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वुसतुल्लाह खान का ब्लॉग: ‘संयुक्त राष्ट्र गालम गलौच ट्रॉफ़ी’ का सही हक़दार कौन?
- Author, वुसतुल्लाह खान
- पदनाम, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
संयुक्त राष्ट्र की सालाना महासभा को ऐसा मंच समझा जाता है जिसमें यह उम्मीद होती है कि दूर देशों से आने वाले चोटी के राष्ट्रनेता इस ज़मीन के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और आतंकी फोड़ों के इलाज के लिए अपने-अपने ब्रीफ़केस में नए-नए मरहम और नुस्ख़े भरकर लाएंगे.
आपस में एक-दूसरे से विचारों की अदला-बदली करेंगे और थोड़ी बहुत तफ़री और शॉपिंग भी कर लेंगे.
मगर देखा यह गया है कि दो-दो हफ्ते चलने वाली महासभा में लंबे-लंबे भाषण और घिसी-पिटी ज़बान सुन-सुनकर हर कोई इतना ऊब जाता है कि अच्छे से अच्छा प्रस्ताव भी जम्हाइयों और उबासियों के दरमियान अपनी अहमियत खो बैठता है.
बोरियत तोड़ने के फ़नकार
इसलिए ज़रूरी होता है कि महासभा की बोरियत को तोड़ा जाए और कुछ ऐसे फ़नकार बुलाए जाएं जो एक-दूसरे के बाल खींच कपड़े उतार दूर देशों से आने वाले मेहमानों का ख़ून थोड़ा से गरमाएं और दिल बहलाएं.
मेरे हिसाब से पिछले कई सालों से महासभा का दिल मोह लेने वाली सबसे दिलचस्प फ़नकार जोड़ी इंडिया और पाकिस्तान की है.
मगर इस साल की महासभा में 'संयुक्त राष्ट्र गालम गलौच ट्रॉफ़ी' के सही हक़दार अमरीका के डोनल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के विदेश मंत्री री यो हू हैं जिन्होंने एक-दूसरे को वैसी-वैसी सुनाई कि भारत और पाकिस्तान जैसे चैंपियंस ने भी कानों को हाथ लगा लिया.
पैसा वसूल परफॉर्मेंस
मगर संयुक्त राष्ट्र के ख़चाख़च सम्मेलन को मनोरंजक दंगल का रूप देने में भारत और पाकिस्तान भी किसी अच्छे ख़ान से उन्नीस नहीं रहे. सुषमा स्वराज और मलीहा लोधी जैसी धाकड़ों ने एक-दूसरे के पुर्ज़े फ़िट कर दिए.
अगर मलीहा इस दंगल में तस्वीर का दांव ठीक तरीके से नहीं लगा पाईं और सुषमा से एक पॉइंट से हार गईं. पर तमाशाइयों और सट्टेबाज़ों के हिसाब से दोनों की परफॉर्मेंस कुल मिलाकर पैसा वसूल रही.
महासभा के तमाशाई तो यह धड़मधकेल परफॉर्मेंस देखकर मोगैम्बो की तरह ख़ुश-ख़ुश घर लौटे, पर अपने इंडिया-पाकिस्तान में मीडिया को एक-दूसरे की ताज़ा लंगोट हाथ आ गई.
भारत-पाक की होड़
अबे जाहिलों पहले कश्मीर और फ़लीस्तीन की तस्वीरों को तो पहचान लो फ़िर हम पर कीचड़ उछालना. अरे चल बस रहने दे याद नहीं कि तुम्हारे पिछले विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने 2011 में सुरक्षा परिषद में साथ बैठे पुर्तगाल के राजदूत का भाषण अपना समझकर पढ़ दिया था.
इस पर कैसी खिल्ली उड़ी थी भूल गए क्या? देख लेंगे तुम्हें अगले साल इसी मंडप पर और ऐसी तस्वीर रखेंगे तुम्हारे ज़ुल्म की कि दुनिया की आंखें फटी रह जाएंगी. अबे चल निकल दुनिया की आंखें खोलने चला है पहले अपनी आंखें तो खोल ले.
मालूम है, सबसे अच्छी बात क्या है? भारत के नेता जब भी किसी इंटरनेशनल फ़ोरम पर भाषण देते हैं तो लगता है कि वह विश्व नेताओं से नहीं बल्कि प्रगति मैदान में किसी चुनावी भीड़ के सामने हैं और पाकिस्तानी नेता जब संयुक्त राष्ट्र जैसे मंडपों में भाषण देते हैं तो उन्हें पूरा हॉल लाहौर का मोची दरवाज़ा दिखाई देता है.
लेकिन दुनिया भर के नेता इसे स्टैंडअप कॉमेडी समझकर ख़ूब एंजॉय करते हैं. ऊपरवाला जोड़ी सलामत रखे ताकि अगले वर्ष इससे भी बढ़िया परफॉर्मेंस दे सके. वो जो कहते हैं न स्काई इज़ द लिमिट.
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