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उत्तर कोरिया पर क्यों नहीं होता प्रतिबंधों का असर?
पिछले सात हफ़्तों में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को क़ाबू में करने के लिए दो नए प्रतिबंध लगाए. पहला प्रतिबंध अगस्त महीने में लगा था जिसका उद्देश्य था कि उत्तर कोरिया अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नहीं कर पाए.
दूसरा प्रतिबंध सितंबर महीने में लगा और इसका उद्देश्य था कि वो अपने यहां बने कपड़ों का निर्यात नहीं कर सके और साथ में ही वो कच्चे तेल का आयात भी नहीं कर पाए. संयुक्त राष्ट्र की पूरी कोशिश है उत्तर कोरिया को दुनिया के मंच पर अलग-थलग हो जाए.
इसकी प्रतिक्रिया में किम जोंग-उन ने प्रतिशोध लेने की धमकी दी थी. उत्तर कोरिया ने कहा था कि अमरीका को इन प्रतिबंधों के लिए बेइंतहा दर्द सहना होगा. अभी तक ऐसे कोई संकेत नहीं मिल रहे हैं जिससे पता चल सके कि उत्तर कोरिया परमाणु कार्यक्रम छोड़ने जा रहा है.
इन प्रतिबंधों के बाद उत्तर कोरिया ने जापान के ऊपर से मिसाइल का परीक्षण किया था. कई विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तर कोरिया पर इन पाबंदियों का कोई असर नहीं होने वाला है और वो अपना परमाणु कार्यक्रम नहीं रोकेगा. आख़िर ऐसा क्यों है?
उत्तर कोरिया के पास छुपी हुई अर्थव्यवस्था है?
उत्तर कोरिया दशकों के आर्थिक प्रतिबंधों को झेल रहा है लेकिन वो डरता नहीं है. जापानी अख़बार क्योडो से उत्तर कोरिया के अधिकारी ने कहा था कि उत्तर कोरिया को रूस से ईंधन सिंगापुर के ज़रिए मिलता है. ऐसा 1990 के दशक से ही हो रहा है.
उत्तर कोरिया की सत्ताधारी पार्टी के लिए काम करने वाला गोपनीय संगठन ऑफिस 39 के अधिकार रि जोंग हो ने क्योडो से कहा था कि खाता खोलने के लिए चीनी और रूसी नामों का इस्तेमाल किया जाता है ताकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में उसे किसी तरह की दिक़्क़त का सामना नहीं करना पड़े.
क्योडो के मुताबिक उत्तर कोरिया सामानों के आयात के लिए एजेंटों का भी इस्तेमाल करता है. वो ऐसा व्यक्तिगत रूप से करता है या फिर निजी कंपनियों का सहारा लेता है. हाल की जांच में पता चला है कि चीनी कंपनी डीएचआईडी इस मामले में दोषी पाई गई कि वो उत्तर कोरिया को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मदद कर रही थी.
इसकी जांच एक अमरीकी रिसर्च ग्रुप ने की थी. उत्तर कोरिया पर यह भी आरोप है कि वो जहाज़ों के लिए फ़र्ज़ी दस्तावेजों का इस्तेमाल करता है. हाल ही में अमरीका के कुछ अधिकारियों ने दावा किया है कि कई जहाज़ों का इलाक़ा अचानक से बदल जाता है और इनसे उत्तर कोरिया में आपूर्ति होती है.
चीन नहीं तो रूस सही
वॉशिंगटन पोस्ट की हाल की रिपोर्ट के मुताबिक जब चीन ने उत्तर कोरिया से कच्चे तेलों के व्यापार में कटौती शुरू की तो रूसी तस्करों ने दस्तक दी. इस रिपोर्ट के मुताबिक रूसी तस्करों ने उत्तर कोरिया को तेल की आपूर्ति में दिक़्क़त नहीं होने दी.
अमरीकी अधिकारियों ने वॉशिंगटन पोस्ट से कहा है कि उत्तर कोरिया और रूस के बीच व्यापार में उछाल आया है. वॉशिंगटन पोस्ट ने एक अधिकारी के हवाले से बाताया है कि चीन ने सख्ती शुरू की तो रूस क़रीब आ गया.
उत्तर कोरिया के लिए अभावग्रस्तता कोई नहीं बात नहीं
जब चीन ने पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति में कटौती की तो उसके पहले से ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण उत्तर कोरिया इस तरह की समस्या से जूझ रहा था. उत्तर कोरिया में ज़रूरत के सामानों में कमी कोई नई बात नहीं है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स से दक्षिण कोरिया के पूर्व राजनयिक ने बताया, ''उत्तर कोरियाई नागरिक पहले से ही आर्थिक बदहाली में जी रहे हैं. यह देश पहले से ही ईंधन संकट से जूझ रहा है. ये ईंधन के दूसरे विकल्पों की तरफ़ रुख कर रहे हैं.''
''सड़कों से कारें कम हो गई हैं. जहां तक हो सके कम ईंधन से काम चलाया जा रहा है. उत्तर कोरिया में कोयला पर्याप्त मात्रा में है और ईंधन के तौर पर इसका ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है.''
परमाणु कार्यक्रम को लेकर भूत सवार है
इस साल गर्मी में न्यूयॉर्कर के लेखक ईवान ओस्नोस उत्तर कोरिया गए थे. उनका कहना है कि उत्तर कोरिया अमरीका से युद्ध की तैयारी कर रहा है. इसके लिए वो परमाणु क्षमता से लैस मिसाइल और अंडरग्राउंड बंकर तैयार कर रहा है.
ओस्नोस ने उत्तर कोरिया में एक सीनियर राजनयिक से बात की थी जिसमें उन्होंने बताया था कि उनके देश को भी जो भी ज़रूरत है उसे वो हासिल करने में लगा है.
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