उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग पर 'ब्रेक' चीन ही लगा सकता है!

किम जॉन्ग उन

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इस महीने की शुरुआत में उत्तर कोरिया ने हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया था. इसके बाद उत्तर कोरिया ने कई अंतर महाद्वीपीय मिसाइलें जापान और दक्षिण कोरिया के ऊपर से होकर छोड़ीं.

पिछले दिनों जब अमरीकी बमवर्षक विमान चेतावनी देने के लिए उत्तर कोरिया के ऊपर से उड़े तो उत्तर कोरिया के विदेश मंत्री री योंग-हो ने कहा कि अमरीका ने उनके देश के ख़िलाफ़ युद्ध का एलान कर दिया है. अमरीका को इसके गंभीर नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन का मज़ाक बनाते हुए उन्हें लिटिल रॉकेट मैन कहा, तो किम ने उन्हें पागल कह दिया. अमरीकी राष्ट्रपति उत्तर कोरिया को तबाह करने की धमकी कई बार दे चुके हैं. मगर, सब बेअसर है. अमरीका ने उत्तर कोरिया पर कई आर्थिक पाबंदियां लगाई हैं. वो भी उत्तर कोरिया को दबाने में नाकाम रही हैं.

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इस संकट को सुलझा सकता है चीन?

डोनाल्ड ट्रंप ने ये आरोप लगाया है कि चीन जान-बूझकर उत्तर कोरिया को बढ़ावा देता है. अमरीका का मानना है कि चीन अगर चाहे तो उत्तर कोरिया के सनकी तानाशाह किम जोंग उन पर लगाम लगा सकता है. लेकिन चीन ऐसा कर नहीं रहा. आज हाइड्रोजन बम से लैस उत्तर कोरिया पूरी दुनिया के लिए ख़तरा बन गया है.

तो क्या वाक़ई, चीन, उत्तर कोरिया की चुनौती निपटा सकता है. इस संकट को सुलझा सकता है? क्या चीन इस स्थिति में है कि वो उत्तर कोरिया को डरा-धमकाकर या पुचकार कर, एटमी हथियार ख़त्म करने के लिए राज़ी कर सके?

बीबीसी की रेडियो सिरीज़ 'द इन्क्वायरी' में जेम्स फ्लेचर ने इस बार इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की.

जेम्स फ्लेचर ने चीन और उत्तर कोरिया की अच्छी समझ रखने वाले विशेषज्ञों से बात की. इनमें से एक हैं चार्ल्स आर्मस्ट्रॉन्ग. अमरीका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले चार्ल्स उत्तर कोरिया में पैदा हुए थे. उन्होंने काफ़ी वक़्त चीन में भी गुज़ारा था, जहां वो बहुत से उत्तर कोरियाई छात्रों से भी मिले.

वीडियो कैप्शन, युद्ध हुआ तो क्या होगा उत्तर कोरिया का हाल?

चीन-उत्तर कोरिया भाई-भाई

वो बताते हैं कि चीन और उत्तर कोरिया भाई-भाई कहे जाते हैं. चीन बड़ा भाई और उत्तर कोरिया छोटा भाई.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब कोरिया, जापान की ग़ुलामी से आज़ाद हुआ, तो ये दो हिस्सों में बंट गया. उत्तर कोरिया, चीन के असर वाला था. वहीं दक्षिण कोरिया पर अमरीकी सेनाओं का क़ब्ज़ा.

उत्तर कोरिया ने साम्यवाद का रास्ता चुना. इसके पहले नेता किम इल सुंग, चीन में पैदा हुए थे. वो वहीं पले-बढ़े थे. सुंग, धड़ल्ले से चीनी भाषा बोलते थे.

1950 में उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया पर हमला बोल दिया था. तब अमरीका की अगुवाई में पश्चिमी देशों की सेनाओं ने दक्षिण कोरिया पर उत्तर कोरिया का क़ब्ज़ा होने से बचाया.

इस युद्ध में उत्तर कोरिया की मदद चीन ने की थी. आज भी चीन और उत्तर कोरिया के रिश्ते वैसे ही हैं. उत्तर कोरिया की हर मुश्किल में चीन उसका साथ देता है. चीन में कहा जाता है कि उत्तर कोरिया के साथ रिश्ता, जीभ और दांत जैसा है. वो एक-दूसरे के पूरक हैं. मददगार हैं.

1961 में चीन और उत्तर कोरिया के बीच दोस्ती का समझौता हुआ. जिसके तहत ये तय हुआ कि दोनों देशों में से किसी पर भी हमला होता है, तो वो एक-दूसरे की मदद करेंगे.

चीन तब से ही उत्तर कोरिया का मददगार और सबसे क़रीबी देश बना हुआ है. चीन से उत्तर कोरिया को भारी आर्थिक मदद मिलती है.

चार्ल्स आर्मस्ट्रॉन्ग बताते हैं कि नब्बे के दशक में जब उत्तर कोरिया में अकाल पड़ा, तो उसमें दस लाख से ज़्यादा लोग मारे गए थे. तब चीन ने ही उत्तर कोरिया की सबसे ज़्यादा मदद की थी.

