क्या युद्ध की तरफ़ बढ़ रहे हैं सऊदी अरब और ईरान?

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ईरान और सऊदी अरब लंबे वक़्त से एक-दूसरे के दुश्मन हैं, लेकिन हाल ही में इन दोनों देशों के बीच तनातनी ज़्यादा बढ़ने लगी है.
दोनों देशों के अपने-अपने शक्तिशाली दोस्त और दुश्मन हैं. एक नज़र डालते हैं अगर ईरान और सऊदी अरब के बीच युद्ध होता है तो कौन किसकी तरफ़ खड़ा होगा?
सऊदी अरब
सुन्नी प्रभुत्व वाला सऊदी अरब इस्लाम का जन्म स्थल है और इस्लामिक दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण जगहों में शामिल है. सऊदी का शुमार दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों और धनी देशों में से एक है.
सऊदी अरब को डर है कि ईरान मध्य-पूर्व पर हावी होना चाहता है और इसीलिए वह शिया नेतृत्व में बढ़ती भागीदारी और प्रभाव वाले क्षेत्र की शक्ति का विरोध करता है.
युवा और शक्तिशाली क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पड़ोसी यमन में हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ एक लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं. सऊदी का कहना है कि विद्रोहियों को ईरान से समर्थन मिल रहा है लेकिन तेहरान ने इस दावे को खारिज़ किया है.

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सऊदी अरब भी उसके जवाब में विरोध करता है और सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-अशद को हटाना चाहता है, जो ईरान के मुख्य सहयोगी हैं.
सऊदी अरब के पास सबसे अच्छे हथियारों से लैस फ़ौज है, जो दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातकों में से एक है. इनके पास दो लाख से ज़्यादा सैनिक हैं.
ईरान
ईरान 1979 में एक इस्लामिक गणराज्य बना. उस समय वहां राजतंत्र को हटाकर अयातुल्लाह ख़मैनी के नेतृत्व में राजनीतिक ताक़त ने अपनी पकड़ मजबूत की.
ईरान की आठ करोड़ आबादी में शिया मुसलमान बहुसंख्यक हैं. पिछले कुछ दशकों में इराक़ में सद्दाम हुसैन का दौर गुज़र जाने के बाद मध्य पूर्व इलाक़े में ईरान ने अपना प्रभुत्व तेज़ किया है.
ईरान ने इस्लामिक स्टेट (आईएस) से लड़ने में सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद की काफ़ी मदद की. ईरान की विशेष सेना इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कोर्प्स (आईआरजीसी) ने सीरिया और इराक़ में सुन्नी जिहादियों ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी है.

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ईरान का यह भी मानना है कि सऊदी अरब लेबनान को अस्थिर करने की कोशिश कर रहा है, यहां ईरान एक शिया अभियान हिज़बुल्लाह का समर्थन कर रहा है.
ईरान अमरीका को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है. ईरान अपने पास कुछ अत्याधुनिक मिसाइलें होने का दावा भी करता है.
ईरान में सेना और आईआरजीसी के जवानों को मिलाकर कुल पांच लाख 34 हज़ार जवान मौजूद हैं.
अमरीका
अमरीका और ईरान के आपसी रिश्ते बेहद निचले स्तर पर हैं. साल 1953 में सीआईए ने तत्कालीन ईरानी राष्ट्रपति को उनके पद से हटाने में अहम भूमिका निभाई थी, वहीं 1980 में तेहरान स्थित अमरीकी दूतावास में कुछ लोगों को बंधक बना दिया गया था.
दूसरी तरफ, सऊदी अरब के अमरीका के साथ घनिष्ठ संबंध रहे हैं. अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के ईरान विरोधी रवैए के बाद यह रिश्ते और बेहतर हुए हैं, ट्रंप ने ओबामा के समय अमरीका और ईरान के बीच हुए परमाणु समझौते को भी अस्वीकार कर दिया है.

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ट्रंप प्रशासन ने कभी भी सऊदी अरब में कट्टरपंथी इस्लाम की वैसी आलोचना नहीं की जैसी वे ईरान में करते हैं. इतना ही नहीं अमरीकी राष्ट्रपति के विवादित मुस्लिम ट्रैवल बैन में भी सऊदी अरब के नाम शामिल नहीं था.
मध्य पूर्व की अपनी पहली यात्रा में ट्रंप ने सऊदी और इज़राइली नेताओं से मुलाकात की. सऊदी अरब अमरीका के हथियार बिक्री का एक अहम क्षेत्र है.
रूस
रूस के संबंध सऊदी अरब और ईरान दोनों के साथ हैं. उसके दोनों ही देशों के साथ आर्थिक गठजोड़ हैं. वह इन दोनों देशों को आधुनिक हथियार बेचता है.
तेहरान और रियाद के बीच तनाव की स्थिति में रूस किस तरफ़ जाएगा फ़िलहाल यह साफ़ नहीं है. हालांकि यह ज़रूर लगता है कि इन हालातों में रूस मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है.

