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चीन का नया विस्तार, रूस भी आया उसके साथ
चीनी सरकार ने शुक्रवार को अपनी आगामी योजना 'पोलर सिल्क रोड' की घोषणा की है.
चीन की यह महत्वाकांक्षी योजना उत्तरी ध्रुव के आसपास एक समुद्री मार्ग तैयार करने की है जिससे व्यापार किया जा सके.
यह परियोजना चीन के सिल्क रोड और वन बेल्ट वन रोड का ही हिस्सा है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2013 में इस योजना का ज़िक्र किया था.
चीन अगर ऐसा करने में कामयाब होता है तो उत्तरी अमरीका, पूर्वी एशिया और पश्चिमी यूरोप के तीन बड़े आर्थिक ध्रुवों को जोड़ने में सफल होगा.
कहा जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन के कारण चीन की इस योजना को बल मिला है.
चीन की नीति
चीन चाहता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अंतरराष्ट्रीय व्यापार को और सुगम बनाए.
चीनी सरकार के अनुसार इस रूट के अस्तित्व में आने से मुख्य व्यापारिक साझीदारों के साथ व्यापार में समय और लागत की बचत होगी.
शुक्रवार को जो दस्तावेज प्रकाशित किया गया है उसका शीर्षक है- 'आर्कटिक के लिए चीन की नीति.'
इस दुर्गम सागर के लिए किसी भी एशियाई देश ने पहली बार समुद्री मार्ग की राह प्रशस्त करने के लिए अपना इरादा ज़ाहिर किया है.
यह भले ही दुर्गम महासागर है, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है. आख़िर इस नए मार्ग को लेकर चीन इतना उतावला क्यों है और इससे उसे क्या फ़ायदा होगा?
उत्तरी समुद्रीय मार्ग
चीनी सरकार के दस्तावेज के अनुसार वो अपनी कंपनियों को आधारभूत ढांचा विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करेगा.
इसके साथ ही वो व्यावसायिक आवागमन के ज़रिए चीज़ों का जायजा लेगा.
इसके बाद चीन भविष्य के लिए उत्तरी ध्रुव तक एक समुद्री व्यापार मार्ग की राह को प्रशस्त करेगा.
हाल के वर्षों में चीन नए अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों और बंदरगाहों को लेकर भी काफ़ी सक्रिय हुआ है.
चीन चाहता है कि वो व्यापार के लिए कम वक़्त और कम दूरी वाले नए मार्गों को साधे न कि पुराने और ज़्यादा समय लेने वाले मार्गों पर ही निर्भर रहे.
'पोलर सिल्क रूट'
चीन पनामा रूट्स से अपनी निर्भरता कम करना चाहता है.
एक अनुमान के अनुसार अगर इस रूट का निर्माण चीन कर लेता है तो पनामा चैनल के रास्ते रोट्रेडम से चीन आने में अभी जितना वक़्त लगता है उससे 20 से 48 दिन कम समय लगेंगे.
चीन की सूचना परिषद द्वारा प्रकाशित किए गए दस्तावेज के अनुसार उसे उम्मीद है कि 'पोलर सिल्क रूट' में सभी संबंधित पार्टी साथ देंगे.
इस दस्तावेज के अनुसार सभी देशों को इस समुद्री मार्ग का इस्तेमाल करने का हक़ होगा.
चीन का कहना है कि इससे पर्यावरण की रक्षा में रणनीतिक मदद मिलेगी. इस दस्तावेज के मुताबिक चीन और आर्कटिक देशों के साझे हित हैं.
चीन का बढ़ता विस्तार
हक़ीक़त यह है कि इस महासागर में चीन का कोई समुद्री तट नहीं है. यहां रूस, अमरीका, कनाडा, आइसलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, फ़ीनलैंड और डेनामार्क जैसे देशों की मौजूदगी है.
इन देशों के बीच अपने-अपने हितों को लेकर विवाद भी है. हालांकि 2013 से चीन आर्कटिक काउंसिल में पर्यवेक्षक सदस्य के तौर पर काम कर रहा है.
