नज़रिया: मोदी नेपाल में 'तीर्थयात्रा' पर थे या चुनावी एजेंडे पर?

    • Author, सीके लाल
    • पदनाम, वरिष्ठ नेपाली पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

खुद को प्रधानमंत्री की जगह तीर्थयात्री के रूप में पेश करते हुए नरेंद्र मोदी ने अपनी नेपाल यात्रा की शुरुआत मिथिला की सांस्कृतिक राजधानी माने जाने वाले जनपुरधाम से की.

और केवल दो दिनों का उनका नेपाल दौरा वाकई तीर्थयात्रा जैसा ही दिखाई पड़ा.

रामकथा के अनुसार जगत जननी कही जाने वाली जानकी महाराज जनक के जनकपुर में ही पली बढ़ी थीं.

यहीं पर अयोध्या के कौशल्या पुत्र राम ने शिव धनुष तोड़ा और सीता और राम का विवाह सम्पन्न हुआ था.

टीकमगढ़ की महारानी वृषभानु कुमारी ने अपने गुरु के कहने पर जनकपुर में जानकी मंदिर का निर्माण उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में करवाया था.

प्रधानमंत्री मोदी की तीर्थयात्रा

प्रधानमंत्री मोदी जानकी मंदिर में षोडशोपचार विधि से पूजा अर्चना करने के बाद ही सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखाई दिए.

चार सालों में प्रधानमंत्री मोदी के तीसरे नेपाल भ्रमण का यदि कोई प्रतीक चिन्ह दिखाया जाए तो शायद वही एक तस्वीर होगी जिसमें वो मग्न होकर अखण्ड कीर्तन में करताल बजाते हुए दिखाई देते हैं.

प्रधानमंत्री मोदी की तीर्थयात्रा वैष्णव मत के रामानन्दी सम्प्रदाय के प्रमुख केन्द्रों में से एक माने जाने वाले पवित्र भूमि से हुई.

कहते हैं कि तत्कालीन भारतीय समाज में व्याप्त छुआछूत, ऊंच-नीच, जात-पात और नर-नारी विभेद का विरोध करने वाले स्वामी रामानन्द ने मध्यकाल में 'जात-पात पूछे ना कोई, हरि को भजै सो हरि का होई' उद्धघोष के साथ भक्ति आंदोलन का शंखनाद किया था.

हिन्दू धर्म में समानता और सहजता लाने वाले 'द्रविड़ भक्ति उपजी, लाये रामानन्द' के बदौलत रैदास, सूरदास और कबीर जैसे सुधारक संतों ने उत्तर भारत में सामाजिक और सांस्कृतिक आन्दोलनों को घर-घर पहुँचाया.

मंदिर और मस्जिद का मसला

करताल प्रधानमंत्री मोदी जनकपुर में बजा रहे थे, मगर उसकी अनुगूंज सिर्फ़ अयोध्या, काशी, प्रयाग और चित्रकूट ही नहीं बल्कि भक्ति परंपरा के वैष्णव संत रामानुजाचार्य की कर्मभूमि कर्नाटक और तमिलनाडु तक पहुँची होगी.

पूजा प्रधानमंत्री मोदी जनकपुर में कर रहे थे लेकिन अयोध्या का मंदिर और मस्जिद का मसला भारतीय मीडिया में फिर से निकल पड़ा था.

प्रधानमंत्री मोदी का दूसरा तीर्थ मुक्तिनाथ था जिसे वैष्णव का ही स्वामीनारायण सम्प्रदाय का महत्वपूर्ण धाम माना जाता है.

धाम की भूमि मात्र भी पवित्र मानी जाती है. वहाँ पहुँचना ही अपने आप में एक उपलब्धि है.

मुक्तिनाथ से प्रधानमंत्री की नज़र गुजरात पर होगी जहाँ स्वामीनारायण सम्प्रदाय का उल्लेख है.

रामायण सर्किट से फूंका चुनावी बिगुल

पशुपतिनाथ में बतौर प्रधानमंत्री मोदी ने तीसरी बार पूजा-अर्चना की. निगाहें थी शैव सम्प्रदाय पर जो पूरे भारत में फैले हुए हैं. प्रधानमंत्री मोदी काशी से सांसद हैं.

तीर्थस्थलों में पशुपतिनाथ और काशी विश्वनाथ की महत्ता को बार-बार दोहराना उनकी आदत सी हो गई हैं.

हरि भजन भले ही प्रधान तीर्थयात्री का मक़सद रहा हो, लेकिन भारतीय जनता पार्टी का प्रमुख चेहरा अपने राजनीतिक प्रचारक की भूमिका को वे भूले नहीं.

भारत में आम चुनाव अगले साल होने हैं. नेपाल से सटा उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल नई दिल्ली के शासक का भाग्य निर्धारण करेगा.

सो एक साथ प्रधानमंत्री मोदी ने रामायण सर्किट, बोधगया, अयोध्या-जनकपुर बस सेवा और पर्यटन विकास की बात कर डाली और हिन्दी में मैथिली और नेपाली का भाषाओं का गुणगान भी किया.

