वेनेज़ुएला में चुनाव: मिलेगी ग़रीबी, भ्रष्टाचार, आर्थिक संकट से मुक्ति?

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गंभीर आर्थिक संकट और भुखमरी से जूझ रहे लातिन अमरीकी देश वेनेज़ुएला में रविवार को राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हो रहा है. लेकिन ये एक ऐसा चुनाव है जिसके नतीज़ों को लेकर लोग पहले से आश्वस्त हैं.
वेनेज़ुएला में बीते कई सालों से जारी तनाव और अव्यवस्था के माहौल में एक समय ऐसा भी आया जब वेनेज़ुएला की सड़कों पर हर रोज़ सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हुआ करते थे.
इस देश के लाखों नागरिक वेनेज़ुएला छोड़कर कोलंबिया और ब्राज़ील में शरण ले चुके हैं.
वेनेज़ुएला में ग़रीबी से जूझ रहे कुछ इलाकों में 70 फ़ीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं.
लेकिन राष्ट्रपति निकोलस मादुरो सत्ता पर अपनी पकड़ को और मजबूत करने के इरादे से चुनाव में उतरे हैं.

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दिलचस्प बात ये है कि इस चुनाव में विपक्षी दलों ने भाग लेने से इनकार कर दिया है.
कौन होगा वेनेज़ुएला का नया राष्ट्रपति?
ज़्यादातर विशेषज्ञ मानते हैं कि इस चुनाव में मादुरो के जीतने की संभावना है. वहीं, उनके विरोधियों को इस चुनावी प्रक्रिया में भारी धांधली होने की आशंका है, ऐसे में उन्होंने इस चुनाव से अपनी दूरी बना ली है.
ये चुनाव साल 2018 में होने वाले थे, लेकिन मादुरो के समर्थकों से भरी राष्ट्रीय संविधान सभा ने चुनाव का समय बदल दिया.
मादुरो का विरोधी पक्ष 'लोकतांत्रिक एकता गठबंधन' कहता है कि चुनावों के वक़्त को इसलिए बदला गया है ताकि विपक्षी दलों के बीच चल रहे मतभेदों का फ़ायदा उठाया जा सके.

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विपक्षी गठबंधन के दो बड़े नेताओं को चुनाव में खड़े होने से प्रतिबंधित कर दिया गया है. इसके साथ ही दूसरे बड़े नेता देश छोड़कर भाग गए हैं.
ऐसे में मादुरो के समर्थन में कई लोग खड़े हैं जो मादुरो के जीतने पर खुश होंगे.
क्या मादुरो के विपक्ष में कोई नहीं?

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दरअसल, इस चुनाव में कुछ नए नेता खड़े हैं. हालांकि, वे मादुरो के सामने कोई चुनौती पेश नहीं करते हैं.
ऐसे ही एक उम्मीदवार हैं हेनरी फ़ाल्कन.
ये वो शख़्स हैं जो पूर्व राष्ट्रपति उगो शावेज़ के दौर में गवर्नर हुआ करते थे और उसी पार्टी से आए हैं जिसमें से मादुरो आते हैं. लेकिन उन्होंने 2006 में सत्ता पक्ष छोड़कर विपक्ष में बैठना शुरू कर दिया.
ऐसे में सवाल उठता है कि अगर विपक्षी दल इस चुनाव को दरकिनार कर रहे हैं तो हेनरी फ़ाल्कन चुनाव क्यों लड़ रहे हैं.

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फ़ाल्कन कहते हैं कि राष्ट्रपति मादुरो को सत्ता से बाहर करने का सिर्फ़ एक रास्ता है और वह चुनाव है.
वह मानते हैं कि ज़्यादातर वेनेज़ुएला निवासी उनसे मुक्ति पाना चाहते हैं और ऐसे में वेनेज़ुएला के लोगों को ये मौका देना चाहिए.
हालांकि, उनके इस कदम से बाकी विपक्ष में गुस्से का माहौल है और कुछ लोगों ने उन्हें धोख़ेबाज़ की संज्ञा भी दी है.
क्या ये एक चुनाव वैधानिक हैं?
मादुरो के करीबी लोगों और सरकार के मुताबिक़ चुनाव एक वैधानिक प्रक्रिया है, लेकिन सभी लोग उनसे सहमत नहीं हैं.
विपक्षी दलों के इस चुनाव से किनारा करने की एक वजह पिछले साल गवर्नरों के लिए हुए चुनाव के नतीज़े हैं.
उन चुनावों में वेनेज़ुएला के 23 राज्यों में से 17 राज्यों में मादुरो की पार्टी ने जीत दर्ज की थी और उनके विरोधियों ने धांधली का आरोप लगाया था.

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वेनेज़ुएला के लिए वोटिंग मशीन बनाने वाली कंपनी ने कहा था कि संविधान सभा के विवादित चुनाव के दौरान आंकड़ों से छेड़छाड़ की गई थी. इसके बाद विपक्षी दलों ने चुनावों में धांधली का आरोप लगाया था.
ऐसे में चुनाव आयोग के होने का भी कोई फ़ायदा नहीं है क्योंकि उसमें भी संविधान सभा और सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार समर्थक लोग हैं.
इसकी वजह से यूरोपीय संघ और अमरीका ने कहा है कि वेनेज़ुएला में अगर लोकतंत्र पर ख़तरा आता है तो वे उस पर प्रतिबंध लगा देंगे.
इसके साथ ही वेनेज़ुएला के कुछ लातिन अमरीकी पड़ोसी देश आधिकारिक रूप से इस चुनाव के परिणाम के साथ सहज न रह सके.
ये माना जा रहा है कि इन तमाम अनिश्चितताओं के बीच कई नागरिक मतदान ही नहीं करेंगे.
मादुरो का क़द इतना विशाल कैसे?
वेनेज़ुएला के इतिहास में निकोलस मादुरो वह शख़्स हैं जिन्होंने लातिन अमरीकी देशों में 21वीं शताब्दी के सबसे शानदार और करिश्माई नेता उगो शावेज़ की जगह ली.
मादुरो की ही सरकार में वेनेज़ुएला ने हाल के दिनों का सबसे बड़ा आर्थिक संकट झेला. लेकिन इस सबके बाद भी निकोलस मादुरो की सरकार बची रही.

