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'भारत-पाकिस्तान को झुलसा न दे अफ़ग़ानिस्तान की आग'
- Author, वात्सल्य राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
तारीख : 21 जनवरी 2018
जगह : अफ़गानिस्तान की राजधानी काबुल का होटल इंटरकॉन्टिनेंटल
होटल से निकलते धुएं ने पूरी इमारत को ढक लिया था. कुछ लोग बालकनी में चादर लटकाए नीचे उतर रहे थे.
पूरा दृश्य अजब सा था, लेकिन इस स्टंट की वजह थी मजबूरी.
बंधक बने विदेशी
कुछ घंटे पहले यानी 20 जनवरी की रात नौ बजे के करीब गोलियां चलाते और ग्रेनेड फेंकते, आधा दर्जन हथियारबंद लोग होटल में दाखिल हुए थे.
इनके जिस्म पर सेना की वर्दी थी और कमर पर विस्फोटक बंधे थे. दरवाज़े में दाखिल होने के साथ उन्होंने होटल में रुके विदेशियों के बारे में जानकारी लेना शुरू कर दिया और देखते ही देखते कई लोगों को बंधक बना लिया.
होटल में रुके लोगों ने हमलावरों से बचकर बाहर आने के लिए बालकनी से लटकने समेत हर तरीका और रास्ता अपनाया.
12 घंटे से ज़्यादा वक़्त तक कड़े संघर्ष के बाद सुरक्षाबलों ने जब आखिरी हमलावर को मार गिराया तब तक कम से कम 22 लोगों की मौत हो चुकी थी. इनमें ज्यादातर विदेशी थे.
इस हमले की जिम्मेदारी तालिबान ने ली.
24 जनवरी को एक और हमला हुआ.
राजधानी काबुल से करीब 150 किलोमीटर दूर जलालाबाद में बच्चों को मदद मुहैया कराने वाली संस्था 'सेव द चिल्ड्रन' के दफ़्तर को निशाना बनाया गया.
इस हमले में दो लोगों की मौत हुई और इसकी ज़िम्मेदारी इस्लामिक स्टेट ने ली.
'कोई सुरक्षित नहीं'
तीन दिन बाद यानी बीते शनिवार 27 जनवरी को एंबुलेंस में आए हमलावरों ने काबुल के बेहद सुरक्षित माने जाने वाले इलाके में आत्मघाती धमाका किया. इस इलाके में कई दूतावास हैं.
100 से ज़्यादा लोगों की जान लेने वाले इस हमले की जिम्मेदारी तालिबान ने ली.
इसके दो दिन बाद सोमवार 29 जनवरी को इस्लामिक स्टेट ने काबुल में एक सैन्य ठिकाने को निशाना बनाया. हमले में 11 सैनिक मारे गए.
नौ दिन में हुए चार हमलों के जरिए विदेशी नागरिकों से लेकर मदद के काम में जुटी संस्था, आम लोगों और सैनिकों को निशाना बनाया गया. विश्लेषकों ने इन हमलों से संकेत लिया कि 'अफ़ग़ानिस्तान में कोई सुरक्षित नहीं है'.
अफ़ग़ान इंटेलिजेंस सर्विस के प्रमुख ने आशंका जताई कि ये हमले पाकिस्तान पर बढ़ते अमरीकी दबाव का नतीजा हो सकते हैं.
पाक का डबल गेम या तालिबान का रिएक्शन?
इस साल की शुरुआत में अमरीका ने पाकिस्तान पर 'डबल गेम' का आरोप लगाते हुए उसकी सुरक्षा मदद रोकने का एलान किया था.
लंदन में मौजूद बीबीसी पश्तो सेवा के वरिष्ठ संवाददाता दाऊद आज़मी भी अफ़गानिस्तान में अचानक बढ़े हमलों को अमरीकी नीति का असर मानते हैं, लेकिन वो इसे तालिबान और कथित इस्लामिक स्टेट पर की गई सख्ती के असर के तौर पर देखते हैं.
वो कहते हैं, "जब से राष्ट्रपति ट्रंप ने अफ़गानिस्तान और दक्षिण एशिया के लिए अपनी नई नीति का एलान किया है. उसके बाद से अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान और इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ हवाई हमले बढ़ गए हैं. उन हमलों में बहुत से तालिबानी मारे गए.''
''ये एक किस्म से तालिबान का रिएक्शन भी है. वो दिखाना चाहते हैं कि हवाई हमलों का हम पर इतना असर नहीं हुआ है और हम अब भी इसकी सलाहियत रखते हैं कि काबुल जैसे बड़े शहरों में हमले कर दें."
