रोहिंग्या संकट से बिगड़ गई है कॉक्स बाजार की 'शक़्ल'

    • Author, नितिन श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बांग्लादेश से

बांग्लादेश में इस बात को लेकर चिंता बढ़ रही है कि लाखों रोहिंग्या शरणार्थियों के म्यांमार से भाग आने से पर्यावरण पर क्या असर पड़ेगा.

पिछले डेढ़ महीने के दौरान म्यांमार से रोहिंग्या मुसलमानों के पलायन को दक्षिण एशिया के आधुनिक इतिहास की एक बड़ी घटना बताया जा रहा है.

400,000 से ज़्यादा शरणार्थियों के सीमावर्ती कॉक्स बाज़ार इलाक़े में शरण लेने पर संयुक्त राष्ट्र समेत बड़ी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने मदद जारी रखी है.

लेकिन दूसरी तरफ़ दक्षिण-पूर्वी बांग्लादेश के इस ख़ूबसूरत प्रांत और इसके पर्यावरण पर दबाव बढ़ गया है.

"जंगलों में ही रहना पड़ेगा"

रिफ्यूज़ी कैंपों में रहने वाले भी इस बात को मानते हैं लेकिन उनके पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है.

कुतुपालोंग के एक कैंप में रहने वाले अमीर अहमद म्यांमार के रख़ाइन प्रांत से जान बचा कर आए हैं.

उन्होंने कहा, "न तो यहाँ साफ़ पीने का पानी है और न ही शौचालय. तमाम लोग बीमार पड़ रहे हैं लेकिन कर भी क्या सकते हैं. हम अब भी अस्थायी कैंपों में रह रहे हैं लेकिन अधिकारियों ने दूसरी जगह ढूंढने का अल्टीमेटम दे दिया है. चले तो जाएंगे लेकिन रहना तो इन्हीं जंगलों में ही पड़ेगा न?"

अपने को जातीय हिंसा का शिकार बताते हुए लाखों रोहिंग्या मुसलमान शरण की आस लिए बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार पहुंचे थे.

खेतों को खाली कराया जा रहा

पहाड़ियों पर कैंप बन चुके हैं और उनके रहने के लिए खेतों को खाली कराया जा रहा है.

वैसे इस इलाके में समुद्री तूफ़ान भी आम रहे हैं और इस कारण ज़मीन धँस जाती है.

हफ़्तों से दिन-रात राहत कार्य में जुटे कॉक्स बाज़ार के मजिस्ट्रेट सैफ़-उल-इस्लाम भी पर्यावरण पर पड़ने वाले बुरे प्रभाव के सवाल से इनकार नहीं कर सके.

जवाब दे रहा है लोगों का धैर्य

उन्होंने कहा, "इतने ज़्यादा रोहिंग्या शरणार्थियों के यहाँ रहने से हालात मुश्किल हैं. उन्होंने पेड़ काट दिए हैं और सुरक्षित वन क्षेत्र में रह रहे हैं. सरकार ने उनके रहने के लिए दो हज़ार हेक्टेयर ज़मीन का आवंटन भी कर दिया है लेकिन जंगलों को काटने की वजह से पर्यावरण पर ख़तरा बढ़ गया है".

रोहिंग्या शरणर्थियों के लिए सैंकड़ों कैंप बनाने पड़े हैं.

घुमडुम, जलपैताली, बालूखली, हाकिमपाड़ा, पुतीबुनिया, जादीमुराह और टेकनाफ़ के ब्रिटिश पाड़ा जैसे इलाक़ों में सभी कैंप नए हैं.

कॉक्स बाज़ार की गिनती बांग्लादेश के सबसे लोकप्रिय सैलानी केंद्रों में होती है.

रोहिंग्या मुसलमान यहाँ पर पहले भी आ कर बस चुके हैं. लेकिन इस बार स्थानीय लोगों का धैर्य भी जवाब सा दे रहा है.

"पूरे इलाक़े में बदबू है फैली"

कफ़ीलउद्दीन का परिवार तीन पीढ़ियों से कॉक्स बाज़ार में लकड़ी का व्यापार करता रहा है.

उन्होंने बताया, "ये लोग इलाक़े में हर जगह फैल चुके हैं और हमारे खेतों में भी रह रहे हैं. साफ़-सफ़ाई के अभाव में पूरे इलाके में बदबू फैल रही है. मुझे नहीं पता भविष्य में क्या होगा".

इस ज़िले में इन दिनों लगभर हर सड़क पर ट्रैफ़िक जाम होना आम बात हो चुकी है.

बढ़ी बड़ी लॉरियों में ढाका और चटगांव से राहत सामग्री पहुँचती रहती है.

"पर्यावरण से पहले है मानवता"

ज़िले का अस्पताल पहले ही भर चुका है और रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए एक दूसरा हिस्सा आवंटित करना पड़ा है.

बांग्लादेश सरकार को भी इस बात का अहसास बख़ूबी है कि ये समस्या विकराल हो सकती है.

राजधानी ढाका में देश के क़ानून मंत्री अनीसुल हक़ ने बीबीसी हिंदी से हालात पर अफ़सोस ज़ाहिर किया.

उन्होंने कहा, "ये समस्या पहले भी रही है हालांकि इतनी ख़तरनाक कभी भी नहीं. इसीलिए सरकार इन शरणार्थियों के लिए एक निर्धारित स्थान पर ही रहने की बात दोहराती रही है. हाँ, इतनी बड़ी आबादी का पर्यावरण पर बुरा प्रभाव तो पड़ेगा ही. लेकिन मानवता पहले है".

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