ट्रंप राज में क्यों गिर रहा है डॉलर?

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अमरीकी डॉलर में इस साल लगातार गिरावट दर्ज की गई है.
छह प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले डॉलर के मूल्य सूचकांक में लगभग 10 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. यह गिरावट जनवरी माह के बाद देखी गई है.
अमरीका और उत्तर कोरिया के बीच तनातनी के बीच शुक्रवार को डॉलर अपने निचले स्तर पर पहुंच गया.
सूचकांक पिछले साल के मुकाबले थोड़ा ही गिरा है, लेकिन इसमें पिछले साल भी गिरावट दर्ज की गई थी.

यूरो हुआ मज़बूत
यूरोप की अर्थव्यवस्था के लिहाज़ से यह एक अच्छी खबर है.
साल 2014 में डॉलर के मुकाबले यूरो काफी कमज़ोर था. ऐसा तब हुआ था जब यूरोप के केंद्रीय बैंकों ने प्रोत्साहन नीति आपनाई थी, जबकि अमरीका इससे दूरी बनाने लगा था.
अब यूरोप की अर्थव्यवस्था सुधर रही है. इमैनुएल मैक्रों के चुनाव जीतने के बाद यूरो मज़बूत हुआ है.
यूरो का फायदा यह है कि डॉलर कमज़ोर हो रहा है. आज एक यूरो की कीमत 1.17 डॉलर से ज़्यादा है, जो पिछले साल के मुकाबले दस सेंट अधिक है.

पिछड़ रहा ट्रंप का आर्थिक एजेंडा
यह सिर्फ यूरो की कहानी नहीं है. डॉलर अन्य देशों की मुद्राएं, जैसे जापान के येन, मैक्सिको की पेसो और स्वीडेन के क्रोना के आगे भी कमज़ोर हो रहा है. इतना ही नहीं, ब्रेक्जिट के बाद ब्रिटिश पॉन्ड भी डॉलर के मुकाबले मजबूत हुआ है.
साल 2016 के अंतिम महीनों में डॉलर काफी मज़बूत था. टैक्स में कटौती और बुनियादी ढांचे में निवेश की उम्मीदों के बाद ऐसा लगा था कि डॉलर की मांग बढ़ेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.
अब ऐसा लग रहा है कि ट्रंप का आर्थिक एजेंडा पिछड़ रहा है.
अमरीकी चुनाव में रूस के कथित हस्ताक्षेप की चल रही पड़ताल ने ट्रंप प्रशासन की मुश्किलें बढ़ा दी है. दूसरी तरफ इस सप्ताह उत्तर कोरिया और अमरीका के बीच तनातनी भी बढ़ी है.
उच्च ब्याज़ दर मजबूत अर्थव्यवस्था से जुड़ा होता है. उच्च दरें निवेश को बढ़ावा देती है. लेकिन अभी ब्याज दरें अभी काफी कम है.
फेडरल रिजर्व बैंक के अध्यक्ष जनेट येलेन ने हाल ही में कहा था कि भविष्य में बेहतरी के आसार दिख रहे हैं लेकिन ब्याज दरें फिर भी कम रहेगी.
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