लेबनान में सलमान का पासा सीधा पड़ेगा या उल्टा?

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- Author, वात्सल्य राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
तारीख : 14 फरवरी 2005
जगह : लेबनान की राजधानी बेरूत
लेबनान के पूर्व प्रधानमंत्री रफ़ीक हरीरी का क़ाफ़िला राजधानी की सड़कों से गुज़र रहा था.
एकदम सधी रफ़्तार से दौड़ती कारें जैसे ही शहर के मशहूर सेंट जॉर्ज होटल के करीब से गुजरीं, एक ज़ोरदार धमाका हुआ.

चारों तरफ चीख-पुकार मच गई. तबाह हो चुकी कारों से उठते धुएं का ग़ुबार दूर तक दिखाई देने लगा.
एंबुलेंस और पुलिस गाड़ियों के सायरन और रोते बिलखते लोगों की आवाज़ें कान के पर्दे चीर रही थीं.

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कहां से हुई शुरुआत
इस धमाके में 1990 के दशक में लेबनान के सबसे प्रभावी नेता रहे रफ़ीक हरीरी समेत 22 लोगों की मौत हो गई.
इसके बाद लेबनान में सीरिया के ख़िलाफ प्रदर्शन शुरू हुए और सीरिया को अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी. देश में राजनीतिक अस्थिरता का एक और दौर शुरू हो गया.
लंबी जांच के बाद एक इंटरनेशनल ट्राइब्यूनल ने ईरान समर्थित शिया समूह हिज़्बुल्लाह के पांच सदस्यों को रफ़ीक की हत्या का दोषी ठहराया.
लेकिन हिज़्बुल्लाह ने इसे 'राजनीतिक साजिश' करार दिया.

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क्या है साजिश का सच?
बेरुत में हुए उस धमाके के क़रीब 15 साल बाद यानी 4 नवंबर 2017 को रफ़ीक हरीरी के बेटे साद अल हरीरी ने दावा किया कि उनके लिए भी वैसी ही साजिश रची जा रही है.
साद ने सऊदी अरब की राजधानी रियाद में एक बयान जारी किया और प्रधानमंत्री पद छोड़ने का एलान कर दिया.
उन्होंने लेबनान में ख़ासा प्रभाव रखने वाले हिज़्बुल्लाह और ईरान पर आरोपों की झड़ी लगा दी और इसी के साथ पूरे क्षेत्र में नए संघर्ष से जुड़ी आशंकाओं के बादल घिर गए.
मध्यपूर्व की राजनीति पर नज़र रखने वाले इसे सुन्नी और शियाओं के पारंपरिक संघर्ष से जोड़कर देख रहे हैं.

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दांव पर दमखम
एक तरफ है सुन्नी नेतृत्व वाला सऊदी अरब और दूसरी तरफ शिया प्रभुत्व वाला ईरान.
मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ क़मर आग़ा कहते हैं कि अगर हिज़्बुल्लाह कमज़ोर होता है तो इसका असर पूरे क्षेत्र में ईरान के बढ़ते दबदबे पर होगा.
आग़ा के मुताबिक, "सऊदी अरब मानता है कि अरब जगत के अंदर ईरान का किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए. वो सीरिया और इराक में भी ईरान का दखल बढ़ता नहीं देखना चाहता. इसी वजह से क्षेत्र में तनाव बढ़ा हुआ है और बहुत सी जगह पर छद्म युद्ध दिखाई देता है."
क़मर आग़ा आगे बताते हैं, "अगर लेबनान में हिज़्बुल्लाह कमजोर होता है तो इसका असर सीरिया में ईरान के प्रभाव पर भी होगा. इस्लामिक स्टेट से लड़ने में हिज़्बुल्लाह का बड़ा रोल था. सीरिया की बशर अल असद सरकार को बचाने में भी उनकी बड़ी भूमिका थी. इराक में भी उन्होंने आईएस से लड़ने वाले शिया मिलीशिया की मदद की थी."

