You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
ब्रितानी सिख दंपति का दावा, बच्चा गोद लेने में नस्ल के आधार पर भेदभाव
ब्रिटेन की एक एडॉप्शन एजेंसी ने कथित तौर पर एक सिख दंपति को उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की वजह से बच्चा गोद लेने के लिए आवेदन नहीं करने की सलाह दी थी.
ये दावा ब्रितानी सिख दंपति संदीप और रीना मंदर ने किया है.
संदीप और रीना मंदर का कहना है कि 'एडॉप्ट बर्कशर' ने उन्हें सलाह दी थी कि गोद देने के लिए गोरे ब्रितानी या यूरोपीय आवेदकों को तरजीह दी जाएगी क्योंकि केवल गोरे बच्चे ही ज़रूरतमंद थे.
एडॉप्शन एजेंसियों के लिए नस्ल के आधार पर किसी को तरजीह देना गैरक़ानूनी नहीं है. संदीप मंदर ने कहा, "उन्होंने हमारे आवेदन पर आगे नहीं बढ़ने का फ़ैसला हमारी चमड़ी के रंग के आधार पर लिया."
इस पर एडॉप्ट बर्कशर के प्रवक्ता ने कहा, "अदालत में विचाराधीन मामलों पर हम टिप्पणी नहीं करते."
पृष्ठभूमि का सवाल
बच्चा पैदा करने के लिए मेडिकल मदद लेने के बावजूद नाकाम रहे इस जोड़े ने गोद लेने के लिए आवेदन किया था.
संदीप मंदर ने बीबीसी से कहा, "हमने इसके बारे में छह महीने तक सोचा, ये ऐसी बात थी जो हम वाकई चाहते थे. उन्होंने हमारी पृष्ठभूमि के बारे में पूछा. हमने उन्हें बताया कि हम भारत से हैं और तब हमें बताया गया कि वे हमें तरजीह नहीं दे पाएंगे."
ब्रिटेन में ज़रूरतमंद बच्चे के संभावित अभिभावक की तलाश में नस्ल के आधार पर किसी को तरजीह देने का प्रावधान है.
लेकिन इसके साथ ही सरकार का ये भी कहना है कि बच्चे की पृष्ठभूमि गोद देने में बाधा नहीं बननी चाहिए.
मंदर का कहना है, "भले ही मेरी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि भारतीय हो लेकिन मेरा भारत से कोई जुड़ाव नहीं है. मैं एक ब्रितानी व्यक्ति हूं. हम एक खुशहाल दंपती हैं. और आर्थिक रूप से भी हम सक्षम हैं."
मंदर दंपति ये मामला काउंटी कोर्ट में उठाने जा रहे हैं. इनके पक्ष में इक्वलिटी एंड ह्यूमन राइट्स कमीशन भी है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)