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नज़रिया- 'रियलिटी और फिक्शन को मिक्स करना ट्रंप की आदत'
- Author, प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान
- पदनाम, डेलावेयर विश्वविद्यालय, अमरीका
ट्रंप के भाषण में दो-तीन चीज़ें साफ़ नज़र आईं. एक तो ये कि चुनाव प्रचार के दौरान ही उन्होंने ये साफ़ कर दिया था कि अमरीकी हितों को वे अपनी विदेश नीति में सबसे आगे रखेंगे.
इसी बात को ट्रंप बार-बार दोहरा रहे हैं. लेकिन इसके बारे में ट्रंप विस्तार से कुछ बता नहीं रहे हैं कि 'अमरीका फर्स्ट पॉलिसी' का आख़िर मतलब क्या है और संयुक्त राष्ट्र पर इसका क्या असर होगा.
लेकिन दूसरी चीज़ ये हुई है कि ट्रंप ने अपने भाषण में संयुक्त राष्ट्र की आलोचना के साथ-साथ थोड़ी तारीफ भी की और कहा कि संयुक्त राष्ट्र बहुत अहम और जरूरी काम करता है.
अमरीकी सैन्य कार्रवाई
ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र के बजट का भी जिक्र किया. ट्रंप का इशारा संयुक्त राष्ट्र के संसाधनों की बर्बादी की तरफ था.
अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति के उलट ट्रंप का उत्तर कोरिया को संयुक्त राष्ट्र में धमकी देना भी एक असामान्य बात है.
अतीत में किसी भी अमरीकी राष्ट्रपति ने इस तरह की धमकी नहीं दी. इससे पहले जो भाषण याद आता है कि वो जॉर्ज डब्ल्यू बुश का था.
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में इराक़ को 'एक्सिस ऑफ इविल' या 'बुराई की जड़' कहा था. वे इराक़ पर अमरीकी सैन्य कार्रवाई के लिए संयुक्त राष्ट्र का समर्थन चाह रहे थे.
इस्लामिक स्टेट
लेकिन उन्होंने भी इस तरह की धमकियां नहीं दी थीं कि वे इराक़ को पूरी तरह से ख़त्म कर देंगे. ट्रंप की ये आदत रही है कि वे रिएलिटी और फिक्शन को मिक्स कर देते हैं.
उन्होंने कथित इस्लामिक स्टेट के बारे में ये दावा किया कि पिछले आठ महीनों में अमरीका ने इस्लामिक स्टेट को उतना तबाह किया है जितना पिछले कई सालों में नहीं हो सका था.
ये बहुत अजीब सी बात है, ट्रंप के आने के बाद अमरीका ने इस्लामिक स्टेट पर केवल दो ही हमले किए हैं.
इस्लामिक स्टेट की ताकत को जितना भी नुक़सान पहुंचाया गया है वो पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के जमाने की नीतियों के वजह से है.
मोसुल में इस्लामिक स्टेट का पतन जनवरी में तभी शुरू हो गया था जब राष्ट्रपति ट्रंप ने सत्ता की बागडोर संभाली थी.
ट्रंप के भाषण का टोन
ट्रंप ने अमरीका की हैसियत बढ़ाते हुए संयुक्त राष्ट्र में ऐसी ही बातों का जिक्र किया.
संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर दो किस्म के भाषण दिए जाते हैं. एक भाषण ऐसा होता है जिसमें एक वैश्विक नज़रिए की बात की जाती है.
संयु्क्त राष्ट्र में ट्रंप का ये पहला भाषण था. ट्रंप के पास एक मौका था कि वे दुनिया एक सामने एक नज़रिया रखते जो दुनिया को भी पसंद आती.
सारी दुनिया अमरीका को एक लीडर के तौर पर देखती आई है. शांति, स्थिरता, विकास और तरक्की के लिए सबकी नज़रें अमरीका की तरफ होती हैं.
ट्रंप ने अमरीका फर्स्ट का जो नारा लगाया है, वो दुनिया के नेतृत्व को छोड़ने वाला है.
उन्होंने ये भी कहा कि दुनिया में जहां-जहां समाजवाद और साम्यवाद आया है, वहां तबाही के अलावा और कुछ नहीं आया है.
इस लिहाज से ट्रंप का भाषण कमजोर कहा जा सकता है. ट्रंप ने अहम मुद्दों पर कुछ नहीं कहा, म्यांमार के रोहिंग्या संकट पर वे खामोश रहे.
(बीबीसी संवाददाता हरिता कांडपाल से बातचीत पर आधारित)
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