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वेनेज़ुएला में तमाम विरोध के बावजूद पूर्व राष्ट्रपति उगो शावेज़ की विचारधारा का समर्थन ही उन्हें जीत दिलाने के लिए काफ़ी है.
खाद्य संकट, दवाओं, असुरक्षा और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं का निवारण करने के लिए कम से कम 50 लाख लोग उन्हें वोट देने जा रहे हैं.
लेकिन मादुरो इससे भी ज़्यादा एक करोड़ मतदाताओं का समर्थन चाहते हैं जितने वोट कभी उनके राजनीतिक गुरु उगो शावेज़ को भी नहीं मिले थे.
शावेज़ के सबसे क़रीबी रहे मादुरो
वेनेज़ुएला की राजनीति में निकोलस मादुरो को उन नेताओं में गिना जाता है जो पूर्व राष्ट्रपति उगो शावेज़ के सबसे क़रीबी लोगों में शामिल रहे हैं.
अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में कैंसर से पीड़ित शावेज़ को इलाज़ के लिए एक लंबा समय क्यूबा की राजधानी हवाना में बिताना पड़ा और मादुरो वह नेता थे जिन्होंने शायद उस दौरान क्यूबा में सबसे ज़्यादा वक्त बिताया.

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अपनी मौत से पहले शावेज़ ने मादुरो को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया. बस ड्राइवर के बेटे के रूप में बचपन बिताने वाले मादुरो के लिए ये उनके राजनीतिक जीवन की एक बड़ी उपलब्धि थी.
साल 2006 में उगो शावेज़ ने उन्हें विदेश नीति का प्रमुख बनाया था. मादुरो कूटनीतिज्ञ नहीं थे और कई भाषाएं भी नहीं जानते थे.
लेकिन मादुरो ने अपने आपको साबित करके दिखाया.

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मादुरो के विदेश मंत्री रहते हुए उगो शावेज़ के करिश्माई व्यक्तित्व और तेल से आने वाले पैसे से वेनेज़ुएला ने अपना प्रभाव बढ़ाया और अमरीका से सीधी टक्कर ली.
एक समय ऐसा भी आया था जब उगो शावेज़ ने सवाल उठाया था कि कहीं अमरीका ने लातिन-अमरीकी देशों के नेताओं को कैंसर की बीमारी देने की गुप्त तकनीक तो इज़ाद नहीं कर ली है.
साल 2009 में होंडुरास में होने वाली अमरीकी राज्यों के संगठन की आम सभा में साल 1962 में लिए उस निर्णय को रद्द कर दिया गया जिसमें क्यूबा को इंटर-स्टेट अमरीकी तंत्र से अलग रखने का फ़ैसला किया गया था. ये अमरीका के लिए एक असामान्य हार थी.
ये वो साल थे जब मादुरो उगो शावेज़ के क़रीब जाने में सफल हुए. इसके बाद जब 2012 में शावेज़ की मृत्यु हुई तो मादुरो ने ही ये सूचना वेनेज़ुएला के लोगों को दी.
मादुरो के राज में वेनेज़ुएला का हाल
मादुरो के गुरु उगो चावेज़ ने जिस वेनेज़ुएला को क्रांति के रथ पर सवार होकर तेल कंपनियों के मकड़ जाल से बाहर निकाला था, वही देश मादुरो की नीतियों के चलते आर्थिक संकट झेल रहा है.
वेनेज़ुएला पर करीब 14,000 करोड़ डॉलर यानी 9 लाख करोड़ रुपये से अधिक का विदेशी कर्ज़ है.
साल 2014 में तेल के दामों में गिरावट आने की वजह से वेनेज़ुएला को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा क्योंकि वेनेज़ुएला का मुख्य उत्पाद ही तेल निर्यात है. इसके अलावा ज़्यादातर चीजों को बाहर से आयात करना पड़ता है.
वेनेज़ुएला की राष्ट्रीय मुद्रा वोलिवर एक तरह से बेकार हो गई है और बैंकों के सामने लोगों की लंबी कतारें देखी जा सकती हैं. वेनेज़ुएला में लोगों को बड़े-बड़े झोलों में नोटों के साथ देखा जा सकता है.
बीते साल वेनेज़ुएला को कंगाली से बचाने के लिए राष्ट्रपति निकोलस मादुरो ने नई वर्चुअल करेंसी (मुद्रा) बनाने की घोषणा की थी.
लेकिन इसके बाद की सरकार में मादुरो के सामने आर्थिक संकट और राजनीतिक संघर्ष के तमाम मौके आए, लेकिन मादुरो ने अब तक हार नहीं मानी है.
अब देखना ये है कि जानकारों की नज़र में लगभग एक तरफ़ा माने जा रहे इस चुनाव का नतीजा क्या रहता है और जो भी अगली सरकार बनती है वो वेनेज़ुएला की मौजूदा समस्याओं से उसे कैसे उबार पाती है.
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