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#100Women: पीरियड के मिथक तोड़ती स्कूली छात्राएं
- Author, रित्विका मित्रा
- पदनाम, 100 वूमन जर्नलिस्ट
12 साल की एंजेलिना जुमुला हफ़्ते में दो बार स्कूल ख़त्म होने के बाद भी वहां रुकती हैं. क्योंकि अगले कुछ घंटों तक वो सैनिटरी पैड बनाने के लिए सूती कपड़े, वाटरप्रूफ़ अस्तर और फलालैन कपड़े टांकती हैं.
मालावी के लिलौंग्वे के स्कूल में पीरियड कोई टैबू नहीं है, जो लड़के और लड़कियों को अलग करता है.
म्लोज़ा प्राथमिक विद्यालय के सैनिटरी क्लब में लड़कियां और लड़के मिलकर सैनिटरी पैड्स बनाते हैं.
एक घंटे में ये छात्र मिलकर लगभग 10 पैड बनाते हैं. एंजेलिना ने कहा, "लड़के पैड बनाने में हमारी मदद करते हैं."
वो कहती हैं, "लड़कियां अपने पीरियड पर बातें करने या इस दौरान खेलने से नहीं कतरातीं."
इसका उद्देश्य लड़कियों को अपना सैनिटरी पैड बनाने के लिए सशक्त बनाना है, जबकि लड़के इसे अपनी बहनों के लिए बनाते हैं. इनमें से कुछ अन्य लड़कियों को कम कीमतों पर बेचे भी जाते हैं.
पिछले दो सालों से चैरिटी वाटर एड ने स्कूलों में सैनिटेशन को बढ़ावा देने के लिए कार्यक्रम चलाया था, लेकिन अब लिलौंग्वे के 25 से अधिक स्कूल खुद ही यह कार्यक्रम संचालित कर रहे हैं..
यूनिसेफ के मुताबिक पीरियड के दौरान छात्राएं अमूमन स्कूल में अनुपस्थित रहती हैं जबकि बड़ी लड़कियों में ड्रॉप आउट दर ज़्यादा है.
स्कूलों में सैनिटेशन की व्यवस्था की कमी ने इस समस्या को और भी बढ़ा दिया है.
सैनिटेशन क्लब की मैट्रन और स्कूल शिक्षिका कैथरीन मंगानी कहती हैं, "जब से यह कार्यक्रम शुरू हुआ है, स्कूल में लड़कियों की उपस्थिति बढ़ी है."
दोबारा इस्तेमाल के योग्य पैड बनाने से लड़कियों को स्कूल में बनाए रखने में मदद मिल सकती है, और स्थानीय समुदाय "मातृ समूह" की महिलाएं लड़कियों को मासिक धर्म के विषय में उनके प्रश्नों की पूछताछ में सहायता करती है.
अन्य देशों में जहां वाटरएड सैनेटरी पैड उत्पादन के लिए लड़कियों को प्रशिक्षण दे रही है उनमें युगांडा, इथियोपिया, मेडागास्कर और मोज़म्बिक शामिल हैं.
नेपाल में भी चल रहा कार्यक्रम
नेपाल के ग्रामीण इलाकों में भी इसी तरह का कार्यक्रम चल रहा है, लेकिन इसे चलाने में समाज की कुरीतियों से भी लड़ना पड़ रहा है.
क्लेयर लिन ने जब 2013 में सस्ते सैनिटरी पैड बनाने के लिए पटलेखेत गांव में धरतीमाता नामक कार्यशाला शुरू की तब केवल दो महिलाएं वहां पहुंची थीं.
वो कहती हैं, "और इन महिलाओं को उनके पतियों का समर्थन प्राप्त था." अब सात स्थानीय महिलाएं इस प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं.
लिन कहती हैं, "हम अलग-अलग चीज़ों से विभिन्न प्रकार के इको-फ़्रेंडली पैड बनाते हैं. सूती पैड एनजीओ और स्थानीय महिलाओं को सस्ते में बेचे जाते हैं."
लेकिन दोबारा इस्तेमाल के योग्य पैड बनाने में समस्या होती है.
न्यूयॉर्क सिटी में अफ़्रीकन सर्विस कमिटी की स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी डॉक्टर एमिली बिशप कहती हैं, "अगर इन्हें सही तरीके से साफ़ कर सुखाया नहीं गया तो ये स्वास्थ्य के लिए सही नहीं होंगे."
वो कहती हैं, "दोबारा इस्तेमाल के योग्य पैड को सुखाने के लिए हमेशा बाहर नहीं लटका सकते क्योंकि माहवारी से जुड़ी कई सामाजिक भ्रांतियां हैं."
इसका मतलब है कि साफ़ पानी और सैनिटेशन सुविधाएं और माहवारी से जुड़े मिथकों को बताया जाना ज़रूरी है.
पीरियड के मिथक
मध्य प्रदेश के भोपाल की 16 वर्षीय सोनल वानखेड़े एक साल पहले अपने स्कूल की तीन परीक्षाओं में उपस्थित नहीं हो सकीं. अस्थायी सैनिटरी पैड के रूप में कपड़े के टुकड़े का उपयोग करके उसे अपने घर छोड़ने में असुविधा महसूस हो रही थी.
वो कहती हैं, "वाटरएड के सत्र में शामिल होने के बाद मुझे पता चला कि पीरियड सभी लकड़ियों को आता है. जब मैंने पहली बार अपनी मां के साथ इस पर बात की तो उन्होंने कहा कि यह पता होना उतना ज़रूरी नहीं है."
भारत में, पीरियड को लेकर मिथक के कारण कई जगहों पर महिलाएं इस दौरान रसोई में नहीं घुसतीं या खाना नहीं पकाती, क्योंकि उन्हें इस दौरान अपवित्र माना जाता है.
वो कहती हैं, "जब भी मैं इसके सत्र में शामिल होती, अपनी मां को इसमें बतायी गई बातें बताती. अंत में मेरी मां मेरे लिए पैड ख़रीदने पर राजी हुईं. अब वो इस मिथक को समझ गई हैं... बल्कि वो किसी भी चीज़ के लिए ना नहीं कहती हैं. यहां तक कि अब मैं खाना पका भी सकती हूं और परोस भी सकती हूँ."
100 महिलाएं क्या है?
बीबीसी हर साल पूरी दुनिया की प्रभावशाली और प्रेरणादायक महिलाओं की कहानियां दुनिया को बताता है. इस साल महिलाओं को शिक्षा, सार्वजनिक स्थानों पर शोषण और खेलों में लैंगिक भेदभाव की बंदिशें तोड़ने का मौका दिया जाएगा.
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