उर्दू प्रेस रिव्यू- जीत हुई तो बस मरियम नवाज़ शरीफ़ की!

- Author, साजिद इक़बाल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तान में पनामा लीक्स केस के फ़ैसले के वक़्त वहां सुप्रीम कोर्ट का बेंच तक़सीम नज़र आया, जबकि फ़ैसले के बाद तो पूरी क़ौम ही बंटी हुई दिख रही है.
पनामा लीक्स में प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के परिवार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर पाकिस्तान में हर तरफ़ बहस चल रही है.
बहस इस बात पर है कि फ़ैसले में कहा क्या गया है और उसका असल मतलब क्या है?
क्या प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को कसूरवार करार दिया गया है, जैसा दो सीनियर जजों की राय है? या फिर उन्हें दो माह का और वक़्त दिया गया है कि वो अपनी मासूमियत को साबित करें.
बाक़ी बहस जो भी हो, लेकिन एक बात पर सबका इत्तेफाक़ है. वो ये कि फ़ैसले का और किसी पर असर जो भी हो जीत मरियम नवाज़ शरीफ़ की हुई है.
कुछ हल्के तो अब यह भी कहने लगे हैं कि नवाज़ शरीफ़ को अब देर नहीं करनी चाहिए और जल्द से जल्द हुकूमत और पार्टी की कमान मरियम नवाज़ शरीफ़ के हवाले कर देनी चाहिए.
ताकतवर हैं मरियम नवाज़ शरीफ़

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प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के ख़िलाफ़ पनामा लीक्स का सारा केस ही मरियम नवाज़ शरीफ़ के इर्द गिर्द घूमता है.
उनके ख़िलाफ़ दायर की गई पेटिशन में कहा गया था कि क्योंकि मरियम नवाज़ शरीफ़ प्रधानमंत्री की ज़ैर-ए़-किफ़ालत (उन पर निर्भर) हैं और साथ में अपने भाइयों की विदेश में मौजूद कंपनियों और लंदन में मौजूद फ्लैटों की बेनिफिशियल ओनर हैं, इसलिए पीएम नवाज़ शरीफ़ इन जायदादों के मालिक बनते हैं और इसलिए उन्हें इन संपत्तियों की घोषणा चुनाव आयोग के सामने करनी चाहिए थी.
सुप्रीम कोर्ट के जजों ने इस पर एक मुख़्तलिफ़ राय कायम की और कहा है कि अगरचे मरियम नवाज़ शरीफ़ को अपने वालिद की तरफ से मुख़्तलिफ़ मौक़ों पर भारी रकम़ें दी गईं, लेकिन ये अमल क़ानून की नज़र में उन पर निर्भर साबित नहीं करता.
इस वक़्त तक मरियम नवाज़ शरीफ़ के पास कोई बड़ा सरकारी ओहदा नहीं है लेकिन हुकूमती कामों में उनकी मौजूदगी हर तरफ देखी जा सकती है.
चाहे इंफोर्मेशन मिनिस्ट्री में आला सतह की तक़रारें हों या हुकूमत की तालीमी मुहिम (अभियान), मरियम नवाज़ शरीफ़ का नाम हर जगह आपे सुना जा सकता है.
मुल्क के अंदर ही नहीं मुल्क से बाहर भी लोगों को मरियम नवाज़ शरीफ़ के असर-ओ-रसूख़ का अंदाज़ा है.
इसकी बड़ी मिसाल चीन के डिप्टी प्रधानमंत्री का बयान है जो उन्होंने अपने पाकिस्तान दौरे के मौक़े पर दिया था, जिसमें उन्होंने इस ख़्वाहिश का इज़हार किया था कि मरियम नवाज़ शरीफ़ को चीन का दौरा करने वाली मुस्लिम लीग की टीम में शामिल किया जाए.

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पाकिस्तान की सियासत में मरियम नवाज़ शरीफ़ का किरदार अपनी वालिदा कुलसूम नवाज़ शरीफ़ से मुख़्तलिफ रहा है जो सैन्य तानाशाह जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के दौर में जब उनके खानदान और पार्टी पर बुरा वक़्त आया था तो अगले मोर्चे पर आकर लड़ी थीं.
लेकिन जैसे ही हालात ठीक हुए और वतन वापसी के बाद मरियम नवाज़ शरीफ़ सियासत में पर्दे के पीछे चली गईं.
पाकिस्तान की मीडिया में पहले ही ऐसी आवाज़ें आ रही हैं कि पीएम नवाज़ शरीफ़ को फ़ौरी तौर पर चार्ज मरियम नवाज़ शरीफ़ के हवाले करके खुद बैकग्राउंड में चले जाना चाहिए.
उर्दू अख़बार 'औसाफ़' ने अपने 22 अप्रैल के संपादकीय में पीएम नवाज़ शरीफ़ को यही मशवरा दिया है, "हम समझते हैं कि वो अपने बेटों समेत ज्वाइंट इन्वेस्टीगेशन टीम में पेश हो कर मनी ट्रेल, संपत्ति, फ्लैट्स के बारे में दुरुस्त हकीकत पेश करें."
'औसाफ़' के अनुसार "वो अपनी साहिबज़ादी मरियम नवाज़ शरीफ़ को इलेक्शन लड़वा के उन्हें पीएम बनवाएं....पीएम नवाज़ शरीफ़ के इस अमल से अफवाहसाज़ फैक्ट्री बंद हो जाएंगी और वो खुद को सरकार से अलग कर के अपनी ग़ैर जवाबदारी साबित कर सकेंगे."

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और तो और देवबंद का हामी उर्दू अख़बार 'डेली इस्लाम' भी मरियम नवाज़ शरीफ़ का पैरोकार नज़र आ रहा है, बावजूद इसके कि देवबंदी मसलाक़ की सियासी जमातें बेनज़ीर भुट्टो के पीएम बनने और औरत की हुक़्मरानी के ख़िलाफ़ थीं.
'डेली इस्लाम' में 22 अप्रैल को 'बीवी की धूम' के नाम से एक कॉलम छापा गया जिसमें यह इम्प्रेशन देने की कोशिश की गई थी कि किस्मत मरियम नवाज़ शरीफ़ के ही साथ है.
अख़बार ने लिखा "मरियम बीवी अगर डॉन लीक वाले मसले में तत्काल शिकंजे से बच जाती हैं, तो फिर किस्मत के मुताबिक पाकिस्तान में सियासत की देवी वो ही होंगी."
अख़बार के अनुसार, "अदालती फ़ैसला उनके बारे में या तो खामोश है या उनका पक्ष लेता नज़र आ रहा है. तहरीक-ए-इंसाफ़ और मुस्लिम लीग (एन) में मरियम बीवी को आगे बढ़ाने से रोकने वाले कई हैं, लेकिन लगता है कि मरियम बीवी आगे बढ़ेंगी और बढ़ती ही जाएंगी."
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