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पोते का चीन से अच्छा रिश्ता नहीं

उत्तर कोरिया का 50 से 90 फ़ीसद तक कारोबार चीन से ही होता है. उत्तर कोरिया का मुस्तक़बिल चीन से जुड़ा हुआ है.

हालांकि चीन की तरह उत्तर कोरिया ने आर्थिक सुधार करने से साफ़ इनकार किया है. आज भी वो बेहद ग़रीब देश है जहां पर एक कम्युनिस्ट तानाशाह का राज है. चीन में भी लोग किम जोंग उन को नापसंद करते हैं.

किम जोंग उन, देश के पहले शासक किम इल सुंग के पोते हैं. लेकिन दादा के मुक़ाबले पोते का चीन से अच्छा रिश्ता नहीं है. उन को आज तक चीन आने का न्यौता नहीं मिला है. जबकि उनके पिता और दादा कई बार चीन के दौरे पर गए थे.

चार्ल्स कहते हैं कि चीन और उत्तर कोरिया के बीच आज वैसे रिश्ते नहीं, जैसे पहले हुआ करते थे.

सीआईए के पूर्व डिप्टी डिवीज़न चीफ़ ब्रूस क्लिंगर ने उत्तर कोरिया के अधिकारियों के साथ एक दौर में लंबी बातचीत की थी. तब, रूस, चीन, उत्तर कोरिया, दक्षिण कोरिया और जापान के बीच बातचीत का हिस्सा हुआ करते थे. ब्रूस को फिर से उत्तर कोरिया से बातचीत की ज़िम्मेदारी दी गई है.

उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया

ब्रूस बताते हैं कि जब उत्तर कोरिया ने पहला एटमी टेस्ट किया था, तब से ही ये छह देश उत्तर कोरिया को अपना एटमी कार्यक्रम बंद करने के लिए मना रहे हैं. लेकिन उत्तर कोरिया ने एटमी कार्यक्रम बंद करने से साफ़ मना कर दिया था.

ब्रूस के मुताबिक़ बातचीत के दौरान चीन ने उत्तर कोरिया के अधिकारियों के रवैये पर उन्हें कड़ी फटकार लगाई थी. लेकिन उत्तर कोरिया किसी भी क़ीमत पर अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करने को तैयार नहीं था. उत्तर कोरिया के अधिकारी तो युद्ध के लिए भी तैयार थे. उन्होंने एटमी कार्यक्रम बंद करने के एवज में दिए गए तमाम प्रस्ताव सिरे से ठुकरा दिए थे. इससे चीन के अधिकारी बेहद ख़फ़ा हुए थे.

ब्रूस के मुताबिक़ चीन को उत्तर कोरिया की हरकतें पसंद नहीं, लेकिन वो कुछ ख़ास करने की स्थिति में नहीं.

दोनों देशों के रिश्ते किस क़दर बिगड़ चुके हैं, इसकी मिसाल हाल की एक घटना से मिलती है. ब्रूस ने बताया कि इसी महीने जब उत्तर कोरिया ने हाइड्रोजन बम का टेस्ट किया, तो उन्हें समझाने के लिए चीन के अधिकारी प्योंगयांग गए थे. उन्हें उत्तर कोरिया ने तीन दिनों तक इंतज़ार कराया था. पहले ऐसा सोचना भी नामुमकिन था.

ब्रूस बताते हैं कि उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने चीन की वक़ालत करने वाले अपने कई नेताओं को मरवा दिया. इनमें उनके मामा भी शामिल हैं, जिन्हें तोप के मुंह में बांधकर उड़ा दिया गया था.

ब्रूस के मुताबिक़ आज चीन और उत्तर कोरिया के रिश्ते वैसे ही हैं, जैसे किसी और देश के साथ.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मानते हैं कि चीन अगर चाहे तो उत्तर कोरिया की आर्थिक नाकेबंदी कर के उसे बातचीत के लिए मजबूर कर सकता है.

क्या चीन के लिए ये कर पाना मुमकिन है?

वो भी तब, जब उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन के पास हाइड्रोजन बम है.

हार्वर्ड के केनेडी स्कूल में उत्तर कोरिया के विशेषज्ञ जॉन पार्क कहते हैं कि चीन कुछ ख़ास करने की हालत में नहीं. वो उत्तर कोरिया पर नकेल लगाना तो चाहता है, पर लाचार है.

बड़ा सवाल ये है कि क्या चीन, उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था को तबाह होने दे सकता है. अपने पड़ोस में एक बर्बाद देश होने की चीन को भारी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है. अगर तानाशाह उन का राज ख़त्म हुआ, तो, उत्तर कोरिया के एटमी हथियार ग़लत हाथों में पड़ सकते हैं.

जॉन पार्क मानते हैं कि चीन ऐसे हालात से बचना चाहेगा. उत्तर कोरिया की तबाही उसके लिए बड़ा सिरदर्द बन गई है.

