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नज़रिया: प्रधानमंत्री कर्नाटक का आखिरी चुनाव प्रचार नेपाल से करेंगे!
- Author, अनिल चमड़िया
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
12 मई को जिस समय कर्नाटक में मतदान हो रहा होगा उस वक्त कर्नाटक के मतदाताओं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेपाल के हिंदू मंदिरों में दर्शन करने की खबरें मीडिया में प्रमुखता से मिलेगी.
प्रधानमंत्री की 11 मई की नेपाल यात्रा के बारे में नेपाल के गृह मंत्री राम बहादुर थापा ने ये स्पष्ट किया है कि नरेंद्र मोदी अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक यात्रा पर आ रहे हैं.
भारत के चुनाव आयोग द्वारा देश के किसी भी हिस्से में राजनीतिक पार्टियों को मतदान से दो दिन पहले ही चुनाव प्रचार बंद करने का नियम बना हुआ है.
लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव आयोग के इस प्रावधान को निष्प्रभावी करने के लिए अपना एक अलग चुनाव प्रचार मॉडल बनाया है.
साल 2014 में संपन्न चुनाव के वक्त से ही कई चुनावों के दौरान यह देखा गया है.
मतदान से पहले प्रधानमंत्री के भाषण
7 अप्रैल, 2014 को असम और त्रिपुरा की 6 लोकसभा सीटों पर मतदान शुरू हो चुके थे और टेलीवीजन के समाचार चैनलों द्वारा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के घोषणापत्र जारी करने के समारोह का सीधा प्रसारण किया जा रहा था.
टीवी चैनलों पर लाइव प्रसारण के साथ घोषणापत्र की मुख्य बातों और वादों को ब्रेकिंग न्यूज के दौरान भी दिखाया जाता रहा.
मुरली मनोहर जोशी ने घोषणापत्र पर विस्तार से जानकारी देने के दौरान उत्तर-पूर्व राज्यों के बारे में अपने वादों को भी बताया.
10 अप्रैल 2014 को दिल्ली की सभी सात संसदीय क्षेत्र में मतदाता वोट दे रहे थे.
'मोदीमय और कमलमय'
तब जनसत्ता के रिपोर्टर प्रियरंजन लिखते हैं, "विज्ञापन की आड़ में आचार संहिता का घड़ल्ले से उल्लंधन. कई बूथों पर मतदाताओं को सहयोग करने के लिए टेबल पर कुर्सी लगाए कार्यकर्ताओं में अखबार पढ़ने की मानो होड़ सी दिखी. हद तो तब होती दिखी जिसे देखो पहला पन्ना खोले दिखता था. दरअसल चुनाव आयोग की चुनाव चिह्न के प्रदर्शन की मनाही के नहले पर अखबार के बहाने दहला था."
"क्योंकि गुरूवार को दिल्ली से निकलने वाले अमूमन सभी अखबारों का पहला पन्ना 'मोदीमय और कमलमय' (मोदीमय का अर्थ नरेंद्र मोदी की तस्वारें और कमलमय का अर्थ भाजपा का चुनाव चिह्न) था. टोपी-बैनर-पर्चों पर चुनाव चिह्न को रोका जा सकता था लेकिन अख़बार पढ़ने-दिखाने पर पाबंदी कैसे लगे? सो खूब दिखा 'कमल.' कई झुग्गी बस्तियों के केंद्र के पास भी कार्यकर्ता अंग्रेजी अख़बारों को भी घंटो निहारते दिखे. गौरतलब है कि 10 अप्रैल को देश के कुल 92 संसदीय क्षेत्रों में मत डाले गए."
चुनाव आयोग को लगानी पड़ी रोक
मतदान के वक्त समाचार पत्रों में भारतीय जनता पार्टी के पूरे पन्ने के सुनहले विज्ञापनों को प्रकाशित करवाने की इस रणनीति की शिकायत जब चुनाव आयोग को लगातार मिली तब 4 मई 2018 को चुनाव आयोग ने इस तरह के विज्ञापनों पर पाबंदी के निर्देश जारी किए हैं.
चुनाव आयोग ने राजनीतिक पार्टियों के अध्यक्षों को निर्देश दिया है कि मतदान की पूर्वसंध्या पर चुनाव प्रचार के इरादे से विज्ञापन नहीं जारी किए जा सकते हैं.
इस तरह विज्ञापनों का प्रकाशन पूरी चुनाव प्रक्रिया को दूषित कर देते हैं.