यह काउंसिल कई देशों का समूह है जो वहां के मूल लोगों और देशों के बीच की आने वाली समस्याओं पर काम करता है.
2013 के बाद से चीन शक के दायरे में है. कहा जाता है कि चीन इस इलाक़े की प्राकृतिक गैस और तेल पर नियंत्रण की होड़ में शामिल होने की मंशा रखता है.
यहां 16 से 26 फ़ीसदी ऐसी भूमि है जो संरक्षित है, जहां भरपूर खनिज़ संपदा होने की संभावना है.
आइसबर्ग परियोजना
हालांकि चीनी सरकार ने इन आरोपों और संदेहों को सिरे से ख़ारिज करती रही है.
हालांकि, 'आर्कटिक के लिए चीन की नीति' दस्तावेज में इस बात को रेखांकित किया गया है कि वो तेल, गैस, खनिज पदार्थ, मछ्ली और अन्य संसाधनों को साधने की इच्छा रखता है, लेकिन उसका कहना है कि वो ये सब आर्कटिक देशों के साथ और उनके सहयोग के ज़रिए ही करेगा.
ऐसा नहीं है कि चीन पहला देश है जो आर्कटिक में अपनी दिलचस्पी दिखा रहा है.
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने आर्कटिक में दिसंबर महीने में एक प्लांट का उद्घाटन किया था, जिससे स्पेन से दूर देशों में गैस का निर्यात किया जाएगा.
पिछले साल के आख़िर में रूसी सरकार ने आइसबर्ग परियोजना का उद्घाटन किया था.
रूसी सिल्क रोड
रूस इसके ज़रिए आर्कटिक महासागर में एक हाइड्रोकार्बन फील्ड विकसित करना चाहता है. यह पानी और बर्फ़ के बीच होगा जो कि पूरी तरह से स्वायत्त रहेगा.
यहां तक कि चीनी मीडिया और रूसी सरकार समर्थक डिजिटल अख़बार स्पूतनिक का कहना है कि चीन का पोलर सिल्क रोड आइडिया मूल रूप से रूस का है और दोनों देश इस पर महीनों पहले से काम कर रहे हैं.
पिछले साल मई महीने में चीनी विदेश मंत्री वांग यी रूस गए थे. इस दौरे में उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार रूसी सिल्क रोड का समर्थन करती है.
सिल्क रोड बेल्ट और रूट इनिशिएटिव आर्कटिक रूट परियोजना का ही हिस्सा है. यह यूरोप और एशिया के बीच पुराने गुड्स कैरवैन से प्रेरित है.
चीनी सरकर के अनुसार इसमें यूरोप और एशिया को जोड़ने की बात है.
इस परियोजना के तहत 70 देशों के बीच आधारभूत ढांचा का निर्माण करना है जिनमें सड़क और समुद्री मार्ग दोनों शामिल हैं.
मध्य-पूर्व और अफ़्रीका
वहीं दूसरी तरफ़ चीन चाइना-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर पर भी काम कर रहा है. इसका उद्देश्य चीन के पश्चिमी क्षेत्रों को अरब सागर और हिन्द महासागर से जोड़ना है.
इसके ज़रिए चीन मध्य-पूर्व और अफ़्रीका में अपना प्रभाव जमा पाएगा.
अभी चीन मालगाड़ी की 20 रेलवे लाइन का संचालन कर रहा है जिसके ज़रिए लंदन, मैड्रिड, रोटेड्रम या वर्सावा जैसे यूरोपीय शहर संपर्क में हैं.
चीन की अगली योजना चीनी शहर कनमिंग को दक्षिण के देशों वियतनाम, लाओस और म्यांमार के रेलवे नेटवर्क से जोड़ने की है.
अगर चीन इन लाइनों को पूरा कर लेता है वो थाइलैंड, कंबोडिया या वियतनाम को बाक़ी दक्षिणपूर्व एशिया से जोड़ने की परियोजना पर काम शुरू करेगा.
चीन कीनिया में भी रेलवे लाइन बनाने का काम कर रहा है.
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