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पाकिस्तान: मशाल हत्याकांड में एक को फांसी, पांच को उम्रक़ैद
- Author, शुमाइला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तान के बहुचर्चित मशाल ख़ान हत्याकांड में आतंकवाद निरोधी अदालत ने एक शख़्स को फांसी और पांच को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई है.
जस्टिस फ़ज़ल-ए-सुभान ख़ान ने यह फ़ैसला बुधवार को हरिपुर सेंट्रल जेल में सुनाया. सुरक्षा कारणों के चलते इस मामले की सुनवाई जेल में की जा रही थी.
इन छह लोगों के अलावा 25 और लोगों को चार-चार साल की सज़ा दी गई है. वहीं 26 लोगों को अदालत ने बरी कर दिया है.
सरकार ने कहा है कि वह उम्रक़ैद पाए लोगों को और कड़ी सज़ा दिलाने के लिए याचिका दायर करेगी. साथ ही बरी किए लोगों के ख़िलाफ़ भी अपील करेगी.
मशाल की हत्या की यह घटना ख़ैबर पख़्तूनख्वाह सूबे की है.
13 अप्रैल 2017 को शहर मर्दान की अब्दुल वली ख़ां यूनिवर्सिटी में कुछ छात्रों ने ईशनिंदा के इल्ज़ाम में मशाल ख़ान की हत्या कर दी थी.
इस मामले में 61 लोगों को नामजद किया गया था जिनमें से 58 की गिरफ़्तारी हुई थी. इनमें छात्रों के अलावा यूनिवर्सिटी के कर्मचारी भी शामिल थे.
फांसी की सज़ा पाने वाले अभियुक्त का नाम इमरान अली है. उसने मशाल को गोली मारने का जुर्म क़ुबूल कर लिया था.
वहीं बिलाल बख़्श, फ़ज़ल राज़िक़, मुजीबुल्लाह, अशफ़ाक़ ख़ान और मुदस्सिर बशीर को उम्रक़ैद दी गई. इन सभी को डेढ़ लाख रुपये जुर्माना भी देना होगा.
कौन थे मशाल ख़ान?
मशाल खान 26 मार्च 1992 को ज़िला स्वाबी के गांव ज़ैदा में पैदा हुए थे. वो चार भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थे.
मशाल पत्रकारिता पढ़ रहे थे. 23 साल के मशाल रूस से इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़कर पत्रकारिता पढ़ने आए थे.
घटना के दिन मशाल को सैकड़ों छात्र और यूनवर्सिटी कर्मचारियों की भीड़ घसीटकर हॉस्टल से बाहर लाई और पीटने लगी. बाद में उन्हें गोली मार दी गई.
इसके बाद यूनिवर्सिटी के छात्र कई घंटों तक उनकी लाश के साथ बुरा सुलूक करते रहे. मशाल के घर वालों को उनका शव देर रात जाकर मिला.
अदालत के बाहर मौजूद थे मशाल के भाई
किसी ने इस घटना का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया जो तुरंत वायरल भी हो गया.
जिसके बाद पाकिस्तान में ईशनिंदा को लेकर बहस छिड़ गई. हालांकि इस पर अब तक कुछ किया नहीं गया है.
फ़ैसला सुनाए जाने के वक़्त मशाल के भाई ऐमल ख़ान अदालत के बाहर मौजूद थे. उन्होंने कहा कि वो चाहते हैं कि किसी को ऐसा दर्द न झेलना पड़े जो उनके परिवार ने झेला.
"हम अपने वक़ील से बात करेंगे कि यह फ़ैसला संतोषजनक है या नहीं. मेरी पुलिस से दरख़्वास्त है कि वो बाक़ी संदिग्ध लोगों को भी गिरफ़्तार करे."
'यारों का यार था मशाल ख़ान'
उनकी मौत के बाद यूनिवर्सिटी के एक अधिकारी ने बीबीसी को बताया था कि "मशाल ख़ान यूनिवर्सिटी में किसी पहचान का मोहताज नहीं था. पढ़ाई में टॉपर होने की वजह से सभी उसे जानते थे. साथ ही अपनी इंक़लाबी सोच की वजह से भी लोगों में जाना जाता था. 12,000 से ज़्यादा लोगों वाली इस यूनिवर्सिटी में कैंटीन स्टाफ़ को सब से ज़्यादा टिप मशाल ख़ान दिया करता था."
मिर्ज़ा ग़ालिब को पढ़ने वाले मशाल ख़ान पश्तो शायरी में अजमल खटक और रहमान बाबा को भी पढ़ा करते थे.
उनकी मां गुलज़ार बीबी ने अपने बेटे की ख़ूबसूरती और प्रतिभा को याद करते हुए बीबीसी से कहा था कि, "मशाल बचपन से ही ख़ूबसूरत और ज़ेहनी था. वो सुनकर भी सबक याद कर लेता था. लड़ाई नहीं करता था. उसे देखकर लगता कि ख़ुदा ने उसके शरीर का हर नक्श ग़ौर से बनाया हो. आंखे, नाक, होंठ, हाथ-पैर सब. यूनिवर्सिटी के जालिमों ने सब मिटा दिया, बर्बाद कर दिया. उसके इल्म से भरे दिमाग़ को कुचल डाला. किस बात की सज़ा दी? पख्तून क़ौम ने अपने ही बेटे को बुरी तरह मार डाला."
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