चुनाव आयोग तब चुनाव प्रक्रिया को दूषित करने की कोशिशों के बारे में फैसला करता है जब उसे उसके संबंध में शिकायतें मिलती है.
बीजेपी ने निकाला ये जुगाड़
कर्नाटक विधानसभा चुनाव के मद्देनजर 11 और 12 मई को समाचार पत्रों में चुनाव प्रचार के इरादे से विज्ञापनों के प्रकाशन पर चुनाव आयोग ने रोक तो लगा दी है लेकिन चुनाव प्रचार को दूषित करने के हर 'इरादों' को नाकाम करने वाले प्रावधान चुनाव आयोग के पास मौजूद नहीं हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेपाल के दौरान हिंदू मंदिरों के दर्शन करने को मीडिया अपने लिए खबर मानता है लेकिन इसके पीछे मतदान के वक्त चुनाव प्रचार का इरादा है इसे रोकने के लिए चुनाव आयोग के पास कोई प्रावधान नहीं है.
नरेंद्र मोदी का हिंदू पौराणिक ग्रंथ रामायण के मर्यादा पुरुषोत्तम राम की पत्नी सीता के जन्म स्थान जनकपुर जाने का कार्यक्रम है.
नेपाल के गृह मंत्री के बयान के अनुसार जनकपुर के बाद मोदी अन्य धार्मिक स्थलों मुक्तिनाथ मंदिर और पशुपति नाथ मंदिर भी जाएंगे.
अलग तरह का प्रचार, अलग रणनीति
बता दें कि कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी पर हिंदुत्व के पहलू को लेकर आक्रमक प्रचार करने के आरोप लग रहे हैं.
उत्तर प्रदेश विधानसभा के पिछले चुनाव में 8 मार्च, 2017 के आखिरी दौर के मतदान के वक्त भी प्रधानमंत्री गुजरात में सोमनाथ मंदिर के दर्शन के लिए पहुंचे थे.
प्रधानमंत्री के देश के किसी हिस्से में मतदान के आसपास मंदिरों की यात्राओं का एक रोचक अध्ययन किया जा सकता है.
भारतीय जनता पार्टी मतदान के वक्त मतदाताओं को प्रभावित करने की प्रचारात्मक रणनीति का अध्ययन करने से लगता है कि यह पार्टी प्रचार के लिए कई स्तरों पर रणनीति बनाती है.
मसलन 17 अप्रैल, 2014 को लोकसभा के लिए मतदान के छठवें दौर में सबसे ज़्यादा 122 संसदीय क्षेत्रों में मतदान से दो दिन पहले पूर्व एक प्रतिष्ठित चैनल ने एक ओपनियन पोल के नतीजों को जारी किया.
दूसरे दिन भारत में कई अग्रणी समाचार पत्रों ने हेड लाइन छापी कि पहली बार किसी ओपिनियन पोल ने भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन एनडीए को लोकसभा के चुनाव में बहुमत दिया गया है.
जब पीएम मोदी ने भरा अपना नामांकन
सर्वे के नतीजे के अनुसार 543 सीटों में एनडीए को 275 सीटें मिलेगी. अकेले भाजपा को 226 सीटें मिलेगी.
तब चुनाव आयोग ने 14 अप्रैल को टीवी चैनल द्वारा प्रसारित ओपिनियन पोल के बारे में कहा था कि उसमें उन 111 लोकसभा क्षेत्रों के संभावित नतीजे शामिल थे जहां मतदान हुआ और एक तरह से उक्त निर्वाचन क्षेत्रों के संदर्भ में एग्जिट पोल के नतीजे का प्रसार करता है. यह जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 126 का उल्लंघन है.
एक दूसरे तरह की प्रचारात्मक रणनीति तब देखने को मिली थी जब 24 अप्रैल को 117 संसदीय क्षेत्रों में मत डाले जा रहे थे और उसी दिन नरेंद्र मोदी ने वाराणसी से अपना नामांकन दाखिल करने की योजना बना रखी थी.
भाजपा के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के नामांकन के समारोह की भव्यता को दिन भर टीवी चैनलों ने प्रसारित किया.
दुनिया भर में शायद ही किसी एक उम्मीदवार के नामांकन पत्र दाखिल करने के कार्यक्रम को प्रसारित करने के लिए इतना समय दिया गया है.
ऐसा लगता है कि मतदान के वक्त मंदिरों में जाने के कार्यक्रम चुनाव क्षेत्रों की ज़रूरतों के हिसाब से तय किए जाते हैं. कर्नाटक में चुनाव प्रचार के केंद्र में सांप्रदायिकता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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