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शीत युद्ध के दौरान सोवियत यूनियन ने सीरियाई सेना को हथियार मुहैया करवाए थे. सीरियाई युद्ध के दौरान रूस के हवाई आक्रमण ने बशर अल-असद की मदद की थी. उस समय ईरान ने भी उनकी मदद की थी.
तुर्की
मध्य पूर्व में जारी सैन्य और राजनीतिक गतिरोध के बीच तुर्की ने ईरान और सऊदी अरब के बीच एक बहुत महीन सी रेखा खींची है.
सुन्नी ताक़त के रूप में तुर्की ने सऊदी अरब के साथ अपने रिश्ते काफ़ी मजबूत किए हैं.
वहीं दूसरी तरफ ईरान के साथ कुछ गहरे मतभेदों के बावज़ूद तुर्की ने कुर्दिश प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से ईरान की तरफ़ भी क़दम बढ़ाए हैं.

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इज़राइल
1948 में यहूदियों के बहुसंख्यक देश इज़राइल को स्वतंत्र घोषित किया गया था. इज़राइल के मिस्र और जॉर्डन के साथ ही कूटनीतिक रिश्ते हैं.
ईरान और इज़राइल एक दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं. ईरान ने इज़राइल के अस्तित्व पर ही सवाल उठाते हुए उसे निरस्त करने की मांग की थी.
इज़राइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वे ईरान को परमाणु हथियार प्राप्त करने से रोके.
इज़राइल ने मध्य पूर्व में ईरान के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिए सऊदी अरब के साथ रिश्ते मजबूत किए हैं.

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सीरिया
सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद ईरान के साथ खड़े नज़र आते हैं. जिहादियों के साथ हुए युद्ध के वक़्त ईरान ने सीरियाई सरकार की काफ़ी मदद की थी.
लेबनान में शिया संगठन हिज़बुल्लाह को ईरानी हथियार पहुंचाने में सीरिया एक महत्वपूर्ण ज़रिया है. हिज़बुल्लाह ने भी सीरियाई सरकार की मदद के लिए अपने हजाऱों लड़ाके भेजे थे.
सीरियाई सरकार अक्सर सऊदी अरब पर मध्यपूर्व में विध्वंसक नीतियां अपनाने का आरोप लगाती रहती है.

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लेबनान
सऊदी और ईरान के संबंध में लेबनान का रुख़ मिलाजुला मालूम पड़ता है.
लेबनान के प्रधानमंत्री साद हरीरी ने कुछ दिन पहले ही सऊदी अरब से अपने इस्तीफ़े की घोषणा की थी. उनके सऊदी के साथ काफ़ी अच्छे रिश्ते थे.
वहीं लेबनान में हेज़बोल्लाह ईरान के क़रीब है. ईरान इस संगठन को लगातार मदद पहुंचाता रहता है. हेज़बोल्लाह के नेता हसन नसरल्लाह ने हाल ही में सऊदी सरकार की आलोचना भी की थी.

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खाड़ी देश
क़तर, बहरीन और कुवैत के ईरान के मुक़ाबले सऊदी अरब के साथ ज़्यादा बेहतर रिश्ते रहे हैं.
हालांकि इस साल की शुरुआत में सऊदी अरब ने जब क़तर से ईरान के साथ रिश्ते समाप्त करने की बात कही थी तो क़तर ने यह मानने से इंकार कर दिया था.
इसके बाद जुलाई में सऊदी अरब, यूएई, मिस्र और बहरीन ने मिलकर क़तर के साथ रिश्ते समाप्त कर दिए थे. इस मौक़े पर ईरान ने क़तर को खाद्य साम्रगी पहुंचाकर मदद की थी.

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अगस्त माह में क़तर और ईरान के बीच बहुत अच्छे कूटनीतिक संबंध स्थापित हो गए. वहीं बहरीन और कुवैत सऊदी अरब की तरफ़ खड़े नज़र आते हैं.












