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ग्राउंड रिपोर्ट: म्यांमार से भागे रोहिंग्या हिंदुओं को कौन दे रहा है पनाह?
- Author, नितिन श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बांग्लादेश
शाम होने को है और बांग्लादेश-म्यांमार सीमा पर बसे एक गाँव में लोग खाने की हांडी पर नज़र टिकाए बैठे हैं.
बच्चों के चेहरों पर उत्साह ज़्यादा है क्योंकि पहले खाना उन्हीं को मिलना है. पास में एक नया हैंडपंप लगा है जिससे पानी भरने के लिए कई लोग कतार में हैं.
लेकिन इस कतार से थोड़ा हटकर एक गर्भवती युवती गुम-सुम सी बैठी है.
अनीता धर की उम्र महज 15 साल की है, लेकिन ऐसा लगता है जैसे उन्होंने इतनी कम उम्र में पूरी जिंदगी जी ली है.
पति की सिर धड़ से अलग लाश मिली
बात करते समय उनकी पीड़ा गहराई से निकल कर सामने आती है.
अनीता रुंधे गले से कहती हैं, "काले नक़ाब पहने कुछ लोग आए, लूट-पाट की और मेरे पति को उठाकर ले गए. अगले दिन पास के जंगल में उनकी लाश मिली. सिर धड़ से अलग था और शरीर में हाथ नहीं थे. अपनी कोख में पलने वाले बच्चे के बारे में सोचे बिना मैं वहां से भागी. तीन दिनों तक भूखे पेट घने जंगलों से होकर हम यहाँ पहुँच सके."
अनीता के पति पेशे से नाई थे और 2016 में ही इनकी शादी हुई थी.
160 रोहिंग्या हिंदू परिवार पहुंचे बांग्लादेश
अनीता की तरह 160 रोहिंग्या हिंदू परिवार हाल ही में म्यांमार से भाग कर बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार के कुतुपालोंग इलाक़े में पहुँच सके हैं.
म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमानों के अलावा हिंदुओं की आबादी भी रहती रही है.
डेढ़ महीने पहले क़रीब साढ़े चार लाख रोहिंग्या मुस्लिमों की तरह हिंदू भी भाग कर आए हैं हालांकि ऐसा पहली बार हुआ है.
रोहिंग्या हिंदुओं के पास भी नागरिकता नहीं
इस प्रांत के रोहिंग्या मुस्लिमों की तरह ही अल्पसंख्यक हिंदुओं के पास भी नागरिकता नहीं है.
क़रीब डेढ़ महीने पहले म्यांमार से भाग कर आए 550 हिंदू लोगों में लगभग सभी का कहना है कि वे जातीय हिंसा का शिकार होकर भागे हैं.
शोभा रूद्र भी इन्हीं शरणार्थियों में से एक हैं और सिर्फ़ इसी बात से संतुष्ट दिखीं कि उनके साथ उनका परिवार ज़िंदा निकल भागने में सफल रहा.
रेप के बाद चचेरी बहन को मार डाला
शोभा बताती हैं, "भरा-पूरा परिवार था हमारा. एक शाम मेरे चाचा के घर पर हमला हुआ और उन्हें गोली मार दी गई. बलात्कार करने के बाद मेरी चचेरी बहन को भी मार डाला. हमें भागना पड़ा और वो सब इतना दर्दनाक है कि हम कभी वापस नहीं जाएंगे. यहाँ पर हम शांति से तो हैं. कोई हमें खदेड़ नहीं रहा है."
दरअसल इस सीमावर्ती गाँव में 25 हिंदू परिवार रहते हैं जिन्होंने आगे बढ़ इन शरणार्थियों को पनाह दी है.
खुद संपन्न नहीं लेकिन दी लोगों को शरण
हालाँकि स्थानीय अल्पसंख्यक हिंदू संपन्न नहीं दिखते लेकिन दूसरी संस्थाओं की मदद से गाँव के मुर्गी फ़ार्म पर एक बड़ा कैंप खड़ा कर दिया गया है.
सुबह शाम खाना पकता है और सभी को परोसा जाता है. कैंप के चारों तरफ बने घरों में महिलाओं और बच्चों के रहने की भी व्यवस्था की गई है.
इसी गाँव में जन्मे बाबुल के परिवार में चार लोग हैं लेकिन उन्होंने भी पांच शरणार्थियों को अपने घर में जगह दी.
पराए देश में मिला सहारा
उन्होंने बताया, "हमने देखा ये लोग बेघर हैं और इन्हें मदद की ज़रूरत है. मेरी अपनी कोई ज़मीन नहीं कि मैं इन्हें घर बनाने के लिए दे सकूँ. इसलिए मैंने इन लोगों को अपने घर में शरण दी."
भाग कर आए शरणार्थियों में लगभग सभी को यहाँ पहुँचने में कई दिन लगे हैं.
अपना जन्मस्थान छोड़ने के दौरान इन्होंने अपनों को खोया है. लेकिन अब, कम से कम एक पराए देश में उन्हें अपने जैसे लोगों का सहारा मिल गया है.
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