लगता है भाजपा अपने प्रचार तंत्र को 2019 के चुनावों के मद्देनज़र चुस्त दुरुस्त करने में लग गई है.

मोदी के जुमले

जनकपुर के बारहबीघा मैदान में प्रधानमंत्री मोदी जब बोल रहे थे तो लग रहा था कि वो किसी चुनाव प्रचार सभा को संबोधित कर रहे हों.

अंग्रेजी भाषा के ऐक्रोनिम्स के साथ प्रधानमंत्री मोदी का लगाव बना हुआ है.

पिछली बार उन्होंने नेपाल के सांसदों को 'हिट', यानी 'हाईवेज, आई-वेज और ट्रांसवेज' के नारे के साथ संबोधित किया था.

इस बार जनसमुदाय के हाथ में 'फाईव टी' का झुनझुना पकड़ा गए.

परम्परा, प्रबन्ध और व्यापार, पर्यटन, प्रविधि और परिवहन को 'पाँच प' भी कहा जा सकता था मगर अंग्रेजी के तुक्कों का मजा ही कुछ और है.

तमाशेबाजी की डिप्लोमेटिक ऑप्टिक्स अपनी जगह, नेपाल-भारत सम्बन्ध के विवादग्रस्त कूटनीतिक और आर्थिक मुद्दे ज्यों के त्यों हैं.

अपने सार्वजनिक संबोधनों में प्रधानमंत्री मोदी 'मधेश' शब्द उच्चारण करने से कन्नी काटते रहे.

2015 में संविधान संशोधन के लिए 50 से ज़्यादा मधेशियों ने जान दी थी. उनकी कुर्बानी का ज़िक्र तक ना हुआ.

हाँ, आंसू पोंछने के लिए सौ करोड़ रुपये के सहयोग का वादा ज़रूर प्रधानमंत्री मोदी कर गए.

दशकों से मधेश की जीवनरेखा माने जाने वाली भारतीय सहयोग के हुलाकी राजमार्ग की सुस्त गति देखते हुए नई दिल्ली के वायदों पर नेपालियों का भरोसा परिणाम के बाद ही पुख्ता होगा.

अपीज़मेंट पॉलिसी की कूटनीति

नेपाल के हुक्मरानों को रिझाने की अपीज़मेंट पॉलिसी की भी अपनी सीमाएँ हैं. चीन के सामरिक सरोकार को काठमांडू अनदेखा नहीं कर सकता है.

शीतयुद्ध के समय से ही नेपाल अमरीका के साथ-साथ अन्य पश्चिमी देशों की कूटनीतिक का खेल मैदान रहा है.

प्रधानमंत्री मोदी के चाहने भर से काठमांडू का भारत के प्रति रवैया रातोंरात बदल नहीं सकता है.

भारतीय जनमानस में भले ही 'मोदी नॉट वेलकम' सोशल नेटवर्क के प्रवाह से एकाएक गायब हो गया हो, मगर नेपाल के मध्यम वर्ग में वर्षों से व्याप्त भारत विरोधी जनभावना प्रधानमंत्री मोदी के भजन गाने भर से मिटने वाली नहीं है.

प्रधानमंत्री मोदी की नेपाल यात्रा का उदेश्य हिन्दुत्व की राजनीति को कूटनीतिक रंग देना था जो कि उन्होंने भलिभांति किया.

संविधान संशोधन के मुद्दे को ठंडे बस्ते में रखकर काठमांडू के साथ मिलकर काम करने की सलाह वो मधेशियों को देना चाहते थे.

इस कार्य में उन्हें सिर्फ़ आंशिक सफलता मिली.

पूर्व नक्सलपंथी प्रधानमंत्री ओली

जनकपुर के नागरिक अभिनन्दन समारोह में भी स्वतन्त्र मधेस के नारे लगे और मंच पर से मधेशियों के संघर्ष के इतिहास को याद किया गया.

प्रधानमंत्री मोदी की अपीज़मेंट की कूटनीति की उपलब्धि तो तब देखी जाएगी जब नेपाल के प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद शर्मा ओली अपने प्रस्तावित बीजिंग यात्रा पर कुछ दिनों बाद निकलेंगे.

प्रधानमंत्री मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री ओली की कूटनीतिक ऑप्टिक्स से चकाचौंध करने की क्षमता अगर इक्कीस ना हो तो उन्नीस भी नहीं है.

प्रधानमंत्री मोदी करतल बजाते दिखाई दिए तो उनको प्रभावित करने के लिए पूर्व नक्सलपंथी प्रधानमंत्री ओली ने गेरुआ वस्त्र धारण किया.

और कुछ हो न हो, कूटनीतिक तमाशेबाजी दर्शकों को मनोरंजन भरपूर देती है.

अब भगवान बुद्ध की जन्मभूमि लुम्बिनी को प्रधानमंत्री मोदी के चौथे नेपाल तीर्थयात्रा की प्रतीक्षा रहेगी जिसका ज़िक्र अपने संभाषणों में करना वो कभी नहीं भूलते.

जहाँ तक आम लोगों के रोटी, बेटी और रोजीरोटी के सम्बन्धों का सवाल है, वह तो सदियों से चलता आ रहा है और चलता ही रहेगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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