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दावे पर सवाल
ईरान पर तोहमत लगाते हुए इस्तीफ़े का एलान करने वाले साद की बात करें तो उनकी गिनती अपने पिता की ही तरह देश के सबसे दौलतमंद और प्रभावी नेताओं में होती है.
उन्हें रफ़ीक ने ही अपना उत्तराधिकारी चुना था.
साद हरीरी पहले भी साल 2009 से 2011 तक लेबनान के प्रधानमंत्री रह चुके हैं.
बीते साल नवंबर में उन्हें राष्ट्रपति मिशेल आउन ने सरकार बनाने के लिए नामित किया.
साद के नाटकीय तरीके से इस्तीफ़ा देने और इस्तीफ़े के एलान के लिए रियाद को चुनने पर कई सवाल उठे.
इस बीच जब सऊदी अरब और उसके समर्थक खाड़ी देशों ने अपने नागरिकों को तुरंत लेबनान छोड़ने की सलाह दी तो वहां संघर्ष छिड़ने की आशंकाओं को बल मिला.
साद हरीरी भले ही मौजूदा हालात की तुलना फ़रवरी 2005 से कर रहे हों, लेकिन लेबनान में भारत के राजदूत रह चुके डॉ. बेनी प्रसाद अग्रवाल उनके तर्कों से सहमत नहीं हैं.
वो कहते हैं, "यक़ीन नहीं होता कि आज की स्थिति में हिज़्बुल्लाह साद हरीरी को मारने की कोशिश करेगा. उनको मिलेगा क्या? ऐसी बातें फ़र्जी हैं."

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'हिरासत में हरीरी'
लेबनान में बदलते घटनाक्रम के बीच देश में हिज़्बुल्लाह के नेता हसन नसरल्लाह ने आरोप लगाया कि सऊदी अरब ने साद हरीरी को उनकी मर्ज़ी के बिना रोका हुआ है.
लेबनान के राष्ट्रपति मिशेल आउन ने भी सऊदी अरब पर आरोप लगाया है कि उन्होंने 'साद हरीरी और उनके परिवार को हिरासत में लिया हुआ है.'
राष्ट्रपति ने इसे 'साद हरीरी के मानवाधिकारों का उल्लंघन और लेबनान के ख़िलाफ आक्रामक कार्रवाई' बताया.
कई जानकार ये भी दावा कर रहे हैं कि लेबनान में जारी उथल-पुथल की स्क्रिप्ट रियाद में लिखी जा रही है और इसके रणनीतिकार सऊदी अरब के शहज़ादे मोहम्मद बिन सलमान हैं.
डॉ. अग्रवाल कहते हैं, "मुझे लगता है कि क्राउन प्रिंस की जो कार्रवाई है, उससे लेबनान अस्थिर होगा. वो यमन में जो कर रहे हैं, उसका मक़सद शियाओं को ख़त्म करना है. उनका अगला कदम लेबनान और सीरिया में होगा जिससे ईरान अपनी जगह पर सिमटकर रह जाए. ये पांसा उन्होंने डाला दिया है, अब वो सीधा पड़े या उल्टा."

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लेकिन सऊदी अरब में जन्मे और वहां व्यापारिक हित रखने वाले साद हरीरी रियाद को क्लीन चिट दे रहे हैं. एक टीवी इंटरव्यू में साद हरीरी ने कहा कि वो लेबनान के लोगों के हितों को लेकर चिंतित हैं और इस्तीफ़ा देकर वो उनका ध्यान देश के सामने मौजूद चुनौतियों की ओर दिलाना चाहते थे.
हालांकि साद हरीरी के दावों पर सवाल उठाने वालों की कमी नहीं है.
क़मर आगा कहते हैं, "जिस तरह से उन्हें सऊदी बुलाया गया, वो तरीका हैरान करने वाला है. वो केवल सऊदी अरब के शाही परिवार से मिलते थे. संयुक्त अरब अमीरात में भी वो सिर्फ शाही परिवार से मिलते थे. उनका अपनी राजनीतिक पार्टी से भी संपर्क नहीं था."

