ब्लॉग: 'भारत-पाक पड़ोसी धर्म भूले, दिल के सुराख़ अल्लाह भरोसे'

    • Author, मोहम्मद हनीफ़
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, पाकिस्तान से

दिल्ली के घर में रात के तीन बजे घंटी बजती है. घर वाले दरवाज़ा खोलते हैं, बाहर न कोई बंदा न बंदे की ज़ात.

घर दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायोग के एक अफसर का है और घंटी बजाने वाला वो जवान है जिसे भारत सरकार ने पाकिस्तान और पाकिस्तानियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी दी है.

इधर, इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग अपने मुलाज़िमों के लिए नया घर बना रहा है, वहां मज़दूर काम करने जाते है जिन्हें हमारे जवान पीट डालते हैं.

ये वो जवान हैं जिन्हें पाकिस्तान सरकार ने ज़िम्मेदारी दी है कि किसी भारतीय को इस्लामाबाद में चैन से रहने नहीं देना है.

भारतीय उच्चायोग वाले घर से दूध-दही लेने घर से निकलते हैं तो पाकिस्तानी जासूस उनकी गाड़ी के आगे-पीछे गाड़ियां लगा देते हैं.

भारत और पाकिस्तान बच्चे नहीं हैं...

दूसरी तरफ़, दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायोग वाले अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने जाते हैं तो उनकी गाड़ी को घेर लिया जाता है और उनके बच्चों की तस्वीरें खींची जाती हैं.

ये हमारे रक्षक एक-दूसरे के उच्चायुक्तों के साथ क्या कर रहे हैं? आप भी बचपन में कभी किसी पड़ोसी के घर की घंटी बजा कर भागे होंगे.

हो सकता है कि आप ने बचपन में किसी की बेरी पर पत्थर मारा हो. यह छोटी-छोटी शरारतें सारे बच्चे करते हैं, लेकिन भारत और पाकिस्तान कोई बच्चे नहीं हैं.

सत्तर साल के हो चुके हैं. कई जंगें लड़ चुके हैं. एक जंग लगातार मीडिया पर और एलओसी (लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल) पर लगी रहती है.

सरहदों पर बिजली वाली ट्रेन बिछा रखी है. अगर कोई भाईचारे की बात करे तो उसे घर से ही गालियां पड़ने लगती हैं.

भारत में बढ़िया और सस्ता इलाज

अब तो भारत-पाकिस्तान दोस्ती की बात करने वाले लोग भी कम ही रह गए हैं. पहले तो फ़नकारों को वीज़ा मिल जाता था, लेकिन अब वो भी बंद है.

फ़नकारों की तो बात ही छोड़ दीजिए, मेरी एक दोस्त अपने छह साल के बच्चे को उसके बाप से मिलवाने भारत जाया करती थी. उन्हें भी वीज़ा नहीं मिला.

उसके साथ बदज़ुबानी भी की गई कि इसे पैदा करने से पहले सोचना चाहिए था. सुना है, भारत में इलाज बढ़िया और सस्ता हो जाता है.

कभी-कभी ट्विटर पर देखते हैं, किसी को ख़ून का कैंसर और किसी बच्चे के दिल में सुराख़ है. ये लोग भारत की विदेश मंत्री से मिन्नत करते हैं.

अगर उनका मिज़ाज ठीक हो तो मेहरबानी करते हुए वीज़ा दे देती हैं. अगर ना दे तो आम नागरिक उनका क्या कर सकता है.

दुश्मनी पक्की है...

मैंने एक बार दिल्ली से वापस आते समय पाकिस्तानी मरीज़ों का भरा हुआ जहाज़ देखा था. सभी इलाज करवाने के लिए भारत गए थे.

रातों-रात भारत-पाकिस्तान सरहद पर तनाव पैदा हो गया. वीज़ा रद्द होने लगे और सभी मरीज़ तुरंत वापस भागे. कई मरीज़ो ने अस्पताल वाले कपड़े पहन रखे थे.

एक मरीज़ की बांह में ड्रिप लगी हुई थी. भारत-पाकिस्तान की दुश्मनी पक्की है. हमारा कोई भाईचारा नहीं है. कम से कम हम इंसान की औलाद तो बन सकते हैं.

कम से कम अपने बच्चों को अपनी दुश्मनी की ज़हर के टीके तो ना लगाएं. कई साल पहले मुझे लंदन में एक भारतीय जवान मिला.

मेरे हाथ में गोल्डलीफ़ की डब्बी देखकर मेरे पास आया और बोला, 'पाकिस्तानी लगते हो. सिगरट तो पिलाओ.' मैंने पूछा, 'हाँ जवान! कभी गए हो पाकिस्तान?'

इस्लामाबाद बहुत अच्छा शहर है...

उसने जवाब दिया, 'मैं आठवीं जमात में था, मेरी माँ इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग में काम करती थी. मैं इस्लामाबाद के एक पार्क में एक दोस्त के साथ खेल रहा था.'

वह आगे बोला, 'आपके जसूसों ने पकड़ लिया और अच्छी तरह पिटाई की. इस्लामाबाद बहुत अच्छा शहर है अभी तक नहीं भूला, पर वह पिटाई भी नहीं भूली.'

भारत-पाकिस्तान एक-दूसरे का जो भी बंद कर सकते थे, वह कर चुके हैं. अब यही हो सकता है कि हम अपना आतिफ़ असलम अपने पास रखें.

आप आशा भोंसले की आवाज़ पर पिंजरा बना लें. जिस बच्चे के दिल में सुराख़ है उसे अल्ला के सहारे छोड़ दें. हमें उसकी कोई परवाह नहीं.

ये याद रखना कि सर्दियों में जो काली-ज़हरीली हवा चलती हैं, जिसे हम फ़ॉग कहते हैं, वो ये नहीं पूछती कि ये भारतीय पंजाब है या पाकिस्तानी.

रब्ब राखा

जब भूचाल आएगा तो उसे भी वीज़ा के लिए आवेदन नहीं भरना. जब सूखा पड़ेगा या बाढ़ आएगी तब यह भी वाघा सरहद पर कतार में लगकर नहीं आएंगे.

पड़ोसी अच्छा हो या बुरा उसकी ज़रूरत पड़ ही जाती है. यह ना हो कि हम किसी मुसीबत में हों और किसी के घर की घंटी बजाएं और दरवाज़ा खोलने वाला कोई ना हो.

रब्ब राखा.

(यह ब्लॉग मोहम्मद हनीफ के बीबीसी पंजाबी के लिए किए गए वीडियो ब्लॉग से बनाया गया है.)

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