तालिबान-आईएस ने बदली रणनीति
आज़मी की राय में रणनीति कथित इस्लामिक स्टेट ने भी बदली है.
वो कहते हैं कि अफ़गानिस्तान में सीमित ताकत रखने वाला इस्लामिक स्टेट जब काबुल में अहम ठिकानों को निशाना बनाता है तो पूरी दुनिया का ध्यान खींचता है.
ऐसे हमलों के ज़रिए तालिबान और इस्लामिक स्टेट अफ़ग़ानिस्तान सरकार को कमज़ोर दिखाने की भी कोशिश करते हैं.
अफ़ग़ानिस्तान में तीन साल तक भारत के राजदूत रहे राकेश सूद को भी लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान पुरानी स्थिति में लौट रहा है और राष्ट्रपति अशरफ ग़नी की मौजूदा सरकार पूरी तरह असहाय नज़र आती है.
राकेश सूद कहते हैं, "सरकार कमजोर है. हमले बढ़ रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय समुदाय का धैर्य भी ख़त्म हो रहा है. हालात ऐसे हो गए हैं कि मज़ार ए शरीफ़ में जो गवर्नर हैं उन्हें राष्ट्रपति अशरफ ग़नी ने बर्खास्त कर दिया. लेकिन उन्होंने हटने से इनकार करते हुए कहा कि नया गवर्नर आया तो वो उसे जेल में डाल देंगे."
तालिबान का मददगार कौन?
ये स्थिति तब है जब अफ़ग़ानिस्तान में सैनिकों की संख्या और ख़र्च बढ़ाने के बाद अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ये संकेत देकर अधिकारियों पर दवाब बढ़ा दिया है कि वो शीघ्र नतीजे चाहते हैं.
लेकिन दाऊद आज़मी कहते हैं कि जैसे तालिबान के लिए अफ़गान सरकार को गिराना मुमकिन नहीं, वैसे ही अमरीका और नेटो सेनाओं के लिए तालिबान को पूरी तरह ख़त्म करना अब तक दूर की कौड़ी रहा है.
साल 2001 के बाद तालिबान सबसे बड़े क्षेत्र पर नियंत्रण रखता है. देश के करीब साठ से सत्तर फीसद हिस्से में उनकी मौजूदगी है.
उन्हें पाकिस्तान के अलावा दूसरे देशों से भी मदद मिलने की बात की जाती है. आरोप है कि इनमें ईरान भी शामिल है.
दाऊद आज़मी कहते हैं, " ये शक़ किया जाता है कि ईरान क्योंकि दाएश (आईएस) के ख़िलाफ़ है तो हो सकता है कि वो तालिबान को समर्थन करें. अफ़गानिस्तान के कुछ अधिकारियों ने इशारा किया है कि तालिबान को ईरान से हथियार मिलते हैं. कुछ अधिकारियों ने ये तक कहा है कि ईरान में अफ़ग़ान तालिबान के कुछ ट्रेनिंग कैंप हैं. लेकिन ईरान की सरकार इससे इनकार करती है."
रूस की सोच बदली
विश्लेषकों का दावा है कि हाल के बरसों में तालिबान को लेकर रूस की सोच भी बदल रही है.
राकेश सूद कहते हैं, "रूस की स्थिति में 180 डिग्री का बदलाव आ गया है. रूस पहले तालिबान के विरोध में था. अब रूस ने कहना शुरू किया है कि तालिबान तो अफ़ग़ान ही हैं तालिबान को बातचीत की मेज़ पर लाना ही होगा. सबसे बड़ा ख़तरा तो इस्लामिक स्टेट है.''
''तालिबान को इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ खड़ा करना चाहिए. ये जो रुख है उससे अमरीका बिल्कुल सहमत नहीं है. मैं कहूंगा कि इससे भारत भी सहमत नहीं है. अफ़गानिस्तान में भी बहुत से लोग इसे नहीं मानते हैं".
अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने तो साफ शब्दों में कह दिया है कि वो अभी तालिबान से बातचीत के पक्ष में नहीं हैं.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रतिनिधियों के साथ लंच के दौरान ट्रंप ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि बातचीत हो सकती है. मैं नहीं समझता कि हम अभी बातचीत के लिए तैयार हैं. वहां एक अलग संघर्ष चल रहा है. वो मासूम लोगों की जान ले रहे हैं. अफ़गानिस्तान में बच्चों और परिवारों के बीच बम गिराए जा रहे हैं. इसलिए हम तालिबान से बातचीत करना नहीं चाहते."
