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नरेंद्र मोदी ने साबित किया कि भारत का बंटवारा सही थाः इमरान ख़ान
पाकिस्तान में क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान ख़ान ने कहा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध अपने सबसे बुरे दौर में है.
भारत विभाजन के 70 साल होने पर पाकिस्तान तहरीक़-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) के इस नेता ने कहा कि नरेंद्र मोदी की सरकार ने यह साबित कर दिया है कि बंटवारे का फ़ैसला सही था.
बीबीसी के इंज़माम राशिद से ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा, "मैं यह सोचता हूं कि दोनों देशों के बीच का रिश्ता अपने सबसे बुरे दौर में है. इसकी मुख्य वजह हैं भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी."
इमरान ख़ान ने कहा, ''नरेंद्र मोदी की सोच सांप्रदायिक है और उनके संबंध हिंदू चरमपंथियों से हैं. जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब भी उनकी मुस्लिम विरोधी छवि सामने आई थी.''
वाजपेयी का कार्यकाल बेहतर
ख़ान आगे कहते हैं, "हमलोगों ने यह सोचा था कि जब वो प्रधानमंत्री बनेंगे तो इन सभी चीज़ों से ऊपर उठ जाएंगे."
"भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी उसी पार्टी से हैं, जिससे नरेंद्र मोदी संबंध रखते हैं. जब वाजपेयी प्रधानमंत्री बने थे तो यह चिंता थी कि दोनों देशों के बीच तल्खी बढ़ सकती है, लेकिन उनके कार्यकाल में दोनों देश शांति के क़रीब थे."
ख़ान ने कहा, "नरेंद्र मोदी एक विशाल जनादेश के साथ आए हैं. हमलोग और क़रीब आ सकते थे लेकिन निराशा हाथ लगी है."
भारतीय मुसलमान निराश
उन्होंने कहा कि मोदी ने न सिर्फ़ पाकिस्तानी को बल्कि भारतीय मुसलमानों को भी निराश किया है. उन्होंने भारत के उदारवादी सोच रखने वाले सभी वर्ग को निराश किया है.
"नरेंद्र मोदी भारत को वहां ले गए हैं, जहां यह सोच होती थी कि भारत में मुसलमानों को समानता का अधिकार नहीं मिलेगा."
भारत-पाकिस्तान बंटवारे को याद करते हुए इमरान ने कहा, "जब हम बड़े हो रहे थे, हमारे माता-पिता की पीढ़ी बंटवारे को लेकर यह सोचती थी कि भारत में उन्हें समान अवसर और अधिकार नहीं दिए जाएंगे. नरेंद्र मोदी ने इस सोच को सही साबित कर दिया है."
नफ़रत के साथ बड़े हुए लोग
दोनों देशों के बीच बंटवारे को याद करते हुए इमरान ख़ान बताते हैं, "मेरी पीढ़ी बंटवारे के बाद जन्मी पहली पीढ़ी थी. जब पाकिस्तान पांच साल का हुआ था, मेरा जन्म हुआ था. मुझे आज भी याद है बंटवारे का दर्द. बंटबारे में लगभग हर परिवारों ने अपना खोया था. यह स्थिति सिर्फ़ पाकिस्तान की नहीं थी, भारत के लोगों ने भी यह दर्द झेला था."
उन्होंने आगे बताया, "हमलोग भारत के खिलाफ एक नफरत के साथ बड़े हुए थे. भारत के लोग भी इसी नफ़रत के साथ बड़े हुए."
"संबंधों में धीरे-धीरे खटास बढ़ती चली गई. 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध का होना, 1971 में पाकिस्तान को बांटकर बंगलादेश का निर्माण, जिसमें भारत का भी हाथ था, इन सभी घटनाओं ने रिश्तों को संभलने नहीं दिया."
क्रिकेट पर हावी हुई नफ़रत
रिश्तों की खटास का क्रिकेट पर क्या असर पड़ा, इस सवाल पर इमरान बताते हैं, "मैं पहली बार 1977 में भारत गया था. मैंने यह महसूस किया था दोनों देशों की संस्कृति कितनी मिलती जुलती है."
"1978 में पहली बार मैंने भारत के ख़िलाफ़ मैच खेला था. इससे पहले एक्जीबिशन मैच खेला करता था. दर्शक इन मैचों के दौरान ख़ूब उमड़ती थी. उनका हमलोगों पर काफ़ी दवाब होता था. भारत के खिलाफ मैच सिर्फ़ खेल नहीं होता था."
वह याद करते हुए आगे बताते हैं , "1987 में मेरी दूसरी क्रिकेट यात्रा भारत के लिए थी. अहमदाबाद में टेस्ट मैच चल रहा था. दर्शकों की भीड़ शत्रूतापूर्ण व्यवहार कर रही थी. इससे में काफ़ी चकित था."
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