कितनी पड़ेगी चीन-अमरीका ट्रेड वॉर की मार
- Author, करिश्मा वासवानी
- पदनाम, बीबीसी एशिया बिज़नेस संवाददाता
दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दें तो क्या होगा?
देखा जाए तो अमरीका और चीन के बीच सही मायनों में युद्ध तो नहीं बल्कि एक ट्रेड वॉर शुरू हो चुका है और ये कोई नहीं बता सकता कि ये और कितना बुरा बन सकता है.
जानते हैं कि इन दो देशों की अर्थव्यवस्थाओं के आपस में टकराने से भारत पर क्या असर पड़ेगा.
अमरीका ने चीन से आने वाले सामान पर बेशुमार टैरिफ़ (शुल्क) लगाने का फ़ैसला किया है और चीन ने भी इसी अंदाज़ में जवाब देने का फ़ैसला किया है.
आंख के बदले आंख
अमरीका में चीन से आयात होने वाले उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाया गया है. शुक्रवार से इन वस्तुओं पर 25 फ़ीसदी का शुल्क लग जाएगा यानी अमरीकी उपभोक्ताओं के लिए वो चीज़ें 25 फ़ीसदी महंगी हो जाएंगी.
- इसमें चीन में बने सेमीकंडक्टर चिप शामिल हैं. ये चिप टेलीविज़न, कंप्यूटर, स्मार्टफ़ोन, कार और रोज़मर्रा में इस्तेमाल होने वाली चाज़ों में लगती हैं.
- साथ ही अमरीका ने प्लास्टिक, परमाणु रिएक्टर और डेयरी का सामान बनाने वाली मशीनों पर भी अतिरिक्त शुल्क लगाया है.
- पीटरसन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल के अनुसार जिन वस्तुओं पर अमरीका ने अतिरिक्त शुल्क लगाया है वो ऐसी वस्तुएं हैं जो अन्य चीज़ों के उत्पादन में इस्तेमाल की जाती हैं और इस कारण इसका असर दूसरी वस्तुओं के उत्पादन और बाज़ार पर पड़ सकता है.
अमरीका असल में चाहता है कि वो चीन की 2025 नीति के अनुसार जिन चीज़ों का उत्पादन हो रहा है उन पर अतिरिक्त शुल्क लगाए.
अमरीका के इस कदम के बदले में चीन ने भी अमरीकी उत्पादों पर शुल्क लगाए हैं.
- चीन ने जिन 545 अमरीकी उत्पादों पर शुल्क बढ़ाया है उनमें 91 फ़ीसदी उत्पादों का नाता खेती किसानी से है. ऐसा कर के चीन ने सीधा किसानों और कृषि से जुड़े लोगों पर हमला किया है. माना जाता है कि ये अमरीकी राष्ट्रपति के वोट बैंक का अहम हिस्सा हैं.
- चीन ने कार सेक्टर में भी शुल्क बढ़ाया है, यानी अब अमरीका में बनने वाले फ़िएट, टेस्ला, क्राइस्लर चीन में महंगे हों जाएंगे.
- साथ ही मेडिकल उत्पादों, कोयला और कच्चे तेल पर (थोड़ा) शुल्क बढ़ाया है.
'मामला अब बिगड़ने लगा है'
चीन अपनी बात को मज़बूती के साथ कहने के लिए शब्दों के साथ खेलने में माहिर है, लेकिन ज़मीनी हालात इससे कहीं अलग हैं.
सिल्क रोड रिसर्च के विनेश मोटवानी कहते हैं, "व्यापारी वर्ग से जुड़े चीन में मौजूद हमारे जानकारों का कहना है कि हालात बेहद गंभीर हैं और ये बिगड़ते जा रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि शायद हालात अब और बुरे होने वाले हैं."
विनेश अभी-अभी चीन के दौरे से लौटे हैं. वो अपने रिसर्च के सिलसिले में चीन में व्यापार करने के मौकों के बारे में वहां मौजूद कंपनियों से चर्चा करते हैं.
वो कहते हैं कि अनिश्चितता के दौर में ये चिंताएं व्यापारियों के लिए 'अधिक सावधानी बरतने और भरोसा कम होने' में भी तब्दील हो सकती हैं.
इसका मतलब ये होगा कि कंपनियां अपना काम बढ़ाने से पीछे हटने लगेंगी और अगर चीनी अपना व्यापार बढ़ाने से पीछे हटे तो इसका असर एशिया के अन्य देशों पर भी पड़ेगा.
तो क्या उत्पादन ही अन्य देश में किया जाए?
सीधी बात है कि जब झगड़ा चीन और अमरीका के बीच है तो सबसे ज़्यादा असर इन दोनों पर ही पड़ेगा.
डीबीएस के मुख्य अर्थशात्री तैमूर बेग़ का कहना है कि इस ट्रेड वॉर के कारण दोनों देशों को इस साल अपनी जीडीपी का 0.25 फ़ीसदी गंवाना पड़ सकता है. अगले साल मामला और बिगड़ सकता है और दोनों देशों की विकास दर 0.5 फ़ीसदी तक कम हो सकती है.