अफ़ीम की पैदावार बढ़ी
उधर, ज़मीन पर स्थिति ये है कि अफ़ग़ानिस्तान मुश्किलों के दलदल में फंसता जा रहा है.
जीडीपी घट रही है. बेरोज़गारी बढ़ रही है. संयुक्त राष्ट्र की तीन साल पुरानी रिपोर्ट बताती है कि देश के आधे बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. ये स्थिति अब और ख़राब हुई है.
रूस और ईरान जैसे देश अमरीका को ये कहते हुए कठघरे में खड़ा करते रहे हैं कि वो चरमपंथ और ड्रग्स से मुक्ति के उद्देश्यों को पूरा करने में नाकाम रहा है.
राकेश सूद चरमपंथ और ड्रग्स के कारोबार को एक-दूसरे से जुड़ी हुई समस्या बताते हैं.
वो कहते हैं, "चरमपंथ की वजह से ये हुआ है कि वहां अफ़ीम की पैदावाद बढ़ गई है. अगर किसान को फलों की पैदावार की कीमत नहीं मिलेगी और दूसरी तरफ तालिबान आकर कहेगा कि तुम अफ़ीम उगाओ मैं दोगुना पैसा दूंगा तो वो मजबूर होकर क्या करेगा."
शांति और विकास की चाहत
तमाम मजबूरियों के बीच घिरे और हर दिन नई चोट झेलने के बाद भी अफ़ग़ानिस्तान ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है. राकेश सूद बताते हैं कि वो अफ़ग़ानिस्तान में जहां भी गए लोगों ने उनसे कहा कि वो शांति और विकास चाहते हैं.
कई अहम सभ्यताओं से रूबरू हुए अफ़ग़ानिस्तान में ज़िंदगी को दोबारा मुस्कुराते देखने की ख्वाहिश बाकी है.
राकेश सूद बताते हैं, "साल 2005 में जब हमने दिल्ली और काबुल के बीच एयर इंडिया की सीधी उड़ान शुरू की तो पहली फ्लाइट में हिंदुस्तान के मशहूर कव्वाल निजामी ब्रदर्स का ट्रूप वहां आया. उन्होंने कार्यक्रम पेश किया. कार्यक्रम ख़त्म हुआ तो मैं वहां ऑडिटोरियम के दरवाजे पर खड़ा था. लोगों ने मुझे गले लगाया, धन्यवाद दिया और कहा कि हम कभी सोच नहीं सकते थे कि ये संगीत हम कभी दोबारा सुनेंगे."
कैसे बदलेंगे हालात?
अफ़ग़ानिस्तान में अब संगीत के सुरों से ज़्यादा धमाके सुनाई देते हैं. लेकिन क्या हालात बदल सकते हैं?
इस सवाल पर दाऊद आज़मी कहते हैं, "अफ़ग़ानिस्तान में अमन लाना है तो ये क्षेत्रीय सहयोग से ही होगा. पाकिस्तान, भारत, रूस, चीन और ईरान अगर मिलकर बैठ जाएं और इस पर सहमत हो जाएं कि हम एक एजेंडे पर ही बात करेंगे कि अफ़ग़ानिस्तान में अमन आ जाए. लेकिन जब तक प्रॉक्सी पॉलिटिक्स जारी रहेगी तब तक न अफ़ग़ानिस्तान में अमन आएगा और न ही क्षेत्र सुरक्षित हो पाएगा."
वहीं राकेश सूद की राय है कि सिर्फ़ सरकार या सेना अफ़ग़ानिस्तान में बदलाव नहीं ला सकती है.
वो कहते हैं, "वहां बदलाव 1973 से जारी है. पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई हमेशा ये कहते थे कि हमारी एक पूरी पीढ़ी इस जंग में मारी गई है. ये अफ़ग़ानिस्तान के लोगों के ऊपर निर्भर करता है कि अगर वो तालिबान को निकालना चाहेंगे तो जरूर निकाल पाएंगे. इसमें कोई शक़ नहीं है. अगर वो इस्लामिक स्टेट को निकालना चाहेंगे तो जरूर निकाल पाएंगे".
सूद ये भी कहते हैं कि अगर अफ़ग़ानिस्तान आग का ये दरिया पार नहीं कर पाया तो असर सब पर पड़ेगा.
पाकिस्तान पर. मध्य एशिया और ईरान पर. रुस और अमरीका पर और भारत पर भी.
लेकिन सवाल ये भी है कि क्या ये तमाम मुल्क अफ़ग़ानिस्तान में धधक रही हिंसा की आग बुझाने की कोशिश करेंगे और इसके लिए क्या कभी एक मंच पर आएंगे?
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