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ब्लॉग: जूलियट के घर गए होते योगी आदित्यनाथ तो.....
- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी
उत्तरी इटली के वेरोना शहर में जूलियट के घर की बालकनी के नीचे खड़े होकर मैं एक अजीब क़िस्म की उलझन में फँस गया था.
वहाँ मौजूद नौजवान लड़के (और लड़कियाँ भी) दालान में लगी जूलियट की मूर्ति के पास बारी बारी से जाकर उसके दाहिने स्तन को छूते और फ़ोटो खिंचाते थे. ये दृश्य मेरी असमंजस और उलझन को लगातार गहराए जा रहा था.
मुझे नहीं मालूम कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 'एंटी-रोमियो स्क्वॉड' के पुलिस वाले इस दृश्य को देखते तो क्या करते.
पर आज उत्तर प्रदेश की लड़कियों और महिलाओं को बचाने के योगी आदित्यनाथ के अभियान के कारण ही मुझे वेरोना की वो दोपहर याद आ गई जब मैं जूलियट की मूर्ति के पास हतप्रभ खड़ा था.
योगी के पुलिस वाले भले ही शोहदे, बदमाश क़िस्म के सड़कछाप मवालियों को रोमियो कहें पर अगर आपने विलियम शेक्सपियर की मशहूर प्रेम त्रासदी 'रोमियो एंड जूलियट' पढ़ी होगी तो आप जानते होंगे कि ये दो दुश्मन ख़ानदानों के लड़के और लड़की की अमर प्रेम कहानी है - ठीक वैसी ही जैसी लैला-मजनूँ, शीरीं-फ़रहाद, ससि-पन्नू या हीर-राँझा की.
शेक्सपियर के ये दो चरित्र काल्पनिक ज़रूर हैं मगर दुनिया भर में उनकी लोकप्रियता को देखते हुए इटली के वेरोना शहर के अधिकारियों को पर्यटकों को आकर्षित करने का नुस्ख़ा ढूँढ़ निकाला.
उन्होंने शहर की एक पुरानी और सुंदर सी हवेली को जूलियट के घर के तौर पर प्रचारित करना शुरू किया.
नतीजा ये हुआ कि इश्क़ में चोट खाए या इश्क़ की दुनिया में पहला क़दम रखने वाले जोड़ों के झुंड के झुंड दुनिया भर से प्रेम की इस त्रासदी को अमर कर देने वाले शहर वेरोना पहुँचने लगे.
यानी शेक्सपियर की प्रेम-त्रासदी वेरोना के बाशिंदों के लिए अच्छी ख़ासी आमदनी का ज़रिया बन गई.
जूलियट के इस घर की दीवारें छोटे छोटे काग़ज़ों की पर्चियों से अटी पड़ी हैं जिनमें प्रेमी जन अपना नाम लिखकर च्यूइंग गम की मदद से चिपका जाते हैं और मानते हैं कि ऐसा करने से उनका इश्क़ फलीभूत होगा.
वो चमकदार हिस्सा
इसी दोमंज़िले घर के दालान में जूलियट की काँसे की आदमक़द मूर्ति लगाई गई है — लंबा सा गाउन पहने, नज़रें तनिक झुकाए हुए जूलियट के चेहरे पर शर्म-ओ-हया के साथ साथ उम्मीद और हताशा के भाव साफ़ पढ़े जा सकते हैं.
मेरा वहाँ पहुँच कर एक अजीब उलझन से दो चार होना महज़ इत्तेफ़ाक़ ही था क्योंकि न तो मैं इश्क़ के मरीज़ की तरह जूलियट के शहर पहुँचा था और न ही रोमियो से हमदर्दी दिखाने के लिए.
मैं उत्तरी इटली में एक गाँव से दूसरे गाँव भटकते हुए वेरोना में जूलियट की हवेली तक पहुँच गया.
पर ये क्या अजीबो ग़रीब रवायत है कि जिसे देखकर मुझ जैसा क़स्बाई हिंदुस्तानी पानी पानी हुआ जा रहा था?
न तो विलियम शेक्सपियर ने अपने प्रसिद्ध नाटक 'रोमियो एंड जूलियट' की हीरोइन को गढ़ते वक़्त और न ही जूलियट के मूर्तिकार ने उसकी मूर्ति बनाते वक़्त ये सोचा होगा कि दुनिया भर के लोग रोमियो की प्रेमिका के शरीर को ग़लत ढंग से छूने (इनएप्रोप्रिएट टच!) के लिए इटली के वेरोना शहर आएँगे.
दालान में इकट्ठा लड़के (और लड़कियाँ भी) बारी बारी से जूलियट की मूर्ति के पास पहुँच कर उसके दाहिने स्तन को छू रहे थे, खिलखिला कर हँस रहे थे और फ़ोटो खिंचा रहे थे. काँसे की मूर्ति के उस हिस्से को इतना घिसा गया है कि पूरी मूर्ति की अपेक्षा वो हिस्सा ज़्यादा चमकदार हो उठा है.
जूलियट की हवेली तक पहुँचने वाले लोगों का ये विश्वास है कि मूर्ति को उस हिस्से को छूने से उनका भाग्य खुल जाएगा और फिर प्रेम या जीवन में उनको कोई हरा नहीं सकता. कोई नहीं जानता कि सभ्यता और असभ्यता की परिभाषा से परे ये अजीब सा अंधविश्वास कब और कैसे शुरू हुआ और अपनी जड़ें जमाता गया.
