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जर्मनी चुनाव: मर्केल जीत तो गईं, लेकिन सरकार चलाना होगी चुनौती
- Author, अनवर जमाल अशरफ़
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, जर्मनी से बीबीसी हिंदी के लिए
जर्मनी में एंगेला मर्केल चौथी बार चासंलर बनने जा रही हैं, लेकिन चुनावी नतीजे उम्मीद के मुताबिक़ नहीं आ रहे हैं. राष्ट्रवादी पार्टी एएफ़डी को 13 फ़ीसदी जनाधार मिला है जिसके लिए मर्केल के विचारों में साफ़गोई का न होना ज़िम्मेदार है.
क्या मर्केल को मिली अधूरी जीत?
एंगेला मर्केल को पिछली बार 40 फ़ीसदी से अधिक वोट मिले थे, लेकिन इस साल ये घटकर 30-32 फ़ीसदी पर आ गया है.
मर्केल को इस आम चुनाव में जीत ज़रूर हासिल हुई है, लेकिन उनके सामने चुनौतियां तमाम हैं.
इनमें सबसे पहली चुनौती ये है कि उन्हें सरकार बनानी है.
अब तक मर्केल की पार्टी की नियमित सहयोगी रही एसपीडी ने कहा है कि वह इस बार विपक्ष में बैठना पसंद करेगी.
इसके साथ ही उन्हें संसद पहुंच रही एएफ़डी जैसी धुर-दक्षिणपंथी पार्टियों से भी जूझना होगा.
सबसे कद्दावर महिला नेता
मर्केल को कुछ सर्वे में दुनिया की सबसे कद्दावर महिला नेता चुना जा चुका है.
वे इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुकी हैं, लेकिन यहां से आगे मर्केल को बहुत कुछ साबित करना है.
जब आप जर्मन लोगों से बात करेंगे तो वे कहेंगे कि नाज़ी दौर उनके इतिहास पर एक धब्बा है और उन्हें इसके साथ जीना है.
जर्मन लोग अपने नाज़ी इतिहास को लेकर बेहद संवेदनशील हैं. ऐसी स्थिति में अगर शरणार्थी विरोधी धुर दक्षिणपंथी पार्टी आगे आती है. एक ऐसी पार्टी जो मुसलमानों के ख़िलाफ़ है और जिसका एक नेता द्वितीय विश्वयुद्ध में नाज़ी सेना की कार्रवाई को उचित ठहराने की कोशिश करता है.
अगर ऐसी पार्टी को 13 फ़ीसदी वोट मिलते हैं तो ये जर्मनी में बदलती सियासी हवा का संकेत है.
ख़ासकर जर्मनी के संदर्भ में क्योंकि जर्मन लोग काफ़ी खुले दिल के होते हैं वे बड़े संवेदनशील होते हैं क्योंकि उन्होंने झेला है.
मर्केल के वोट दक्षिणपंथी पार्टी को गए?
जर्मन संसद में पहुंचने के लिए किसी भी पार्टी को 5 फ़ीसदी वोट की ज़रूरत पड़ती है. पिछली बार एएफ़डी साढ़े चार फ़ीसदी वोट पर रुक गई थी. लेकिन यहां से उसके 13 फ़ीसदी तक पहुंचने का सफ़र अहम है.
ये वो वोट हैं जो मर्केल की पार्टी से कटकर आए हैं.
यूरोप में होने वाले चुनावों के मुद्दे स्पष्ट होते हैं. इनमें ग्रीस को समर्थन, यूरोपीय संघ को समर्थन देने का मुद्दा, तुर्की को लेकर नज़रिया जैसे मुद्दे शामिल थे.
बीते चार सालों से मर्केल की पार्टी जनता तक अपने जवाब साफ़गोई से नहीं पहुंचा पाई है.
मर्केल सरकार शरणार्थियों के मामले में भी ढुलमुल रवैया अपनाती रही है. ऐसे में लोगों में इन सवालों के जवाब न मिलने पर जो गुस्सा था वो एएफ़डी को 13 फ़ीसदी जनाधार के रूप में सामने आया है क्योंकि एएफ़डी कम से कम अपनी बातों को लेकर साफ़ तो है.
जर्मनी में हमेशा से गठबंधन की सरकारें बनती आई हैं, लेकिन इसमें आसानी ये रहती थी कि दो पार्टियां मिलकर गठबंधन कर लेती थीं.
लेकिन इस बार दिक्कत ये है कि मर्केल की पार्टी के पास 32 फ़ीसदी वोट है. पिछली सरकार में मर्केल की सहयोगी रही एसपीडी के पास 20 फ़ीसदी के आस-पास वोट है.
लेकिन एसपीडी ने अबकी बार विपक्ष में बैठने का फ़ैसला कर लिया है. ऐसे में मर्केल को सरकार बनाने के लिए दो पार्टियों के साथ गठबंधन करना होगा जो एफ़डीपी और द ग्रीन हो सकती हैं. इनके पास नौ-नौ फ़ीसदी वोट है. इन्हें मिला लें तो कुल शेयर 18 फ़ीसदी हो जाएगा.
लेकिन दिक्कत ये है कि ये दोनों पार्टियां साथ काम नहीं कर सकतीं. कम से कम अब तक तो नहीं किया है. ऐसे में इन दोनों को एक मंच पर लाना मर्केल के लिए बड़ी चुनौती होगी.
(बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय के साथ बातचीत पर आधारित)
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