मेसी से मिलने के लिए ये भारतीय फ़ुटबॉल दीवाना साइकिल से रूस पहुंच गया

    • Author, विकास पांडे
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज, दिल्ली

फ़ुटबॉल के दीवाने किस हद तक जा सकते हैं, इसका एक और उदाहरण बन गए हैं केरल के रहने वाले क्लिफ़िन फ़्रांसिस.

रूस में फ़ुटबॉल विश्व कप देखने के लिए कई लोगों ने फ़्लाइट ली होगी, लेकिन इस शख़्स ने साइकिल से ये लंबा सफ़र तय करने का रास्ता चुना.

कई देशों के रास्तों से गुज़रकर और कई उतार-चढ़ावों से होते हुए क्लिफ़िन अपनी इस यात्रा को अंजाम देने की कोशिश में लगे हुए हैं.

क्लिफ़िन कहते हैं कि पिछले साल उनसे एक दोस्त ने पूछा था कि 'क्या वो फ़ुटबॉल विश्व कप देखने जा रहे हैं.'

तब क्लिफ़िन ने कहा था, ''हां ज़रूर, मैं इसे देखने के लिए रूस भी जा सकता हूं.''

वो अगस्त का महीना था, लेकिन तब क्लिफ़िन को नहीं पता था कि वो फ़्लाइट की टिकट के लिए पैसे कहां से लाने वाले हैं. वह गणित के एक फ़्रीलांस टीचर हैं और हर दिन 2,700 रुपये तक कमा लेते हैं.

क्लिफ़िन कहते हैं, ''मेरे पास रूस जाने और वहां एक महीने तक रहने के लिए पैसे नहीं थे. तब मैंने रूस जाने के सबसे सस्ते तरीके बारे में सोचा और मुझे जवाब मिला- साइकिल.''

साइकिल से रूस जाने के फ़ैसले से दोस्त हैरान

साइकिल पर भारत से रूस- लोगों को इस पर हैरानी तो होनी ही थी. क्लिफ़िन के दोस्तों को भी उन पर भरोसा नहीं हुआ, लेकिन वो साइकिल से जाने का फ़ैसला कर चुके थे.

23 फ़रवरी 2018 को उन्होंने अपनी ये मुश्किल, पर रोमांचक यात्रा शुरू की. इसके लिए वह पहले फ़्लाइट से दुबई गए और फिर समुद्र के रास्ते ईरान. यहां से वो अपनी साइकिल पर सवार होकर निकल पड़े.

साइकिल से ईरान से रूस की दूरी अब भी 4200 किलोमीटर थी. लेकिन, उन्हें खुशी थी इस पूरी मेहनत के बाद मिलने वाले नतीजे की यानी अपने पसंदीदा फ़ुटबॉल खिलाड़ी लिओनेल मेसी से मिलना.

क्लिफ़िन कहते हैं, ''मुझे साइकिल चलाना बहुत पसंद है और मैं फ़ुटबॉल को लेकर पागल हूं और यहां मैंने अपने दो जुनूनों को एक साथ मिला दिया है.''

पाकिस्तान का रास्ता छोड़ा

क्लिफ़िन पहले पाकिस्तान जाने वाले थे, लेकिन फिर भारत-पाकिस्तान के तनावपूर्ण रिश्तों को देखते हुए उन्होंने रास्ता बदल दिया. हालांकि, उनको इसका काफ़ी नुकसान भी हुआ.

उन्होंने बताया कि प्लान बदलने के चलते उन्हें काफ़ी ख़र्च उठाना पड़ा. वो दुबई अपनी साइकिल नहीं ले जा सकते थे, इसलिए उन्हें वहां क़रीब 47,000 रुपये में नई साइकिल ख़रीदनी पड़ी. लंबी दूरी की यात्रा के लिए वो बहुत अच्छी साइकिल नहीं थी, लेकिन वो बस वही ख़रीद सकते थे.

लेकिन, जैसे ही उन्होंने 11 मार्च को ईरान के बंदरगाह बंदर अब्बास में प्रवेश किया तो उनका अफ़सोस ख़त्म हो गया.

वह कहते हैं, ''यह दुनिया में सबसे ज़्यादा खूबसूरत देश है और यहां के लोग बहुत अच्छी मेहमान नवाज़ी करते हैं. मैंने वहां 45 दिन बिताए और सिर्फ़ दो दिनों के लिए ही होटल में रहना पड़ा.''

क्लिफ़िन के पास हर दिन ख़र्च करने के लिए सिर्फ़ 680 रुपये थे. लेकिन, वो ईरान में जहां भी गए सभी ने उन्हें अपने घर में रहने और खाना खाने का न्योता दिया.

क्लिफ़िन कहते हैं, ''ईरान को लेकर मेरी सोच बिल्कुल बदल गई. मुझे एहसास हुआ कि किसी देश की भू-राजनीति के हिसाब से हमें उसके बारे में राय नहीं बनानी चाहिए.''