बेग़ कहते हैं, "चीन की विकास दर 6-7 फ़ीसदी है और अमरीका की 2-3 फ़ीसदी, तो ऐसे में चीन की तुलना में अधिक नुक़सान अमरीका का होगा."
सप्लाई चेन पर असर पड़ने का प्रभाव दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और ताइवान पर भी पड़ सकता है.
चीन बड़ी मात्रा में ऐसे उपकरणों का निर्यात करता है जिनका इस्तेमाल दूसरे देश नए उत्पाद तैयार करने में करते हैं. इकोनॉमिक इंटेलीजेंस यूनिट के निक मर्रो कहते हैं, "चीन के निर्यात पर थोड़ा भी फ़र्क पड़ा तो दूसरे देशों के लिए इसके दूरगामी परिणाम होंगे."
अमरीका को निर्यात करने का फ़ायदा उठाने (या कहें नुक़सान से बचने) का एक उपाय ये हो सकता है कि कंपनियां उपकरणों के उत्पादन को चीन की ज़मीन से हटाकर किसी और देश में ले जाएं. लेकिन इस बदलाव को अंजाम देने में वक्त लगेगा और फिर चीन जिस मात्रा में उत्पादन कर रहा है उस लक्ष्य को पूरा करने में तो और भी वक्त लगेगा.
और इसका नतीजा ये होगा कि फ़िलहाल अमरीकियों को छोटी-छोटी वस्तुओं के लिए अधिक पैसे देने होंगे.
अमरीका को चीन का कड़ा उत्तर
चीन में काम करने वाली अमरीकी कंपनियों को भी "चीनी प्रतिक्रिया" का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है.
उदाहरण के तौर पर टेस्ला कार कंपनी के मालिक पहले ही कह चुके हैं कि चीनी बाज़ार उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण है और वो इस पर चिंता जता चुके हैं.
कंपनी अपनी ज़रूरत का सामान अमरीका से ही लेती है और चीन में बिकने वाली इसकी कारों पर 25 फ़ीसदी का शुल्क लगाया जाएगा और ये अतिरिक्त शुल्क उस 15 फ़ीसदी शुल्क के ऊपर होगा जो चीन में आयात होने वाली कारों पर लगाया जाता है.
नतीजतन चीन में टेस्ला की कीमतें काफ़ी बढ़ जाएंगी और ये कारें बाज़ार में मौजूद दूसरी कारों के मुकाबले पिछड़ सकती हैं.
सिल्क रोड रिसर्च के अनुसार अमरीका और चीनी रिश्तों में तनाव जारी रहा तो चीन में टेस्ला के लिए काम करना मुश्किल हो जाएगा.
और कितना बुरा हो सकता है ट्रेड वॉर?
मैं व्यापारीवर्ग में जिससे भी मुलाक़ात करती हूं उसके सामने यही सवाल रखती हूं और उत्तर लगभग एक जैसा ही होता है- किसी को नहीं पता.
अगर इतिहास की बात करें तो आज से पहले हुए ट्रेड वॉर का नतीजा हमेशा बुरा ही रहा है. माना जाता है कि 1930 में अमरीका ने जो स्मूट-हॉले शुल्क लगाए थे उससे एक तरह का ट्रेड वॉर शुरू हो गया था और इसका असर वैश्विक बाज़ार पर पड़ा था.
एक स्टडी के अनुसार 1929 से 1934 के बीच पूरे विश्व में व्यापार 66 फ़ीसदी तक कम हो गया था और अमरीका से होने वाला निर्यात और यूरोप से होने वाले आयात-निर्यात में दो तिहाई की कमी आई थी.
अभी कोई नहीं कह रहा है कि हम उस मुकाम तक पहुंच गए हैं, लेकिन इसे लेकर अनिश्चितता के कारण पहले के वक्त की तुलना में व्यापारीवर्ग अधिक परेशान है.
चीन और अमरीका के बीच 'आंख के बदले आंख' की इस भावना का ये भी असर हो सकता है कि दोनों पक्ष एक दूसरे से नाराज़गी जताने में इतना आगे बढ़ जाएं कि फिर अपनी छवि ख़राब होने के डर से उनके लिए पीछे लौटना मुश्किल हो जाए.
सिंगापुर इंटरनेशनल चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विक्टर मिल्स कहते हैं, "आप संरक्षणवाद और अलग-थलग पड़ने से शुरू करते हैं और इसके बाद और पहले अपने पड़ोसियों को कंगाल बनाते हैं और फिर ख़ुद को भी कंगाल कर लेते हैं."
व्यापारी वर्ग में कई लोगों को अब भी उम्मीद है कि एक दूसरे पर आरोप लगाने का ये सिलसिला थमेगा और एक समझौते पर पहुंचने की कोशिश होगी.
लेकिन अगर ऐसा नहीं हो पाया और ये लड़ाई आगे बढ़ती है तो सभी को इसका नुक़सान होगा- इसमें आप और हम सभी शामिल होंगे.
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