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भाजपा और जेडीएस के चक्रव्यूह को तोड़ पाएँगे सिद्धारमैया
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी के लिए
भारतीय जनता पार्टी और जनता दल सेकुलर ने कांग्रेस के दिग्गज और मौजूदा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से लड़ने के लिए कमर कस ली है. ये तैयारी है उन दो विधानसभा सीटों पर लड़ने की जहां से 12 मई के चुनावों में सिद्धारमैया खड़े हो रहे हैं.
बिल्कुल आखिरी वक्त में भाजपा ने अपने नए दलित चेहरे सांसद बी श्रीमुलू को नामांकन के आखिरी दिन बादामी विधानसभा क्षेत्र से पर्चा भरवाया. सिद्धारमैया भी बादामी से चुनाव लड़ रहे हैं और कांग्रेस हाई कमान को भी लगता है कि इसका प्रभाव उत्तर कर्नाटक के बाकी ज़िलों पर भी पड़ेगा.
दक्षिण कर्नाटक के विधानसभा क्षेत्र चामुंडेश्वरी में सिद्धारमैया को पिछले 12 दिन ख़ासी मेहनत करनी पड़ी क्योंकि जनता दल सेकुलर के एचडी देवेगौड़ा, उनके बेटे और पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने उनके ख़िलाफ़ जमकर प्रचार किया.
सिद्धारमैया ने ख़ुद अपने विधानसभा क्षेत्र वरूणा से निकलने का फ़ैसला किया क्योंकि देवेगौड़ा और कुमारस्वामी ने उन्हें चामुंडेश्वरी से लड़ने और जीतकर दिखाने की चुनौती दी है. चुनौती छोटी नहीं है क्योंकि वहां के तक़रीबन 2 लाख मतदाताओं में से 70 हज़ार मतदाता अगड़ी जाति वोक्कालिगा से हैं जिन्हें प्रतिनिधित्व देने का दावा जनता दल सेकुलर कर रही है.
एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने नाम ना लेने की शर्त पर बीबीसी को बताया, "हम सिद्धारमैया को ज़्यादा से ज़्यादा वक्त बादामी में बिताने के लिए मजबूर कर देंगे ताकि वो राज्य में कहीं और प्रचार ना कर पाएं."
जातियों के समीकरण
श्रीमुलू को बादामी से उतारने का फ़ैसला भी भाजपा ने इसलिए लिया क्योंकि वह वाल्मीकि समाज से आते हैं जिनकी संख्या इस विधानसभा क्षेत्र में अच्छी-ख़ासी है. लेकिन ये संख्या इतनी भी नहीं है जितनी लिंगायत या कुरूबा या चरवाहा समुदाय की है जिससे सिद्धारमैया आते हैं.
बीजेपी को अच्छी तरह पता था कि श्रीमुलू चित्रदुर्ग ज़िले की मोलकलमुरू क्षेत्र में मज़बूत दावेदारी पेश कर पाएंगे जहां से उन्होंने पहले नामांकन का पर्चा भरा था. बादामी से उन्हें उतारकर पार्टी वाल्मीकि समाज को ये संदेश देना चाहती है कि पार्टी उनके समाज के नेता को आगे बढ़ा रही है.
पार्टी का मानना है कि लिंगायत, वाल्मीकि और अन्य छोटी जातियों के जोड़ से बादामी में सिद्धारमैया के पसीने छूट जाएंगे. कांग्रेस ने बादामी इसलिए चुना क्योंकि वहां कुरूबा या चरवाहा समुदाय के लोगों की संख्या काफ़ी है और सिद्धारमैया इसी समुदाय से आते हैं. माना जा रहा है कि कुरूबा के साथ दूसरी पिछड़ी जातियों और मुसलमान वोटों के जोड़ से कांग्रेस को फ़ायदा होगा.
कर्नाटक के राजनीतिक जानकार टीवी शिवनंदन का कहना है,"ये साफ़ है कि श्रीमुलू को मुक़ाबले में लाकर भाजपा सिद्धारमैया को बादामी में बांध देना चाहती है. सिद्धारमैया कांग्रेस के स्टार प्रचारक हैं और भाजपा उनका काउंटर नहीं खोज पा रही. इसलिए किसी स्थानीय उम्मीदवार की बजाय भाजपा ने श्रीमुलू को उतारा है."
लेकिन सिद्धारमैया के बादामी से भी चुनाव लड़ने के फ़ैसले को लेकर भाजपा ने काफ़ी आलोचना की है.
इन आलोचनाओं का जवाब सिद्धारमैया देते हैं, "क्या प्रधानमंत्री ने गुजरात और वाराणसी दोनों जगहों से लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा था? क्या कुमारस्वामी खुद दो क्षेत्रों से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं (चन्नपटना और रामनगरम)? क्या देवेगौड़ा नहीं लड़ रहे हैं? मैं यहां से चुनाव में खड़ा हो रहा हूं क्योंकि बगलकोट, विजयपुरा, बेलगवी और दूसरे उत्तर कर्नाटक ज़िलों के लोग चाहते हैं कि मैं यहां से लड़ूं. हाईकमान भी ऐसा ही चाहती हैं."
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