मनोविकार या अंधविश्वास
मेरी उलझन की यही वजह थी - ख़ालिस देसी वजह. एक नारी की मूर्ति के अंगों को छूने के पीछे कैसा मनोविज्ञान काम करता होगा? ये कोई मनोविकार है या पश्चिमी खुलेपन का सबूत? जैसे मैं सोच रहा हूँ क्या वैसे ही वहाँ इकट्ठा दूसरे लोग भी सोच रहे होंगे?
स्त्रीदेह को लेकर जैसा कौतूहल हिंदुस्तानी समाज कुछ हिस्सों में नज़र आता है वैसा पश्चिमी देशों में नहीं दिखता, फिर जूलियट की मूर्ति को छूकर सौभाग्य हासिल करने का ये अंधविश्वास कब और कैसे लोकप्रिय हो गया?
वो भी ऐसे समाज में जहाँ लड़कों और लड़कियों के बीच आकर्षण या संबंधों को नैसर्गिक माना जाता है और उनपर कोई कानाफूसी नहीं करता. जहाँ भारी भीड़ में फँसी अकेली लड़की को इस बात की चिंता नहीं होती कि कोई उसकी शारीरिक निजता को भंग करने की कोशिश कर सकता है.
उत्तर भारत के किसी भी क़स्बे, शहर या महानगर की किसी भी लड़की से बात कीजिए तो वो आपको बताएगी कि भीड़ भाड़ वाली जगहों पर उसे हमेशा अपनी देह के उल्लंघन की आशंका बनी रहती है और ऐसे हमले से बचने की कोशिश में उसे हमेशा अपने हाथ तैयार रखने पड़ते हैं.
दरअसल भारत में स्त्री की यौनिकता को कुल की मान मर्यादा के साथ जोड़ दिया गया है इसीलिए बलात्कार जैसे अपराध को महिला की निजता, स्वतंत्रता और यौनिकता पर हमला मानने की बजाए उसे उसके और उसके परिवार व समुदाय की अस्मिता, शील और इज़्ज़त पर हमला माना जाता है.
स्त्री की यौनिकता के मायने
ऐसी मानसिक बनावट वाले समाज में दबंग जातियों के कई लोग दलितों परिवारों की महिलाओं पर यौन हमले करना एक तरह से अपना हक़ मानते हैं क्योंकि वर्णवादी समाज व्यवस्था ये मानती ही नहीं कि दलितों की भी इज़्ज़त हो सकती है.
यही वजह है कि हमारी फ़िल्मों और उपन्यासों से लेकर सामान्य बातचीत में भी महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन आक्रमण के लिए इज़्ज़त लूटना, आबरू लूटना, मुँह काला करना आदि मुहावरे इस्तेमाल किए जाते हैं.
पर व्यक्ति की अस्मिता, इज़्ज़त या साख सिर्फ़ व्यक्ति में ही निहित नहीं होती बल्कि इसमें अनेक ढंग से परिवार, मोहल्ले, समाज, समुदाय, संप्रदाय और धर्म से जुड़े लोग भी शामिल मान लिए जाते हैं. जबकि व्यक्ति का शरीर उसका बेहद निजी होता है.
चोट लगने पर आपको दूसरे सिर्फ़ दिलासा दिला सकते हैं या सहानुभूति जता सकते हैं. दर्द तो आपको ही झेलना पड़ेगा. इसी तरह किसी स्त्री पर यौन आक्रमण निश्चित तौर पर उसके व्यक्तित्व, उसके शरीर, उसकी आत्मा और उसकी निजता पर हमला होता है न कि उसकी सामुदायिक पहचान पर.
इज़्ज़त पर बुरी निगाह?
हमारे यहाँ स्त्री देह की सुरक्षा ही स्त्री के मान सम्मान की सुरक्षा मान ली जाती है. मज़दूर महिलाएँ अगर बेहतर मज़दूरी, पुरुषों के साथ बराबरी और काम की जगह बेहतर माहौल के लिए किसी ट्रेड यूनियन संघर्ष से जुड़ी हों तो उनकी इस लड़ाई को मान सम्मान की लड़ाई नहीं माना जाएगा.
लेकिन सरकारें, राजसत्ता, पुलिस, नेता, उनकी पार्टियाँ और उनके सांस्कृतिक व धार्मिक संगठन महिलाओं की 'इज़्ज़त' पर बुरी निगाह डालने वालों के ख़िलाफ़ एकजुट हो जाते हैं.
यहाँ तक कि ऐसे संगठनों के दबाव में मक़बूल फ़िदा हुसैन जैसे मशहूर पेंटर को देश छोड़ने को मजबूर होना पड़ जाता है.
मगर अब तक किसी ने नहीं सुना है कि इटली की संस्कृति और वेरोना शहर में लगी जूलियट की मूर्ति की 'अस्मिता' को बचाने के लिए सिरों पर पटके बाँधे राष्ट्रभक्त इतालवी नौजवानों के जुनूनी हुजूम ने किसी पर्यटक पर हमला किया हो.
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