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'बहुसंख्यकों की धार्मिक कट्टरता उन्हें ही नुक़सान पहुँचाती है'
- Author, इक़बाल अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इतिहास गवाह है कि जब भी किसी देश में धार्मिक कट्टरता का बोलबाला हुआ तो सिर्फ़ अल्पसंख्यकों का नहीं बल्कि वहां के बहुसंख्यक समुदाय का भी अत्यधिक नुक़सान हुआ.
ये कहना है पाकिस्तान के जाने माने मानवाधिकार कार्यकर्ता इब्न-ए-अब्दुर्रहमान का. इब्न-अब्दुर्रहमान कई वर्षों तक पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष रहे हैं.
उन्होंने 1994 में भारत-पाक पीपुल्स फ़ोरम का गठन किया था ताकि भारत और पाकिस्तान की आम जनता एक दूसरे से ज़्यादा से ज़्यादा मिल सके.
इसी सिलसिले में वो पिछले दिनों दिल्ली आए हुए थे. दिल्ली में बीबीसी हिंदी से एक लंबी बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि पूरे दक्षिण एशिया में लोकतंत्र के नाम पर बड़े-बड़े ज़ुल्म किए जाते हैं.
उन्होंने कहा कि जनता के अधिकारों का सम्मान सिर्फ़ दिखावे के लिए होता है किसी देश में थोड़ा ज़्यादा है, तो किसी में थोड़ा कम. उन्होंने कहा कि इस पूरे क्षेत्र में धार्मिक कट्टरता के उदय का एक सबसे बड़ा कारण ये है कि यहां लोकतंत्र पर पूरी तरह से अमल नहीं किया गया.
उनका कहना था, ''इस पूरे क्षेत्र में हथियारों से मोहब्बत, लोकतंत्र से गुरेज़ और बढ़ती धार्मिक कट्टरता अवाम के अधिकारों के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं.''
उन्होंने कहा कि सबसे ज़रूरी ये है कि इस पूरे क्षेत्र में बढ़ती धार्मिक कट्टरता को कम किया जाए.
भारत और पाकिस्तान के संबंधों के बारे में उन्होंने कहा कि दोनो देशों की सरकारों और जनता को ये फ़ैसला करना है कि उन्हें सुलह सफ़ाई से भाईचारे के साथ रहना है या एक दूसरे से लड़ाई करते हुए रहना है.
उनका कहना था, 1947 से आज तक दो राय क़ायम हैं. एक ग्रुप कहता है कि सारे मामलात ठीक हो जाएं तो दोस्ती हो जाएगी. दूसरा ग्रुप कहता है कि दोस्ती हो जाएगी तो सारे मामलात ख़ुद-ब-ख़ुद ठीक हो जाएंगे.
एक दूसरे से जुड़ा है भविष्य
उन्होंने कहा कि दोनों देशों की सरकार और जनता को सोचना चाहिए कि दोनों देशों का भविष्य एक दूसरे से जुड़ा हुआ है.
उनके अनुसार ये संभव नहीं कि एक हिस्सा पिछड़ा रहे और दूसरा हिस्सा ख़ूब तरक़्क़ी करे. उनका कहना था, ''भारत और पाकिस्तान की जनता के हक़ में यही है कि दोनों के ताल्लुक़ात सही रहें. अगर वो सही रहेंगे तो पूरे दक्षिण एशिया का भविष्य बेहतर हो सकेगा.''
उनके अनुसार भारत और पाकिस्तान के ख़राब रिश्ते की असल वजह दोनों सरकारें हैं और अगर दोनों देशों के अवाम को एक दूसरे से मिलने दिया जाए और उन्हें अपने तौर पर फ़ैसला करने दिया जाए तो कुछ ही महीनों के बाद वो दोस्त बन जाएंगे.
उन्होंने कहा कि दोनों देशों की जनता के लिए इस वक़्त ये ज़्यादा बड़ा ख़तरा है कि दोनों देशों में जंगी हथियारों की होड़ लगी है, गवर्नेंस की समस्या है और धार्मिक कट्टरता बढ़ती जा रही है.
उन्होंने कहा कि अमरीका में 9/11 हमले के बाद पूरी दुनिया में मानवाधिकार के हवाले से वो आज़ादियां नहीं रहीं जो पहले हुआ करती थीं.
उनके अनुसार इस हमले के बाद अमरीका, ब्रिटेन और कई मुल्कों ने ऐसे क़ानून बनाए जो सीधे तौर पर मानवाधिकार का उल्लंघन करते थे. उन्होंने कहा कि दक्षिण एशियाई देशों में इसका असर हुआ और यहां भी मानवाधिकार का वो सम्मान नहीं रहा जो पहले हुआ करता था.
पाक में ऐसे कई क़ानून बने
उनके अनुसार पाकिस्तान में भी ऐसे कई क़ानून बनाए गए जो मानवाधिकार का हनन करते हैं. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान इस समय बहुत ही बुरे समय से गुज़र रहा है. उनके अनुसार धार्मिक कट्टरपंथी सरकार को चुनौती दे रहे हैं जिसके कारण सरकार दबाव में है और उसे समझ में नहीं आ रहा है कि वो क्या करे.
उन्होंने कहा कि इस्लामिक देशों में आपसी लड़ाई जारी है और इसका असर पाकिस्तान पर भी पड़ा रहा है. उनके अनुसार पाकिस्तान हमेशा से बड़े मुल्कों की प्रॉक्सी वॉर का इलाक़ा रहा है, लेकिन ज़्यादा चिंता की बात ये है कि धार्मिक कट्टरता बढ़ती जा रही है.
उन्होंने ये भी कहा कि पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के पक्ष में कई सारे फ़ैसले किए गए हैं और क़ानून बनाए गए हैं.
हालांकि इसके लिए वो अंतरराष्ट्रीय दबाव, पाकिस्तान की न्यायपालिका का दबाव, सिविल सोसाइटी का दबाव और ख़ुद अल्पसंख्यक समाज के लोगों की कोशिशों को ज़िम्मेदार मानते हैं.
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