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ट्रंप और किम के मुलाक़ात से आख़िर हासिल क्या हुआ?
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन की मुलाक़ात सिंगापुर में हुई.
कभी एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे नेताओं ने जब हाथ मिलाया तो पूरी दुनिया में इसकी चर्चा हुई. इसे ऐतिहासिक क़रार दिया गया.
यह पहली बार था जब दोनों देश के नेता मिल रहे थे. पर इस मुलाक़ात से वास्तव में हासिल क्या हुआ? इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे और अब आगे क्या होगा?
यह सवाल हमने कई विशेषज्ञों से पूछी. पढ़िए उनका नज़रिया.
'भविष्य में बातचीत के दरवाजे खुले'
अंड्रिया बर्गर, सीनियर रिसर्च एसोसिएट, जेम्स मार्टिन सेंटर फॉर नॉन-प्रोलिफ़ेरेशन स्टडीज
किम जोंग-उन अपनी किसी महत्वकांक्षी परियोजनाओं के प्रावधानों पर बिना कोई हस्ताक्षर किए सिंगापुर से वापस चले गए.
दोनों नेताओं ने जो भी ऐलान किया, वो पहले से हुए समझौते थे और इसमें स्पष्टता कम है. साझा दस्तावेज़ नई बोतल में पुरानी शराब की तरह थी.
पर एक बात है, जो मायने रखती है और वो है मुलाक़ात ने भविष्य में सीधी बातचीत के दरवाजे खोल दिए है. दोनों देशों के बीच राजनैतिक संबंध बेहतर होंगे.
इससे यह होगा कि जो भी साझा दस्तावेजों में अस्पष्टता है, वो भविष्य में दूर हो सकता है. मुलाक़ात के बाद हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस डोनल्ड ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ अपने साझा सैन्य अभ्यास को रद्द करने की घोषणा की, जिससे उत्तर कोरिया को पहले से आपत्ति थी.
इसका असर ये होगा कि प्योंगयांग और अमरीका की नजदीकियां बढ़ेंगी.
'मुलाक़ात वास्तविकता पर विश्वास की जीत थी'
जॉन निल्सन राइट, उत्तर-पूर्व एशिया विशेषज्ञ, सीनियर लेक्चरर, यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैम्ब्रिज
दोनों नेताओं के मन में वार्ता से सभी उम्मीदें पूरी होने और इसे सफल बनाने की तमन्ना थी. लेकिन जो कुछ भी मुलाक़ात के दौरान दिखा और बातें हुई, उसपर अमल कितना होगा, यह देखना होगा.
मुलाक़ात वास्तविकता पर विश्वास की जीत थी. किम जोंग-उन को इस बात की खुशी होगी कि उनकी छवि अब एक बेहतर अंतरराष्ट्रीय नेता की तरह होगी, जिसे ट्रंप पसंद करते और सम्मान देते हैं.
अमरीकी सहयोगियों को दक्षिण कोरिया में सैन्य अभ्यासों को बंद करने पर आपत्ति हो सकती है. यह भी देखना होगा कि उत्तर कोरिया और जापान के रिश्ते बेहतर होते हैं या नहीं. अब सब की नज़र मुलाक़ात की वास्तविकता में बदलने के इंतज़ार पर होगी.
'पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण पर लिखित बात नहीं हुई'
अंकित पांडा, सीनियर एडिटर, द डिप्लोमैट
साझा घोषणापत्र से पूर्ण निरस्त्रीकरण के दो अलग-अलग संदर्भ सामने आते हैं. अगर उत्तर कोरिया ऐसा करता है तो वह खुद को नुक़सान पहुंचाएगा.
उत्तर कोरिया ने कुछ दिन पहले ही अपने एक परमाणु परीक्षण स्थल को नष्ट किया था. उत्तर कोरिया अब दुनिया के सामने खुद को परिपक्व और ज़िम्मेदार परमाणु शक्ति सम्पन्न देश के रूप में रखना चाहता है.
साझा घोषणापत्र पर हस्ताक्षकर करने के बाद ट्रंप ने किम से सभी परमाणु परीक्षण स्थलों को नष्ट करने की बात कही, जिस पर किम ने हामी भरी, पर इस पर लिखित कोई बात नहीं हुई.
'उत्तर कोरिया के लोगों को बेहतरी की उम्मीद'
सोकील पार्क, डायरेक्टर ऑफ रिसर्च एंड सट्रैटजी, लिबर्टी इन नॉर्थ कोरिया
एक बहुप्रतिशित वार्ता का समझौता बहुत ही हल्का था. ये समझौता पत्र पहले की घोषणाओं की कॉपी पेस्ट लगता है.
अगर परमाणु निरस्त्रीकरण का समाधान स्पष्ट नहीं हो तो यह हो सकता है कि किम जोंग-उन लंबी पारी खेलना चाह रहे हैं.
मुलाक़ात का असर पता लगने में एक से दो साल लग जाएंगे. यह स्पष्ट है कि वार्ता और उससे पहले दक्षिण कोरिया और चीन के नेताओं से किम की मुलाक़ात से निवेश को बढ़ावा देगा.
उत्तर कोरिया के लोग एक बेहतर बदलाव चाहते हैं. हालांकि सम्मलेन की हुई रिपोर्टिंग से देश के लोग कम उम्मीदें कर सकते हैं, लेकिन परिणाम व्यापक हो सकते हैं.
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