उत्तर कोरिया का ज़्यादातर कारोबार चीन से होता है. पाबंदी के बावजूद चीन इस कारोबार को रोकने में नाकाम रहा है. चीन के बहुत से कारोबारी, उत्तर कोरिया में धंधा करते हैं. चीन ने ढाई सौ से ज़्यादा सामान की लिस्ट बनाई है, जिनका उत्तर कोरिया से कारोबार नहीं किया जा सकता. लेकिन चीन के कारोबारी खुलेआम ये काम कर रहे हैं.

जॉन पार्क बताते हैं कि चीन के अधिकारियों ने अपने कारोबारियों को सख़्त एक्शन की चेतावनी दी. मगर वो भी बेअसर है.

चीन पर पड़ सकता है असर

चीन की अपने कारोबारियों पर सख़्ती में आनाकानी की बड़ी वजह है. जॉन पार्क कहते हैं कि उत्तर कोरिया से कारोबार से चीन की एक बड़ी आबादी को फ़ायदा होता है. उसके अपने कारोबारी मालामाल होते हैं. उत्तर कोरिया पर पाबंदी को सख़्ती से लागू करने का असर चीन के कारोबारियों और सीमा से लगे इलाक़ों में रहने वाली चीन की जनता पर होगा. इसीलिए चीन, उत्तर कोरिया के ख़िलाफ़ सख़्त आर्थिक नाकेबंदी से बच रहा है.

वॉशिंगटन में ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के चाइना सेंटर के प्रमुख चेंग ली कहते हैं कि चीन, उत्तर कोरिया को लेकर बहुत मुश्किल में है. वो चाहता है कि उत्तर कोरिया, अपना एटमी कार्यक्रम बंद कर दे. लेकिन, वो अपनी बात मनवाने की हालत में नहीं.

चेंग बताते हैं कि साठ के दशक में चीन ने जब एटमी टेस्ट किया था, तो देश के लोग बहुत ख़ुश हुए थे. उन्हें लगा था कि अब उनका देश पश्चिमी देशों के हमले से सुरक्षित रहेगा. यानी चीन, एटमी हथियारों को दुश्मनों के हमले से बचाने की गारंटी के तौर पर देखता है.

किम जॉन्ग उन और शी जिनपिंग

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इसीलिए जब उत्तर कोरिया का एटमी कार्यक्रम शुरुआती दौर मे था, तब चीन ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की. चीन को उस वक़्त लगता था कि आगे चलकर कहीं जापान और दक्षिण कोरिया भी एटमी हथियार न बना लें. ऐसा हुआ, तो उत्तर कोरिया उनके काम आएगा.

मगर अब उत्तर कोरिया के एटमी हथियार चीन के लिए ही सिरदर्द बन गए हैं. आज हालात ऐसे हैं कि कहीं उत्तर कोरिया, चीन को ही अपना दुश्मन न मान बैठे.

यही वजह है कि चीन, उत्तर कोरिया को पूरी तरह से तेल की सप्लाई बंद नहीं कर पा रहा. चीन, उत्तर कोरिया पर हमले के भी ख़िलाफ़ है. वो उत्तर कोरिया के एटमी ठिकानों को तबाह करने के लिए अमरीकी हमले का भी विरोध करता है.

उत्तर कोरिया सेना

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चीन के ऊपर ही एटम बम न छोड़ दे उत्तर कोरिया

चेंग ली कहते हैं कि चीन को डर है कि अमरीका ने हमला किया तो कहीं उत्तर कोरिया का सनकी तानाशाह किम जोंग उन, उसके ऊपर ही न एटम बम फेंक दे. चेंग ली के मुताबिक़, चीन के पास उत्तर कोरिया पर कार्रवाई के ज़्यादा विकल्प हैं ही नहीं.

चेंग मानते हैं कि चीन की पूरी ताक़त, उत्तर कोरिया को बातचीत की टेबल पर लाने में लगी है. वो चाहता है कि अमरीका, उत्तर कोरिया से कुछ वादे करे. मसलन, उत्तर कोरिया में सरकार बदलने या तानाशाह किम जोंग उन को मारने की कोई कोशिश नहीं होगी. लेकिन, अमरीका, उत्तर कोरिया से बातचीत को राज़ी नहीं.

चीन में कुछ लोग उम्मीद ये भी करते हैं कि आगे चलकर उत्तर कोरिया में आर्थिक सुधार शुरू होंगे. उस देश के दरवाज़े बाक़ी दुनिया के लिए भी खुलेंगे. तब, उत्तर कोरिया सब से भिड़ने से बचेगा.

फिलहाल, ये दूर की कौड़ी लगता है.

कुल मिलाकर ये कहें कि चीन, उत्तर कोरिया की समस्या अकेले सुलझाने की स्थिति मे नहीं है. न ही अमरीका ये काम अकेले कर सकता है. दोनों को इसके लिए मिलकर काम करना होगा.

(बीबीसी के द इन्क्वायरी में यह कार्यक्रम आप पूरा सुन सकते हैं.)

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