अमरीका-सऊदी अरब: ये रिश्ता क्या कहलाता है?

    • Author, रज़ा हमदानी
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, इस्लामाबाद

डोनल्ड ट्रंप ने बतौर अमरीकी राष्ट्रपति अपने पहले विदेश दौरे के लिए सऊदी अरब को चुना. यहां वे अरब इस्लामिक अमेरिकन बैठक में हिस्सा ले रहे हैं.

ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में छह मुस्लिम बहुल देशों के लोगों के अमरीका आने पर रोक लगाने की कोशिशें शुरू की हैं.

हालांकि ट्रंप की मुहिम फ़िलहाल अमरीकी अदालतों में लंबित है लेकिन इस वजह से उन्हें इस्लाम विरोधी क़रार दिया जा रहा था.

लेकिन इन सबके बीच वे अपने पहले विदेश दौरे किसी मुस्लिम देश में गए हैं. अमरीका और सऊदी अरब का रिश्ता सात दशकों से चला आ रहा है.

70 साल पुराने इस रिश्ते में सबसे ख़ास बात तेल के बदले सुरक्षा मुहैया कराना है. लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के रिश्तों में उतार-चढ़ाव आते रहे हैं.

सऊदी अरब के तेल के इतिहास में अमरीकी रोल

सऊदी अरब ने अपनी पहली तेल सब्सिडी के सिलसिले में साल 1933 में अमरीकी कंपनी स्टैंडर्ड ऑयल के साथ करार किया.

पांच साल बाद सऊदी अरब के पूर्वी क्षेत्र दम्माम में तेल के भंडार का पता चला.

साल 1944 में अरीबियन अमेरिकन ऑयल कंपनी (अरामको) का गठन किया गया जो 1952 तक न्यूयॉर्क में स्थित रही.

सऊदी सरकार ने 1980 में इस कंपनी को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में ले लिया.

लाल सागर में जंगी जहाज पर रिश्तों की शुरुआत

अमरीका और सऊदी अरब के सामरिक रिश्तों की शुरुआत आधुनिक सऊदी अरब के संस्थापक शाह अब्दुल अजीज अल सऊद के ज़माने में हुई जब वह अमरीकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रुजवेल्ट से 1945 में अमरीकी नौसैनिक युद्धपोत यूएसएस क्वींस पर मिले.

स्वेज़ नहर में होने वाली इस बैठक में दो महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात हुई.

एक फलीस्तीन में यहूदी देश की स्थापना और दूसरा सऊदी अमरीका करार जिसके तहत अमरीका सऊदी अरब को सुरक्षा मुहैया कराएगा और बदले में अमरीका को सऊदी अरब का तेल मिलेगा.

इसराइल और तेल पर पाबंदी

1973 के अरब-इसराइल संघर्ष के दौरान ओपेक ने इसराइल का समर्थन करने वाले देशों को तेल देने पर प्रतिबंध लगा दिया था.

इन देशों में अमरीका भी शामिल था. इस प्रतिबंध ने अमरीका और विश्व अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया था.

अफ़ग़ानिस्तान और सोवियत संघ

1979 में सोवियत संघ अफगानिस्तान में दाखिल हुआ जिसके मुकाबले में मुजाहिदीन फौज तैयार की गई.

इस फौज की तैयारी में अमरीका का साथ सऊदी अरब और पाकिस्तान ने दिया.

इस फौज में ओसामा बिन लादेन समेत हजारों सुन्नी लड़ाके शरीक हुए जो बाद में अल कायदा के प्रमुख भी बने.

सद्दाम का कुवैत पर हमला

1991 में इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर हमला किया तो कुवैत से इराकी सेना को निकालने के लिए अमरीका ने सऊदी अरब में फौज भेजी.

सख्त रुख रखने वाली कुछ सऊदी धार्मिक हस्तियों ने सऊदी अरब में अमरीकी सेना की तैनाती की निंदा की.

अमरीकी सेना की सऊदी अरब से वापसी 2003 में हुई जब इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन का तख्ता पलट दिया गया.

अमरीका और सऊदी अरब के बीच आतंकवाद विरोधी सहयोग के रिश्ते अधिक मजबूत हुए.

और स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट के अनुसार सऊदी अरब अमरीका सबसे अधिक हथियार खरीदने वाला देश बन गया.

सितंबर 11 के हमले

अमरीका और सऊदी अरब के बीच संबंध 11 सितंबर 2001 में अमरीका पर हमले के बाद खराब हुए जिनमें तीन हज़ार लोग मारे गए.

जिन 19 अपहरणकर्ताओं ने विमान अपहरण किए थे उनमें से 15 का संबंध सऊदी अरब से था.

सद्दाम हुसैन और बुश

2003 में सऊदी अरब ने अमरीका से इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को हटाने के निर्णय का विरोध किया.

इसीलिए सऊदी अरब ने अमरीकी गठबंधन का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया. सऊदी अरब का कहना था कि सद्दाम हुसैन को हटाए जाने से इराक संप्रदायों में बंट जाएगा.

ओबामा और ईरान

2015 में अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की ओर से ईरान के साथ परमाणु समझौता करने पर सऊदी अरब को अहसास हुआ कि उसे दुत्कारा गया है.

सऊदी अरब ने अन्य तेल संपन्न सुन्नी अरब देशों के साथ आक्रामक विदेश नीति अपनाई.

इस नीति के कारण उसने बहरीन में लोकतंत्र के पक्ष में होने वाले प्रदर्शनों को कुचलने के लिए सेना भेजी, मिस्र में अब्दुल फतह सीसी की तरफ से सरकार पलटने का समर्थन किया, और यमन में जारी गृहयुद्ध में अपनी सेना को उतार दिया.

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने एक बयान में सऊदी अरब के साथ संबंधों को 'जटिल' करार दिया था.

सऊदी अरब पर मुकदमा करने का बिल

सितंबर 2016 में अमरीकी कांग्रेस ने एक विधेयक पारित किया जिसके तहत 11 सितंबर के हमलों में शामिल होने पर सऊदी अरब पर अमरीकी नागरिक मुकदमा दायर कर सकते हैं.

इस विधेयक को रुकवाने के लिए व्हाइट हाउस और सऊदी अरब ने बेहद कोशिश की लेकिन नाकाम रहे.

सऊदी अरब ने यहां तक ​​कहा कि अगर यह विधेयक पारित किया गया तो सऊदी अरब अमरीका में अपना निवेश समाप्त कर लेगा.

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रं

ट्रंप ने राष्ट्रपति पद संभालने के बाद सऊदी अरब के साथ संबंधों को बेहतर बनाने के प्रयास शुरू कर दिए.

इसके साथ उन्होंने इस बात का भी ऐलान किया कि उनके अनुसार ईरान के साथ परमाणु समझौता एक बहुत बड़ी ग़लती थी.

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