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आजकल कहां हैं इस्लामिक स्टेट के लड़ाके?
- Author, डॉक्टर लॉरेंजो विदिनो
- पदनाम, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
रक्का शहर में तीन साल के आतंक के बाद आईएस के लड़ाके अपने कब्ज़े वाला अधिकतर हिस्सा खो चुके हैं. इस बात में कितनी सच्चाई है कि ये लड़ाके अब दूसरे देशों का रुख़ कर वहां आतंक फैलाएंगे?
जैसा कि स्व-घोषित इस्लामिक स्टेट इराक और सीरिया में तेज़ी से टूटा है, दुनिया भर में सुरक्षा अधिकारियों के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा हो गया है कि इन लड़ाकों का क्या होगा?
करीब 30,000 विदेशी लड़ाके आईएस से जुड़े थे और अब चिंता है कि ये अपने मक़सद में कामयाब न होने के चलते चरमपंथी हमले करने के लिए अपने घर लौट आए होंगे या कहीं और चले गए होंगे.
हालांकि, पूर्वानुमान लगाना मुश्किल है लेकिन फिर भी आईएस की बदलती नियति के वैश्विक सुरक्षा के मद्देनज़र बड़े मायने होंगे.
गुरिल्ला युद्ध
ऐसे संकेत मिले हैं कि कुछ विदेशी लड़ाके सीरिया और इराक़ में रहेंगे. इन संकेतों में यूएस काउंटर-टेररिज़म अधिकारियों का आकलन भी शामिल है.
यूके सिक्योरिटी सर्विस एम15 के प्रमुख ने इस हफ्ते कहा था कि हाल ही में आईएस से जुड़ने वाले अनुमानित 800 ब्रिटिश नागरिकों में से काफी कम वापस लौटे हैं और कम से कम 130 मारे गए हैं.
जो विदेशी लड़ाके वापस नहीं लौटे हैं उनके आईएस के साथ ही जुड़कर काम करने की संभावना है, जिस तरह आईएस 10 साल पहले काम किया करता था. एक विद्रोही बल की तरह जो चरमपंथी युद्ध से लेकर गुरिल्ला युद्ध तक का तरीका अपनाता था.
कई लड़ाकों के ख़िलाफ़ वहां इराक़ी अदालत में मामले चल रहे हैं, जिसके कारण उनके मूल देश में कानूनी और नैतिक दुविधाएं पैदा हो रही हैं. कुछ को मौत की सजा सुनाई गई है.
जॉर्डन और लेबनान
लेकिन, कई अन्य लड़ाके तुर्की और सीरिया के 822 किमी. लंबी सीमा के ज़रिए इलाके को छोड़ रहे हैं.
तुर्की के अधिकारी सीमा पर पहले के मुक़ाबले और ज़्यादा सख्ती से निगरानी रख रहे हैं.
आईएस का तुर्की में बड़ा नेटवर्क है जिसकी विदेशी लड़ाकों को सीरिया से बाहर निकालने में मुख्य भूमिका रही है. यही तुर्की के लिए चिंता का कारण बना हुआ है.
इसके साथ ही अन्य पड़ोसी देश जैसे जॉर्डन और लेबनान भी इसी समस्या का सामना कर रहे हैं.
सीरिया और इराक छोड़ने वाले आईएस के लड़ाकों के लिए कई ऐसी जगह हैं जहां वो जा सकते हैं.
जंग से जंग की ओर
आईएस के यमन, सिनाई प्रायद्वीप, उत्तरी काकेशस और पूर्वी एशिया में मौजूद होने के प्रमाण मिले हैं.
इस समूह की लीबिया में भी मजबूत स्थिति है. अमरीका का कहना है कि इसके 6500 लड़ाके हैं और कई लड़ाके अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद हैं.
यहां यूएस ने भूमिगत सुरंगों पर हुए हमले में 94 लड़ाकों के मारे जाने की बात कही थी.
ऐसी बातें भी सामने आई हैं कि चरमपंथी लड़ाके म्यांमार और फिलिपींस जैसे देशों में पहुंच रहे हैं. इसके चलते स्थानीय जिहादियों को और बढ़ावा मिलने की आशंका है.
कमज़ोर देश
कई विदेशी लड़ाके अपने मूल देश की तरफ वापस भी लौट रहे हैं. वापस लौटने वालों में से कुछ लड़ाकों ने चरमपंथी गतिविधियां छोड़ दी हैं, कुछ गुप्त नेटवर्क तैयार कर रहे हैं ताकि देश की राजनीतिक स्थिति को कमज़ोर करने के लिए हमले किए जा सकें.