''वहां के लोगों ने मुझसे वादा लिया कि मैं फ़ुटबॉल विश्व कप में ईरानी टीम के लिए चीयर करूंगा. उन्हें बॉलीवुड से प्यार है और इस बात ने मुझे कई जगह लोगों से घुलने-मिलने में मदद भी की.''

साइकिल चलाकर हुए पतले

अगला पड़ाव अज़रबैजान था, जहां उन्हें सीमा पर अपनी यात्रा दस्तावेजों को लेकर कुछ मुश्किल हुई क्योंकि लगातार साइकिल चलाने से क्लिफ़िन का वज़न काफ़ी कम हो गया था.

क्लिफ़िन कहते हैं, ''वज़न कम होने से मेरा चेहरा काफ़ी बदल गया था और मैं पासपोर्ट में लगी तस्वीर से अलग दिख रहा था. पुलिस को मेरी पहचान की जांच करने में आठ घंटे लग गए, लेकिन उनका व्यवहार अच्छा था.''

अज़रबैजान में होटल में रहने के लिए क्लिफ़िन के पास पैसे नहीं थे, इसलिए वो जगह-जगह पार्क में टेंट लगाकर रहे.

क्लिफ़िन ने बताया, ''यहां के लोग बहुत अच्छे हैं, लेकिन खुलने में थोड़ा वक्त लेते हैं. मुझे राजधानी बाकू में कुछ भारतीय भी मिले और मैं कुछ देर उनके साथ रहा भी.''

जॉर्जिया में फंसे क्लिफ़िन

जॉर्जिया में पहुंचकर क्लिफ़िन के सामने एक नई मुश्किल आ गई. उन्होंने बताया, ''मेरे पास सभी दस्तावेज़ थे, लेकिन पता नहीं उन्होंने मुझे क्यों नहीं जाने दिया. इसने मुझे मुश्किल में डाल दिया क्योंकि मेरे पास अज़रबैजान के लिए सिर्फ़ एक ही एंट्री-​वीज़ा था.''

अब क्लिफ़िन एक दिन के लिए जॉर्जिया और अज़रबैजान के बीच 'नो मैन्स लैंड' में फंस गए. हालांकि, फिर से उन्हें अज़रबैजान में प्रवेश के लिए तुरंत वीज़ा मिल गया.

क्लिफ़िन ने बताया, ''अब मुझे रूस जाने का दूसरा रास्ता खोजना था. किसी ने बताया कि अज़रबैजान की सीमा रूस के दागेस्तान क्षेत्र से लगती है. वह जगह सुरक्षित है या नहीं ये न सोचते हुए मैं वहां गया. उस वक्त मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था.''

क्लिफ़िन 5 जून को दागेस्तान पहुंचे. यहां भाषा उनके लिए बहुत बड़ी समस्या बन गई क्योंकि लोग मुश्किल से ही अंग्रेज़ी बोलते थे.

लोग उन्हें देखकर काफ़ी हैरान भी थे. क्लिफ़िन ने कहा, ''लोग एक भारतीय को साइकिल पर देखकर बहुत हैरान थे. यहां भी उन्होंने फ़ुटबॉल और फ़िल्म की सार्वभौमिक भाषा के ज़रिए लोगों से पहचान बढ़ाई.''

रूस पहुंचे क्लिफ़िन

क्लिफ़िन अब तंबोव पहुंच गए हैं जो रूस की राजधानी मास्को से 460 किलोमीटर दूर है. उन्हें फ़्रांस और डेनमार्क के मैच के लिए किसी भी तरह 26 जून को मॉस्को पहुंचना है.

वह कहते हैं, ''यह अकेला ऐसा मैच है जिसके लिए मुझे टिकट मिला है. लेकिन, मैं अर्जेंटीना और लिओनेल मेसी का फ़ैन हूं. मैं मेसी की पूजा करता हूं. उनसे मिलना और मेरी साइकिल पर उनका ऑटोग्राफ लेना मेरा सपना है.''

क्लिफ़िन को उम्मीद है कि उनकी यात्रा दूसरों को भी प्रेरणा देगी. वह चाहते हैं कि किसी दिन भारत भी विश्व कप में हिस्सा ले.

वहीं, साइक्लिंग को लेकर क्लिफ़िन कहते हैं, ''साइकिल चलाना आपको जीवन की प्रा​थमिक ज़रूरतों की तरफ़ ले जाता है. मतलब आपके लिए सबसे ज़्यादा क्या ज़रूरी है जैसे अच्छा खाना, नहाना और टेंट लगाने के लिए अच्छी जगह. इतने में आप खुश हो जाते हैं. मुझे बहुत खुशी होगी अगर मेरी यात्रा से एक भी बच्चे को फ़ुटबॉल खेलने की प्रेरणा मिलती है.''

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