अपने मक़सद में कामयाब होंगे सऊदी क्राउन प्रिंस?

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- Author, शाहिर शाहिद सालेह
- पदनाम, पत्रकार और विश्लेषक
रियाद के लग्ज़री होटल रिट्ज़ कार्ल्टन में उस वक़्त अजीब हालात पैदा हो गए जब होटल को अचानक जेल बना दिया गया और कई जाने माने लोगों को हिरासत में ले लिया गया.
होटल मैनेजमेंट ने बग़ैर किसी चेतावनी के लोगों के आने-जाने पर रोक लगा दी. बताया गया कि ऐसा अचानक आई किसी बड़ी बुकिंग की वजह से किया गया है.
यह वाक़या इस साल की चार नवंबर का है. होटल में उस वक़्त दर्जनों मेहमान ठहरे थे जिनमें कुछ शहज़ादे, अरबपति और बड़े अधिकारी भी शामिल थे.
उन्हें बताया गया कि जब तक होटल मैनेजमेंट इजाज़त न दे, न कोई होटल में घुस सकता है और न ही कोई बाहर जा सकता है.
वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक़ होटल में बंदी बनाए गए लोगों की कुल संपत्ति 800 अरब डॉलर के क़रीब है.

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क्राउन प्रिंस सलमान के हाथ?
लोगों को हिरासत में लेने से कुछ घंटे पहले ही सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने शाही फ़रमान के आधार पर भ्रष्टाचार रोकने के लिए एक समिति बनाई गई थी जिसके अध्यक्ष वो खुद थे.
जानकारों को लगता है यह क़दम उठाकर मोहम्मद बिन सलमान एक तीर से दो शिकार करना चाहते हैं - भ्रष्टाचार से लड़ाई और विरोधियों का सफ़ाया.
ग़ौरतलब है कि घटते तेल के दामों और यमन की लड़ाई की वजह से सऊदी अरब के पास नकदी बहुत कम हो गई है.
ऐसी ख़बरें हैं कि 1700 बैंक खातों को सील कर दिया गया है जिसमें सलमान के चचेरे भाई मोहम्मद बिन नईफ़ का खाता भी शामिल है. नईफ़ कुछ महीने पहले तक सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस थे.

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सत्ता का केंद्र बनने की कवायद
मोहम्मद बिन सलमान की देखरेख में कई लोगों की ताक़त को कमज़ोर किया जा रहा है. सऊदी नेशनल गार्ड के पूर्व अध्यक्ष और किंग अब्दुल्लाह के बेटे मितेब बिन अब्दुल्लाह ऐसे लोगों में से एक हैं.
सऊदी नेशनल गार्ड कुछ-कुछ ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड की तरह ही काम करता है. एक अनुमान के मुताबिक़ इसमें 75 हज़ार से एक लाख लोग तक शामिल हैं.
मोहम्मद बिन नईफ़ को गृह मंत्रालय से और मितेब बिन अब्दुल्लाह को नेशनल गार्ड से हटा दिया गया है, यह दोनों ज़िम्मेदारियां अब मोहम्मद बिन सलमान ने संभाल ली हैं.
डेली मेल की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि बिन सलमान जल्दी ही अपने पिता की जगह ले सकते हैं. हालांकि इसकी कोई पुष्टि नहीं हो पाई है.

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युवाओं को साथ लाने की कोशिश
बताया जाता है कि अपनी योजनाओं को साक़ार करने के लिए बिन सलमान एक युवा सहयोगी की तलाश कर रहे हैं जिसकी उम्र 30 साल से कम हो. कहा जाता है कि बिन सलमान का सपना आधुनिक राष्ट्र बनाने का है जिसमें लोग ख़ुश रहें और रोज़गार के भरपूर मौके हों.
इसकी एक बानगी तब देखने को मिली जब नेशनल डे के मौक़े पर सऊदी अरब की सड़कों पर संगीत बजाया गया. कुछ साल पहले तक इसकी कल्पना करना भी मुश्किल था.
बिन सलमान का कहना है, "पिछले 30 साल में जो भी हुआ वह सऊदी संस्कृति नहीं है. 1979 में ईरान क्रांति के बाद सऊदी अरब समेत सभी देश इस मॉडल को अपनाना चाहते थे. लेकिन हमें पता नहीं था कि उन हालात में क्या करना चाहिए. अब उस स्थिति से निकलने का समय है. हम और 30 साल चरमपंथी विचारधारा से लड़ने में नहीं बिता सकते. हमारे पास यही रास्ता है कि हम ऐसी सोच को अभी ख़त्म करें."

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अमरीका को रिझाने की कोशिश
बिन सलमान ने महिलाओं से किए वादे के मुताबिक़ उन्हें गाड़ी चलाने और स्टेडियम में घुसने की इजाज़त दी. उनकी देखरेख में धार्मिक पुलिस कमज़ोर हुई और 30 साल बाद सरकारी टीवी पर एक महिला सिंगर का गाना दिखाया गया.
सऊदी अरब को आधुनिक बनाने के पीछे एक मंशा ईरान के ख़िलाफ़ चल रहे संघर्ष में पश्चिमी देशों ख़ासकर अमरीका का समर्थन हासिल करना भी है. अपनी ऐसी पहल से बिन सलमान ये संदेश दे रहे हैं कि उनके देश में धार्मिक चरमपंथ अब ख़ात्मे की तरफ़ बढ़ रहा है.
बिन सलमान के पास आने वाले समय के लिए भी योजनाएं हैं. वो स्टॉक मार्केट में दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी अरामको के शेयर बेचना चाहते हैं. वह 500 अरब डॉलर से बनने वाला बेहद आधुनिक निओम शहर भी बनाएंगे जिसका सारा काम रोबोट संभालेंगे. साथ ही उनका इरादा 2030 तक सऊदी अरब की तेल पर निर्भरता घटाने का भी है.

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क्या सफ़ल होंगे बिन सलमान?
बिन सलमान कहते रहे हैं कि उन्हें युवाओं के समर्थन से बल मिलता है. हालांकि ये साफ़ नहीं है कि सलमान को देश के कितने फ़ीसदी युवाओं का समर्थन हासिल है.
साथ ही यह भी देखना होगा कि धार्मिक संस्थाएं बिन सलमान की योजनाओं पर क्या प्रतिक्रिया देती हैं.
पिछले 70 साल में सऊदी अरब के सभी शहजादों के बीच ज़्यादातर बड़े मसलों पर सहमति रही है लेकिन बिन सलमान का मामला अलग है.
उन्होंने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़कर और सारी ताक़त अपने हाथ में लेकर इस तंत्र को चुनौती दी है. देखना होगा कि वहां के ताक़तवर और पैसे वाले लोग इसे कैसे लेते हैं.

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विदेश नीति के मोर्चे पर बिन सलमान को अभी तक कोई ख़ास सफलता नहीं मिली है. भारी मानवीय संकट के चलते यमन उसके गले की फांस बन गया है, वहीं सीरिया में काफ़ी पैसा लगाने के बाद भी कोई क़ामयाबी नहीं मिली.
क़तर के मामले में भी बिन अपनी मांगें मंगवाने में नाक़ाम रहे हैं.
सऊदी अरब को तरक्की के रास्ते पर चलाने की बिन सलमान की योजनाएं तभी काम कर सकती हैं जब उनको घरेलू और विदेशी मोर्चे पर थोड़ी शांति और स्थिरता मिले.
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