उत्तरी अफ्रीकी देशों को इस मामले में और ज़्यादा ख़तरा है- ट्यूनीशिया से करीब 6000 लोग आईएस में शामिल हुए थे. अरब खाड़ी देश भी इसी तरह की दिक्कत का सामना कर सकते हैं.
रूस, काकेशस और कई मध्य एशियाई देश भी चिंता की स्थिति में हैं क्योंकि वहां से भी कई लोग आईएस से जुड़े थे.
यूरोप के अधिकारियों ने करीब 6000 यूरोपीय विदेशी लड़ाकों के वापस लौटने को सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया है.
सीरिया और इराक़
इटैलियन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल पॉलिटिकल स्टडीज और जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटीज़ प्रोग्राम ऑन एक्स्ट्रीमिज़्म के अनुसार, साल 2014 में विदेशी लड़ाकों के आईएस के कब्जे वाले इलाके में लड़ने की बात सामने आने के बाद पांच में से लगभग एक व्यक्ति पश्चिमी देशों पर हुए हमलों में शामिल रहा है.
हालांकि, कई ने हिंसक गतिविधियों में शामिल न होने के संकेत दिए हैं लेकिन ये आशंका भी बनी हुई है कि वह अपने प्रशिक्षण का यहां फायदा उठा सकते हैं. उनके कब्जे वाले इलाके के छिन जाने का ये मतलब नहीं है कि वो स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर सकते.
सीरिया और इराक़ से वापस लौटे इन लड़ाकों को लेकर एक और समस्या बनी हुई है और वह है कानून. कुछ लड़ाके यूरोप में अवैध तरीके से तो कुछ रिफ़्यूजी के तौर पर आए हैं.
अमरीकी गृह मंत्रालय
वहीं, कई विदेशी लड़ाके वैध तरीके से भी यूरोप लौटे हैं. उनके पास वैध पासपोर्ट भी मौजूद है. इन लड़ाकों की पहचान करना तो एक समस्या है ही लेकिन इतनी ही बड़ी समस्या यह है कि इनके साथ क्या किया जाए.
इन्हें गिरफ्तार करना एक तरीका हो सकता है लेकिन इसका जवाब और मुश्किल है. अमरीकी गृह मंत्रालय ने पिछले साल बताया था कि सीरिया और इराक़ से लौटे 400 ब्रिटिश लड़ाकों में से 54 को ही सजा हो पाई है.
इसकी वजह है अलग-अलग देशों का कानून. जैसे जब कई लोग सीरिया गए तो कुछ देशों में आतंकी संगठनों या विदेशी संघर्ष में हिस्सा लेना आपराध नहीं था.कई देशों ने अब नए कानून बनाए हैं लेकिन इन्हें पहले की परिस्थितियों पर लागू नहीं किया जा सकता.
बड़ा झटका
यहां तक कि जिन देशों में पहले से ही इसे अपराध घोषित किया गया है वहां भी इसे साबित करने के लिए पुख्ता सबूतों की जरूरत है. विदेशी लड़ाकों के बच्चों या आईएस के कब्जे वाले क्षेत्र में पले-बढ़े बच्चों को लेकर भी कानून बहुत उलझा हुआ है.
इस्लामिक स्टेट के लिए उसके कब्जे वाले क्षेत्र से नियंत्रण खत्म होना उसके लिए सबसे बड़ा झटका है. फिर भी समूह और इसके समर्थक दुनिया के विभिन्न हिस्सों में सामने आ रहे हैं और नजदीक भविष्य में फिर से अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं.
आईएस और उसके मक़सद के पूरी तरह खत्म होने की संभावना नहीं है. यह संगठन सोशल मीडिया पर भी सक्रिय है और इसे अपना समर्थन जुटाने का तरीका बना सकता है.
सीरिया और इराक से आईएस के खात्मे ने एक अध्याय तो समाप्त किया है लेकिन एक नया अध्याय शुरू होने को है.
(ये विश्लेषणात्मक लेख एक बाहरी संस्थान में कार्यरत विशेषज्ञ डॉ. लॉरेंजो विदिनो द्वारा लिखा गया है. डॉ. लॉरेंजो जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में अतिवाद पर कार्यक्रम और मिलान में इटैलियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल पॉलिटिकल स्टडीज (आईएसपीआई) में रैडिकलाइजेशन और अंतर्राष्ट्रीय चरमपंथ पर कार्यक्रम के निदेशक हैं.)
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