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अमरीका की भूमिका
लेबनान छोटा देश है. ये महज़ 10 हज़ार वर्ग किलोमीटर दायरे में सिमटा है, लेकिन वाणिज्यिक और रणनीतिक तौर पर बेहद अहम है.
लेबनान में दिलचस्पी सिर्फ अरब देशों और ईरान की ही नहीं है. इसकी सीमाएं सीरिया और इसराइल से लगती है.
1980 के दशक में इसराइल ने दक्षिणी लेबनान पर हमला किया. इसके बाद हिज्बुल्लाह का उदय हुआ और शिया और सुन्नियों के बीच संघर्ष शुरु हो गया.
डॉ. अग्रवाल कहते हैं कि लेबनान का संविधान देश के शिया, सुन्नी और ईसाई समुदाय को जोड़कर रखने वाला है. लेबनान में राष्ट्रपति मैरोनाइट क्रिश्चियन, प्रधानमंत्री सुन्नी और स्पीकर शिया समुदाय से चुने जाते हैं.
ईसाईयों की मौजूदगी लेबनान में अमरीका की ख़ास दिलचस्पी जगाती है लेकिन विश्लेषकों को लगता है कि निजी हितों की वजह से अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप सऊदी अरब का साथ दे रहे हैं
डॉ. अग्रवाल कहते हैं, "ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर मध्य पूर्व आए थे. उनकी बस एक ही इच्छा है कि उनके नाम ये उपलब्धि दर्ज़ हो कि उन्होंने इसराइल और फ़लस्तीन का समझौता कराया. इसलिए वो सऊदी अरब को अपने साथ लाना चाहते थे. इसे लेकर कुशनर ने ट्रंप से क्राउन प्रिंस की मुलाक़ात कराई. जब ट्रंप सऊदी अरब गए तो अरबों डॉलर के बिज़नेस की बात भी हो गई. अगर बिज़नेस का मुद्दा हावी बना रहा तो इस क्षेत्र की समस्या बिगड़ सकती है."

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घातक नतीजे की चेतावनी
लेकिन अमरीका भी लेबनान में संघर्ष भड़कने के जोखिम से वाक़िफ़ है. अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने दूसरे देशों को आग़ाह किया है कि वो लेबनान को छद्म युद्ध के लिए इस्तेमाल न करें.
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटरेस ने भी चेतावनी दी है कि इस क्षेत्र में नए संघर्ष के नतीजे घातक होंगे.
क़मर आगा भी कहते हैं कि कमज़ोर सरकारें इस क्षेत्र के संकट को बढ़ा रही हैं.
वो कहते हैं, "मध्य पूर्व के देशों में सरकारें बहुत कमज़ोर हो गई हैं. बाहर के देशों का हस्तक्षेप बढ़ा हुआ नज़र आता है. पश्चिम एशिया के ज़्यादातर देशों में हुक़ूमतें नाकाम हो रही हैं. बहुत-सी जगहों पर गृहयुद्ध की स्थिति है. ये लोग सेना के समर्थन से इस्लाम के नाम पर शासन कर रहे हैं. लोगों की वास्तविक मांगें पूरी नहीं हो पा रही हैं."
लेकिन लेबनान संकट को हल करने के लिए दुनिया की कई ताकतें सक्रिय दिख रही हैं.

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'टकराव टालेगा ईरान'
बीते हफ्ते फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों बिना तय कार्यक्रम के सऊदी अरब का दौरा कर चुके हैं. डा. अग्रवाल मानते हैं कि लेबनान संकट हल करने में फ़्रांस की भी दिलचस्पी है.
वो कहते हैं, "लेबनान फ़्रांस की कॉलोनी रहा है. ऐसे में फ्रांस अमरीका से कह सकता है कि वो सऊदी अरब पर दबाव बनाए और स्थिति कुछ संभले."
वहीं क़मर आगा की राय है कि संकट भले ही कितना भी गंभीर दिख रहा हो ईरान इसे टकराव तक ले जाने से बचेगा.
आगा कहते हैं, "मैं नहीं समझता कि ईरान के नेता किसी भी स्थिति में लड़ाई का समर्थन करेंगे. वो अपनी क्षमता जानते हैं. ईरान के ऊपर परमाणु कार्यक्रम को लेकर दबाव आया तो उन्होंने बातचीत की और अब संधि पर पूरी तरह अमल कर रहे हैं. वो एक सीमा तक ही तनाव बढ़ाते हैं."

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कैसे मिलेगा समाधान
लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या बात किसी एक पक्ष के संयम रखने से सुलझ पाएगी?
या फिर अमरीका, संयुक्त राष्ट्र और दूसरे देश संकट के समाधान के लिए सभी पक्षों पर वाक़ई दबाव बनाएंगे.
इस सवाल के जवाब से ही तय होगा कि लेबनान और मध्य पूर्व पर छाए आशंका बादल छंटेंगे या नहीं.
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