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क़तर पर खाड़ी देशों के बैन की वजह से शिया-सुन्नी के झगड़े में फंसेगा भारत?
- Author, प्रोफ़ेसर आफ़ताब कमाल पाशा
- पदनाम, जेएनयू, दिल्ली
खाड़ी देशों में करीब 70 लाख भारतीय काम करते हैं जबकि क़तर में सिर्फ 6 लाख.
इस गतिरोध के भारतीयों पर असर की बात करें तो भारतीय खाड़ी के देशों में और बाहर भी क़तर एयरवेज़ के विमानों से जाते थे.
वो इससे काफ़ी प्रभावित हुए हैं, क्योंकि क़तर एयरवेज़ कम-से-कम 14 भारतीय शहरों से सीधी फ्लाइट दुबई, दोहा और कुवैत जाती थी और इनका किराया काफ़ी कम रहता था. ऐसे में हज़ारों लोग इससे प्रभावित होंगे.
खाड़ी देशों में भारत के कई करोड़पति व्यापारियों का क़तर में काफी निवेश है. फिर चाहे वो रियल स्टेट बिजनेस हो या एक्सपोर्ट, इंपोर्ट. ऐसे में ज़मीन, हवा और समंदर बॉर्डर बंद करने से इन लोगों का काफी नुक़सान होगा.
क़तर मसले से भारत कैसे निबटेगा?
क़तर में जो 6 लाख भारतीय हैं, इन लोगों की परेशानियां भी बढ़ सकती हैं. ऐसे में क़तर मसले पर भारत की भूमिका की बात करूं तो मुझे नहीं लगता कि भारत के ईरान से अच्छे संबंध हैं.
क्योंकि हाल में रवैया काफी ठंडा रहा है. हालांकि पीएम मोदी ईरान गए थे. लेकिन दो तीन मसलों पर ईरान और भारत के ताल्लुकात नाज़ुक दौर से गुज़र रहे हैं. इनकी मुख्य वजह हैं:
- चाबहार पोर्ट से ईरान परेशान है
- फरहाद ऑयल और गैस ब्लॉक को लेकर भारत-ईरान के समझौते
- कुलभूषण जाधव जो पाकिस्तान की कैद में है, उन्हें भी चाबहार के पास से पकड़ा गया था. ऐसे में भारत को लगता है कि कुलभूषण मसले पर ईरान सहयोग नहीं दे रहा है.
क्या हुआ सऊदी अरब के वादों का?
इन कुछ बातों से ईरान और भारत के ताल्लुकात इतने गहरे नहीं हैं, जितना बाहर के लोग सोचते हैं. जहां तक सऊदी अरब का सवाल है, वहां मोदी गए थे. स्वागत भी काफी गर्मजोशी से हुआ था.
लेकिन सऊदी अरब की तरफ से भारत में मनमोहन और मोदी के शासन में जो निवेश के वादे किए गए थे. वो अब तक पूरे नहीं हुए हैं.
राहील शरीफ जब से इस्लामिक टेररिज़्म एलायंस के प्रमुख बने हैं, यहां परेशानी हुई हैं.
ट्रंप जब रियाद आए थे और करोड़ों रुपये की जो आर्म्स डील हुई है, जिसमें पाकिस्तानी सलाहकार भी शामिल हुए. इससे भारत को भी काफी दिक्कत रही है.
भारत किसका लेगा पक्ष?
सऊदी या क़तर का पक्ष लेने के मामले में भारत काफी नाज़ुक दौर से गुजर रहा है. क्योंकि एनर्जी सिक्योरिटी, भारतीय मज़दूरों, व्यापार, फूड सिक्योरिटी, सुरक्षा और स्थायित्व के मद्देनज़र खाड़ी देशों में शांति रहना भारत के आर्थिक फायदों के लिए बेहद ज़रूरी है.
लेकिन रणनीतिक पहलू की बात करें तो भारत के लिए ईरान महत्वपूर्ण है. क्योंकि अगर ईरान और पाकिस्तान जुड़ जाते हैं तो काफी बैलेंस ऑफ पावर काफी प्रभावित होगा. ईरान के साथ अगर अच्छे ताल्लुकात नहीं होगा तो भारत की अफ़ग़ान पॉलिसी पर भी सवाल खड़े होंगे.
क़तर पर प्रतिबंध, इसराइल का हाथ?
एक जो नई बात उभर कर आ रही है, वो ये कि इन सब के पीछे इसराइल का हाथ भी काफी गहरा है, क्योंकि वो न्यूक्लियर डील के खिलाफ था. ईरान, सऊदी अरब और अमारात (यूएई) के बीच काफी गर्मजोशी हो रही है. इसराइल और यूएई के बीच दो मिलिट्री एक्सरसाइज़ भी हुई हैं.
जो मीडिया वगैरह के सलाहकार हैं, वो अमेरिका यहूदी हैं. उनके कब्ज़े में पॉलिसी चली गई है. तो ये शिया सुन्नी से लेकर अरब-पर्शियन, इसराइल और मोनार्की के बीच हो गया है.
शिया-सुन्नी के झगड़े में फंसा भारत!
जो गल्फ फेडरेशन सऊदी अरब चाहता था, उसे सिर्फ बहरीन का समर्थन मिला है. ऐसे में जो शिया और सुन्नी के झगड़े में गहराई से शामिल होता जा रहा है. अब देखना ये है कि यूएई ने जो निवेश का वादा किया है, जिसकी अभी तक शुरुआत भी नहीं हुई है. उसका क्या होगा.
सऊदी अरब से करीबी संबंध होने के बावजूद पाकिस्तान का संबंध न तोड़ना बेहद अहम है.
दरअसल पिछली बार जब सऊदी अरब ने पाकिस्तान से सैनिकों को यमन युद्ध में भेजने के लिए कहा था, तब पाक ने इंकार किया था. तो वही पॉलिसी अब भी देखने को मिलती है. क्योंकि पाकिस्तानी भी वहां हैं और गैस भी वहीं से आती है तो पाकिस्तान के ताल्लुकात ईरान से गहरे हैं बजाय भारत के.
भारत के मुकाबले पाकिस्तान का झुकाव भी ईरान की तरफ ज्यादा है.
(जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पश्चिम एशिया मामलों के प्रोफेसर आफ़ताब कमाल पाशा से बीबीसी संवाददाता रेहान फ़ज़ल की बातचीत पर आधारित)
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